पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 74: पुष्पराग मणि और उसके भेद

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे पुष्परागपरीक्षणं नाम चतुः सप्ततितमोऽध्यायः ॥

5 श्लोक · 74 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

पुष्पराग मणि और उसके भेद

सूत कहते हैं कि देवशत्रु असुर की त्वचा जहाँ हिमालय पर गिरी, वहाँ बड़े गुणों वाले पुष्पराग उत्पन्न होते हैं। हल्का पीला और सुन्दर पत्थर ही पुष्पराग है। यदि वह लालिमा लिए पीला हो तो कौकण्टक कहलाता है। हल्का लाल, पीला और स्वच्छ हो तो काषायक कहा गया है। हल्का नीला श्वेत और चिकना पत्थर सोमालक है, वह भी गुणी है। अत्यन्त लाल हो तो उसे पद्मराग ही मानना चाहिए, और सुन्दर नीला हो तो इन्द्रनील; इस प्रकार रंग से नाम तय होता है। रत्नज्ञों ने इसका मूल्य वैदूर्य के समान बताया है, और धारण का फल भी वही है, केवल इतना अधिक कि स्त्रियों के लिए पुष्पराग पुत्र देने वाला कहा गया है।

सूत उवाच

74.1

पतिताया हिमाद्रौ तु त्वचस्तस्य सुरद्विषः ।
प्रादुर्भवन्ति ताभ्यस्तु पुष्प
रागा महागुणाः

patitāyā himādrau tu tvacastasya suradviṣaḥ |
prādurbhavanti tābhyastu puṣpa
rāgā mahāguṇāḥ

74.2

आपीतपाण्डुरुचिरः पाषाणः पद्मरागसंज्ञस्तु ।
कौकण्टकनामा स्यात्स एव यदि लोहितापीतः

āpītapāṇḍuruciraḥ pāṣāṇaḥ padmarāgasaṃjñastu |
kaukaṇṭakanāmā syātsa eva yadi lohitāpītaḥ

74.3

आलोहितस्तु पीतः स्वच्छः काषायकः स एकोक्तः ।
आनीलशुक्लवर्णः स्निग्धः सोमाल
कः सगुणः

ālohitastu pītaḥ svacchaḥ kāṣāyakaḥ sa ekoktaḥ |
ānīlaśuklavarṇaḥ snigdhaḥ somāla
kaḥ saguṇaḥ

74.4

अत्यन्तलोहितो यः स एव खलु पद्मरागसंज्ञः स्यात् ।
अपि चेन्द्रनीलसंज्ञः स एव कथितः सुनीलः सन्

atyantalohito yaḥ sa eva khalu padmarāgasaṃjñaḥ syāt |
api cendranīlasaṃjñaḥ sa eva kathitaḥ sunīlaḥ san

74.5

मूल्यं वैदूर्य्यमणेरिव गदितं ह्यस्य रत्नसारविदा ।
धारणफलं च तद्वत्किं तु स्त्रीणां सुतप्रदो भवति

mūlyaṃ vaidūryyamaṇeriva gaditaṃ hyasya ratnasāravidā |
dhāraṇaphalaṃ ca tadvatkiṃ tu strīṇāṃ sutaprado bhavati

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