इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे लक्ष्म्यर्चननिरूपणं नाम दशमोऽध्यायः ॥
6 श्लोक · 10 में से 241
इस अध्याय में क्या होता है
महालक्ष्मी और सरस्वती का पूजन
छह श्लोकों के इस प्रसंग में कामनाओं की सिद्धि के लिए स्थण्डिल या मण्डल पर श्री के पूजन का विधान है। श्रां, श्रीं, श्रूं, श्रैं, श्रौं, श्रः बीजों से क्रमशः हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र के अंगमन्त्र बनते हैं, फिर आसन और मूर्ति का पूजन होता है। मण्डल के बीच में कमल और चारों ओर द्वार होते हैं। वहाँ लक्ष्मी के अंगों का पूजन होता है, कोणों में दुर्गा, गणेश, गुरु और क्षेत्रपाल रखे जाते हैं, फिर हवन होता है। मुख्य मन्त्र है ॐ घं टं डं हं श्रीमहालक्ष्म्यै नमः, जो पहले कहे परिवार देवताओं के साथ जपा जाता है। अन्त में वाणी की सिद्धि के लिए सरस्वती के मन्त्र दिए गए हैं, जिनमें ॐ ह्रीं वद वद वाग्वादिनि स्वाहा भी है।