पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 41: विवाह, रक्षा और शत्रुनाश के मन्त्र

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे वश्यादिसाधिकमन्त्रनिरूपणं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥

3 श्लोक · 41 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

विवाह, रक्षा और शत्रुनाश के मन्त्र

वासुदेव तीन छोटे तान्त्रिक मन्त्र बताते हैं। पहला मन्त्र कन्याओं के अधिपति गन्धर्व विश्वावसु का है, जिसके जप से कन्या की प्राप्ति कही गई है। दूसरा मन्त्र कालरात्रि का है, जो चतुर्भुजा, त्रिनयना और ऊर्ध्वकेशी हैं, ऋक्षकर्णी की पत्नी हैं। शास्त्र कहता है कि यह मन्त्र उस शत्रु को मृत्यु देता है जिसका काल आ गया हो, और इसके लिए न तिथि का विचार है, न नक्षत्र का, न उपवास का। क्रुद्ध साधक प्रदोष में हाथों पर रक्त लगाकर जप करता है और कच्चा पात्र फोड़ता है। तीसरा मन्त्र जम्भनी और मोहिनी शक्ति से सब भयों और उपद्रवों से रक्षा माँगता है। अध्याय केवल तीन श्लोकों का है और अचानक समाप्त हो जाता है।

वासुदेव उवाच

41.1

ॐ विश्वावसुर्नाम गन्धर्वः कन्यानामधिपतिर्लभामि ते कन्यां समुत्पाद्य तस्मै विश्ववासवे स्वाहा ।
स्त्रीलाभो मन्त्रजाप्याच्च कालरात्रिं वदाम्यहम्

oṃ viśvāvasurnāma gandharvaḥ kanyānāmadhipatirlabhāmi te kanyāṃ samutpādya tasmai viśvavāsave svāhā |
strīlābho mantrajāpyācca kālarātriṃ vadāmyaham

41.2

ॐ नमो भगवति ऋक्षकर्णि चतुर्भुजे ऊर्द्ध्वकेशि त्रिनयने कालरात्रि मानुषाणां वसारुधिरभोजने अमुकस्य प्राप्तकालस्य मृत्युप्रदे हुं फट् हनहन दहदह मांसरुधिरं पचपच ऋक्षपत्नि स्वाहा । न तिथिर्न च नक्षत्रं नोपवासो विधीयते

oṃ namo bhagavati ṛkṣakarṇi caturbhuje ūrddhvakeśi trinayane kālarātri mānuṣāṇāṃ vasārudhirabhojane amukasya prāptakālasya mṛtyuprade huṃ phaṭ hanahana dahadaha māṃsarudhiraṃ pacapaca ṛkṣapatni svāhā | na tithirna ca nakṣatraṃ nopavāso vidhīyate

41.3

क्रुद्धो रक्तेन संमार्ज्य करौ ताभ्यां प्रगृह्य च ।
प्रदोषे संजपेल्लिङ्गमामपात्रं च मारयेत् ।
ॐ नमः सर्वतोयन्त्राण्येतद्यथा जम्भनि मोहनि सर्वशत्रुविदारिणि रक्षरक्ष माममुकं सर्वभयोपद्रवेभ्यः स्वाहा ।
शुक्रे नष्टे महादेव वक्ष्येऽहं द्विजपादिह

kruddho raktena saṃmārjya karau tābhyāṃ pragṛhya ca |
pradoṣe saṃjapelliṅgamāmapātraṃ ca mārayet |
oṃ namaḥ sarvatoyantrāṇyetadyathā jambhani mohani sarvaśatruvidāriṇi rakṣarakṣa māmamukaṃ sarvabhayopadravebhyaḥ svāhā |
śukre naṣṭe mahādeva vakṣye'haṃ dvijapādiha

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