पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 195: वासुदेव की सात रात्रि वाली विद्या

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाक्ये आचारकाण्डे पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥

6 श्लोक · 195 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

वासुदेव की सात रात्रि वाली विद्या

छह श्लोकों का यह छोटा अध्याय है। हरि सात रात्रि में सब कामनाएँ देने वाली विद्या बताते हैं और उसे स्तुति के रूप में देते हैं। भगवान वासुदेव को नमस्कार, जिनका हम ध्यान करते हैं, और प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण को। उन्हें नमस्कार जो विशुद्ध विज्ञान हैं, परमानन्द जिनका स्वरूप है, जो आत्माराम हैं, शान्त हैं और जिनमें द्वैत की दृष्टि निवृत्त हो गई है; सब रूप उन्हीं के हैं, इसलिए उन्हें बार बार नमस्कार। वे अनन्त रूपों वाले हृषीकेश हैं, जिनमें यह जगत स्थित है और जिनसे उत्पन्न होता है; वे पृथ्वी को धारण करते हैं, वे ब्रह्म हैं, जिन्हें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण न छू पाते हैं न जान पाते हैं। अन्त में महाभूतों के स्वामी महापुरुष का लम्बा गद्य मन्त्र है।

हरिरुवाच

195.1

सल्वकामप्रदां विद्यां सप्तरात्रेण तां शृणु ।
नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि

salvakāmapradāṃ vidyāṃ saptarātreṇa tāṃ śṛṇu |
namastubhyaṃ bhagavate vāsudevāya dhīmahi

195.2

प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्गर्षणाय च ।
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये

pradyumnāyāniruddhāya namaḥ saṅgarṣaṇāya ca |
namo vijñānamātrāya paramānandamūrtaye

195.3

आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ।
त्वद्रूपाणि च सर्वाणि तस्मात्तुभ्यं नमो नमः

ātmārāmāya śāntāya nivṛttadvaitadṛṣṭaye |
tvadrūpāṇi ca sarvāṇi tasmāttubhyaṃ namo namaḥ

195.4

हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये ।
यस्मिन्निदं यतश्चैतत्तिष्ठत्यग्रेऽपि जायते

hṛṣīkeśāya mahate namaste'nantamūrtaye |
yasminnidaṃ yataścaitattiṣṭhatyagre'pi jāyate

195.5

मृन्मयीं वहसि क्षोणीं तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ।
यन्न स्पृशन्ति न विदुः मनोबुद्धीन्द्रियासवः ।
अन्तर्बहिस्त्वं चरसि व्योमतुल्यं नमाम्यहम्

mṛnmayīṃ vahasi kṣoṇīṃ tasmai te brahmaṇe namaḥ |
yanna spṛśanti na viduḥ manobuddhīndriyāsavaḥ |
antarbahistvaṃ carasi vyomatulyaṃ namāmyaham

195.6

ओं नमो भगवते महापुराषाय महाभूतपतये सकलसत्त्वभाविव्रीडनिकरकमलरेणूत्पलनिभधर्माख्यविद्यया चरणारविन्दयुगल परमेष्ठिन्नमस्ते ।
अवाप विद्याधरतां चित्रकेतोश्च विद्यया

oṃ namo bhagavate mahāpurāṣāya mahābhūtapataye sakalasattvabhāvivrīḍanikarakamalareṇūtpalanibhadharmākhyavidyayā caraṇāravindayugala parameṣṭhinnamaste |
avāpa vidyādharatāṃ citraketośca vidyayā

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