पूर्व खण्ड — आचार काण्ड

अध्याय 103: संन्यासी भिक्षु का धर्म

इति श्रागारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे याज्ञवल्क्योक्तवानप्रस्थसन्न्यासधर्मनिरूपणं नाम त्र्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥

5 श्लोक · 103 में से 241

इस अध्याय में क्या होता है

संन्यासी भिक्षु का धर्म

याज्ञवल्क्य पाँच श्लोकों में भिक्षु का धर्म बताते हैं। वन से अथवा सीधे घर से साधक प्राजापत्य इष्टि करे, जिसमें सारी सम्पत्ति दक्षिणा में दे दी जाती है, और अग्नियों को अपने भीतर आरोपित कर ले। फिर शान्त होकर, सब प्राणियों के हित में लगा, त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करे। सब सुखों को छोड़कर वह केवल भिक्षा के लिए गाँव जाए, सायंकाल सावधान होकर, बिना ध्यान खींचे, अन्य भिक्षुओं के लौट जाने के बाद भिक्षा माँगे, केवल देह चलाने भर लेकर, लोभ रहित होकर। यम नियम में स्थित होकर वह एकदण्डी परमहंस भी हो सकता है। योग में सिद्ध होकर देह त्यागने पर वह अमृतत्व पाता है। फिर भी दानी, अतिथिप्रिय, ज्ञानी और श्राद्ध करने वाला गृहस्थ भी मुक्त होता है।

याज्ञवल्क्य उवाच

103.1

भिक्षोर्धर्मं प्रवक्ष्यामितिनिबोधत सत्तमाः ।
वनाद्गृहाद्वा कृत्वेष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्

bhikṣordharmaṃ pravakṣyāmitinibodhata sattamāḥ |
vanādgṛhādvā kṛtveṣṭiṃ sarvavedasadakṣiṇām

103.2

प्राजापत्यन्तदन्तेऽपि अग्निमारोप्य चात्मनि ।
सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः

prājāpatyantadante'pi agnimāropya cātmani |
sarvabhūtahitaḥ śāntastridaṇḍī sakamaṇḍaluḥ

103.3

सर्वारामं परिव्रज्य भिक्षार्थो ग्राममाश्रयेत् ।
अप्रमत्तश्चरेद्भैक्ष्यं सायाह्ने नाभिलक्षितः

sarvārāmaṃ parivrajya bhikṣārtho grāmamāśrayet |
apramattaścaredbhaikṣyaṃ sāyāhne nābhilakṣitaḥ

103.4

रोहिते भिक्षुकैर्ग्रामे यात्रामात्र मलोलुपः ।
भवेत्परमहंसो वा एकदण्डी यमादितः

rohite bhikṣukairgrāme yātrāmātra malolupaḥ |
bhavetparamahaṃso vā ekadaṇḍī yamāditaḥ

103.5

सिद्धयोगस्त्यजन्देहममृतत्वमिहाप्नुयात् ।
दाताऽतिथिप्रियो ज्ञानी गृही श्राद्धेऽपिमुच्यते

siddhayogastyajandehamamṛtatvamihāpnuyāt |
dātā'tithipriyo jñānī gṛhī śrāddhe'pimucyate

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