पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 122: विष्णु के लिए मासोपवास व्रत

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे मासोपवासव्रतं नाम द्वाविंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥

7 श्लोक · 122 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

विष्णु के लिए मासोपवास व्रत

ब्रह्मा मासोपवास, अर्थात पूरे मास के उपवास, को सबसे श्रेष्ठ व्रत कहते हैं, जिसे वानप्रस्थ, संन्यासी या स्त्री कर सकती है। यह आश्विन शुक्ल एकादशी से आरम्भ होकर तीस दिन चलता है, जब तक विष्णु निद्रा से नहीं उठते। व्रती आश्विन की द्वादशी से कार्तिक की द्वादशी तक बिना भोजन पूजा का संकल्प करता है और प्रार्थना करता है कि बीच में मृत्यु हो जाए तो भी व्रत भंग न माना जाए। वह दिन में तीन बार स्नान करता है, गन्ध और पुष्प से हरि की पूजा करता है, तेल और लेप छोड़ देता है। द्वादशी को पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराता है और पारण करता है। बीच में मूर्छा आए तो दूध लेने से व्रत नष्ट नहीं होता, और व्रती भोग तथा मोक्ष पाता है।

ब्रह्मोवाच

122.1

व्रतं मासोपवासाख्यं सर्वोत्कृष्टं वदामिते ।
वानप्रस्थो यतिर्नारी कुर्यान्मासोपवासकम्

vrataṃ māsopavāsākhyaṃ sarvotkṛṣṭaṃ vadāmite |
vānaprastho yatirnārī kuryānmāsopavāsakam

122.2

आश्विनस्य सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः ।
व्रतमेतत्तु गृह्णीयाद्यावत्त्रिंशद्दिनानि तु

āśvinasya site pakṣe ekādaśyāmupoṣitaḥ |
vratametattu gṛhṇīyādyāvattriṃśaddināni tu

122.3

अद्यप्रभृत्यहं विष्णो यावदुत्थानकं तव ।
अर्चयेत्वामनश्रंस्तु दिनानि त्रिंशदेव तु

adyaprabhṛtyahaṃ viṣṇo yāvadutthānakaṃ tava |
arcayetvāmanaśraṃstu dināni triṃśadeva tu

122.4

कार्तिकाश्विनयोर्विष्णो द्वादश्योः शुक्लयोरहम् ।
म्रियेयद्यन्तराले तु व्रतभङ्गो न मे भवेत्

kārtikāśvinayorviṣṇo dvādaśyoḥ śuklayoraham |
mriyeyadyantarāle tu vratabhaṅgo na me bhavet

122.5

हरिं यजोत्त्रिषवणस्नायी गन्धादिभिर्व्रती ।
गात्राभ्यङ्गं गन्धलेपं देवतायतने त्यजेत्

hariṃ yajottriṣavaṇasnāyī gandhādibhirvratī |
gātrābhyaṅgaṃ gandhalepaṃ devatāyatane tyajet

122.6

द्वादश्यामथ संपूज्य प्रदद्याद्द्विजभोजनम् ।
ततश्च पारणं कुर्याद्धरेर्मासोपवासकृत्

dvādaśyāmatha saṃpūjya pradadyāddvijabhojanam |
tataśca pāraṇaṃ kuryāddharermāsopavāsakṛt

122.7

दुग्धादिप्राशनं कुर्याद्व्रतस्थो मूर्छितोऽन्तरा ।
दुग्धाद्यैर्न व्रतं नश्येद्भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात्

dugdhādiprāśanaṃ kuryādvratastho mūrchito'ntarā |
dugdhādyairna vrataṃ naśyedbhuktimuktimavāpnuyāt

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)