पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 119: अगस्त्य अर्घ्य व्रत

इति श्रीगारुडे महापुराणे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डेऽगस्त्यार्घ्यव्रतं नामैकोनविंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥

6 श्लोक · 119 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

अगस्त्य अर्घ्य व्रत

ब्रह्मा अगस्त्य को अर्घ्य देने का व्रत बताते हैं। सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश से तीन दिन पहले यह किया जाता है। व्रती कलश पर काश के फूलों से अगस्त्य की मूर्ति बनाए, उपवास रखे और दही, अक्षत, फल तथा पुष्पों से उनकी पूजा करे। सात धान, सोना और चाँदी से युक्त, दही और चन्दन से लिपा पात्र अगस्त्यः खनमानः मन्त्र से अर्घ्य रूप में दिया जाता है। प्रार्थना में अगस्त्य को अग्नि और वायु से उत्पन्न, मित्र और वरुण के पुत्र, कुम्भयोनि कहकर नमस्कार है। शूद्र और स्त्रियाँ भी इसी मन्त्र से व्रत कर सकते हैं। व्रत में एक धान्य, फल या रस का त्याग करे, ब्राह्मण को स्वर्ण और दक्षिणा सहित कुम्भ दे, और एक वर्ष पूरा करके सब फल पाता है।

ब्रह्मोवाच

119.1

अगस्त्यार्घ्यव्रतं वक्ष्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।
अप्राप्ते भास्करे कन्यां सति भागे त्रिभिर्दिनैः

agastyārghyavrataṃ vakṣye bhuktimuktipradāyakam |
aprāpte bhāskare kanyāṃ sati bhāge tribhirdinaiḥ

119.2

अर्घ्यं दद्यादगस्त्याय मूर्तिं संपूज्य वै मुने ।
काशपुष्पमयीं कुम्भे प्रदोषे कृतजागरः

arghyaṃ dadyādagastyāya mūrtiṃ saṃpūjya vai mune |
kāśapuṣpamayīṃ kumbhe pradoṣe kṛtajāgaraḥ

119.3

दध्यक्षताद्यैः संपूज्य उपोष्य फलपुष्पकैः ।
पञ्चवर्णसमायुक्तं हेमरौप्यसमन्वितम्

dadhyakṣatādyaiḥ saṃpūjya upoṣya phalapuṣpakaiḥ |
pañcavarṇasamāyuktaṃ hemaraupyasamanvitam

119.4

सप्तधान्ययुतं पात्रं दधिचन्दनचर्चितम् ।
अगस्त्यः खनमानेति मन्त्रेणार्घ्यं प्रदापयेत्

saptadhānyayutaṃ pātraṃ dadhicandanacarcitam |
agastyaḥ khanamāneti mantreṇārghyaṃ pradāpayet

119.5

खासपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव ।
मित्रावारुणयोः पुत्त्रो कुम्भयोने नमोऽस्तु ते

khāsapuṣpapratīkāśa agnimārutasambhava |
mitrāvāruṇayoḥ puttro kumbhayone namo'stu te

119.6

शूद्रस्त्र्यादिरनेनैव त्यजेद्धान्यं फलं रसम् ।
दद्याद्द्विजातये कुम्भं सहिरण्यं सदक्षिणम् ।
भोजयेच्च द्विजान्सप्त वर्षं कृत्वा तु सर्वभाक्

śūdrastryādiranenaiva tyajeddhānyaṃ phalaṃ rasam |
dadyāddvijātaye kumbhaṃ sahiraṇyaṃ sadakṣiṇam |
bhojayecca dvijānsapta varṣaṃ kṛtvā tu sarvabhāk

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