बृहदारण्यकोपनिषद्

अध्याय 3: जनक की सभा में याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ

इति नवमं ब्राह्मणम् ॥

99 श्लोक · 3 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

जनक की सभा में याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ

राजा जनक सबसे विद्वान् ब्राह्मण के लिए सोने से सजे सींगों वाली हज़ार गायें रखते हैं। याज्ञवल्क्य शिष्य से गायें हाँक ले जाने को कहते हैं, और ऋषि एक-एक कर उन्हें चुनौती देते हैं। अश्वल यज्ञ के विषय में पूछते हैं; आर्तभाग मृत्यु के बाद मनुष्य के शेष के विषय में, और दोनों एकान्त में कर्म की चर्चा करते हैं; उषस्त और कहोल सबके भीतर के आत्मा के विषय में। गार्गी पूछती हैं कि सब किसमें ओतप्रोत है, और उन्हें सीमा से आगे न पूछने की चेतावनी मिलती है। उद्दालक को अन्तर्यामी का उपदेश मिलता है, जो भीतर से सबका नियमन करता है। गार्गी लौटकर अक्षर का उपदेश पाती हैं। विदग्ध शाकल्य देवताओं की संख्या पर तीन हज़ार छह से एक तक हठ करते हैं और प्राण गँवाते हैं।

3.1.1

अथ तृतीयोध्यायः ॥
प्रथमं ब्राह्मणम् ।
(अश्वलब्राह्मणम्)
जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे ।
तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुः ।
तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम इति ।
स ह गवां सहस्रमवरुरोध ।
दशदश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः

atha tṛtīyodhyāyaḥ ||
prathamaṃ brāhmaṇam |
(aśvalabrāhmaṇam)
janako ha vaideho bahudakṣiṇena yajñeneje |
tatra ha kurupañcālānāṃ brāhmaṇā abhisametā babhūvuḥ |
tasya ha janakasya vaidehasya vijijñāsā babhūva kaḥ svideṣāṃ brāhmaṇānāmanūcānatama iti |
sa ha gavāṃ sahasramavarurodha |
daśadaśa pādā ekaikasyāḥ śṛṅgayorābaddhā babhūvuḥ

विदेह के राजा जनक ने बहुत दक्षिणा वाला यज्ञ किया। वहाँ कुरु और पांचाल देशों के ब्राह्मण एकत्र हुए थे। जनक के मन में यह जानने की इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणों में वेद का सबसे बड़ा ज्ञाता कौन है। उन्होंने एक सहस्र गायें रोक रखीं, और प्रत्येक गाय के सींगों पर दस दस पाद सोना बँधा था।

3.1.2

तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ।
ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ।
अथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाच एताः सौम्योदज सामश्रवा३ इति ।
ता होदाचकार ।
ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नु नो ब्रह्मिष्ठो ब्रुवीतेति ।
अथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताश्वलो बभूव ।
स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति ।
स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म इति ।
तं ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताश्वलः

tān hovāca brāhmaṇā bhagavanto yo vo brahmiṣṭhaḥ sa etā gā udajatāmiti |
te ha brāhmaṇā na dadhṛṣuḥ |
atha ha yājñavalkyaḥ svameva brahmacāriṇamuvāca etāḥ saumyodaja sāmaśravā3 iti |
tā hodācakāra |
te ha brāhmaṇāścukrudhuḥ kathaṃ nu no brahmiṣṭho bruvīteti |
atha ha janakasya vaidehasya hotāśvalo babhūva |
sa hainaṃ papraccha tvaṃ nu khalu no yājñavalkya brahmiṣṭho'sī3 iti |
sa hovāca namo vayaṃ brahmiṣṭhāya kurmo gokāmā eva vayaṃ sma iti |
taṃ ha tata eva praṣṭuṃ dadhre hotāśvalaḥ

जनक ने उनसे कहा, पूज्य ब्राह्मणो, आप में जो सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता हो, वह इन गायों को हाँक ले जाए। ब्राह्मणों का साहस न हुआ। तब याज्ञवल्क्य ने अपने ही ब्रह्मचारी से कहा, सौम्य सामश्रवा, इन्हें हाँक ले चलो। उसने गायें हाँक दीं। ब्राह्मण क्रुद्ध हुए कि यह हम सबमें अपने को श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता कैसे कहता है। जनक के होता अश्वल थे। उन्होंने पूछा, याज्ञवल्क्य, क्या तुम ही हम में श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता हो? याज्ञवल्क्य बोले, श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता को हम नमस्कार करते हैं, हमें तो बस गायें चाहिए। तब होता अश्वल ने उनसे प्रश्न करने की ठानी।

3.1.3

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वं मृत्युनाप्तं सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति ।
होत्रर्त्विजाग्निना वाचा ।
वाग्वै यज्ञस्य होता ।
तद्येयं वाक्सोऽयमग्निः स होता सा मुक्तिः सातिमुक्तिः

yājñavalkyeti hovāca yadidaṃ sarvaṃ mṛtyunāptaṃ sarvaṃ mṛtyunābhipannaṃ kena yajamāno mṛtyorāptimatimucyata iti |
hotrartvijāgninā vācā |
vāgvai yajñasya hotā |
tadyeyaṃ vākso'yamagniḥ sa hotā sā muktiḥ sātimuktiḥ

अश्वल ने कहा, याज्ञवल्क्य, यह सब मृत्यु से व्याप्त है, सब मृत्यु के वश में है। यजमान किस साधन से मृत्यु की पकड़ से पार होता है? याज्ञवल्क्य बोले, होता ऋत्विज से, अग्नि से, वाणी से। वाणी ही यज्ञ की होता है। जो यह वाणी है वही अग्नि है, वही होता है। वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है।

3.1.4

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तं सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इति ।
अध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन ।
चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युः ।
तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः ।
सोऽध्वर्युः सा मुक्तिः सातिमुक्तिः

yājñavalkyeti hovāca yadidaṃ sarvamahorātrābhyāmāptaṃ sarvamahorātrābhyāmabhipannaṃ kena yajamāno'horātrayorāptimatimucyata iti |
adhvaryuṇartvijā cakṣuṣādityena |
cakṣurvai yajñasyādhvaryuḥ |
tadyadidaṃ cakṣuḥ so'sāvādityaḥ |
so'dhvaryuḥ sā muktiḥ sātimuktiḥ

याज्ञवल्क्य, यह सब दिन और रात से व्याप्त है, उन्हीं के वश में है। यजमान किस साधन से दिन और रात की पकड़ से पार होता है? अध्वर्यु ऋत्विज से, नेत्र से, आदित्य से। नेत्र ही यज्ञ का अध्वर्यु है। जो यह नेत्र है वही सूर्य है, वही अध्वर्यु है। वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है।

3.1.5

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्तं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इति ।
उद्गात्रर्त्विजा वयुना प्राणेन ।
प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता ।
तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता ।
स मुक्तिः सातिमुक्तिः

yājñavalkyeti hovāca yadidaṃ sarvaṃ pūrvapakṣāparapakṣābhyāmāptaṃ sarvaṃ pūrvapakṣāparapakṣābhyāmabhipannaṃ kena yajamānaḥ pūrvapakṣāparapakṣayorāptimatimucyata iti |
udgātrartvijā vayunā prāṇena |
prāṇo vai yajñasyodgātā |
tadyo'yaṃ prāṇaḥ sa vāyuḥ sa udgātā |
sa muktiḥ sātimuktiḥ

याज्ञवल्क्य, यह सब शुक्ल और कृष्ण पक्ष से व्याप्त है, उन्हीं के वश में है। यजमान किस साधन से उनकी पकड़ से पार होता है? उद्गाता ऋत्विज से, वायु से, प्राण से। प्राण ही यज्ञ का उद्गाता है। जो यह प्राण है वही वायु है, वही उद्गाता है। वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है।

3.1.6

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्बणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ।
ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण ।
मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा ।
तद्यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा ।
अथ संपदः

yājñavalkyeti hovāca yadidamantarikṣamanārambaṇamiva kenākrameṇa yajamānaḥ svargaṃ lokamākramata iti |
brahmaṇartvijā manasā candreṇa |
mano vai yajñasya brahmā |
tadyadidaṃ manaḥ so'sau candraḥ sa brahmā sa muktiḥ sātimuktirityatimokṣā |
atha saṃpadaḥ

याज्ञवल्क्य, यह अन्तरिक्ष मानो बिना आधार का है। यजमान किस सीढ़ी से स्वर्गलोक पर चढ़ता है? ब्रह्मा ऋत्विज से, मन से, चन्द्रमा से। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। जो यह मन है वही चन्द्रमा है, वही ब्रह्मा है। वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति है। ये अतिमोक्ष हुए। अब सम्पदाएँ, अर्थात् उपासना की समानताएँ, कही जाती हैं।

3.1.7

याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन् यज्ञे करिष्यतीति ।
तिसृभिरिति ।
कतमास्तास्तिस्र इति ।
पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया ।
किं ताभिर्जयतीति ।
यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति

yājñavalkyeti hovāca katibhirayamadyargbhirhotāsmin yajñe kariṣyatīti |
tisṛbhiriti |
katamāstāstisra iti |
puronuvākyā ca yājyā ca śasyaiva tṛtīyā |
kiṃ tābhirjayatīti |
yatkiñcedaṃ prāṇabhṛditi

याज्ञवल्क्य, आज इस यज्ञ में होता कितनी ऋचाओं से कर्म करेगा? तीन से। वे तीन कौन सी हैं? पुरोनुवाक्या, याज्या, और तीसरी शस्या। उनसे वह क्या जीतता है? यहाँ जो कुछ भी प्राणधारी है, वह सब।

3.1.8

याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति ।
तिस्र इति ।
कतमास्तास्तिस्र इति ।
या हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ति या हुता अधिशेरते ।
किं ताभिर्जयतीति ।
या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति ।
दीप्यत इव हि देवलोको ।
या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयति ।
अतीव हि पितृलोकः ।
या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यि ।
अध इव हि मनुष्यलोकः

yājñavalkyeti hovāca katyayamadyādhvaryurasmin yajña āhutīrhoṣyatīti |
tisra iti |
katamāstāstisra iti |
yā hutā ujjvalanti yā hutā atinedanti yā hutā adhiśerate |
kiṃ tābhirjayatīti |
yā hutā ujjvalanti devalokameva tābhirjayati |
dīpyata iva hi devaloko |
yā hutā atinedante pitṛlokameva tābhirjayati |
atīva hi pitṛlokaḥ |
yā hutā adhiśerate manuṣyalokameva tābhirjayatyi |
adha iva hi manuṣyalokaḥ

याज्ञवल्क्य, आज इस यज्ञ में अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ देगा? तीन। वे कौन सी? जो आहुति देने पर प्रज्वलित होती हैं, जो देने पर बहुत शब्द करती हैं, और जो देने पर नीचे बैठ जाती हैं। उनसे वह क्या जीतता है? प्रज्वलित होने वाली से देवलोक जीतता है, क्योंकि देवलोक मानो दमकता है। शब्द करने वाली से पितृलोक जीतता है, क्योंकि पितृलोक मानो परे है। नीचे बैठने वाली से मनुष्यलोक जीतता है, क्योंकि मनुष्यलोक नीचे है।

3.1.9

याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीति ।
एकयेति ।
कतमा सैकेति ।
मन एवेति ।
अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवाः ।
अनन्तमेव स तेन लोकं जयति

yājñavalkyeti hovāca katibhirayamadya brahmā yajñaṃ dakṣiṇato devatābhirgopāyatīti |
ekayeti |
katamā saiketi |
mana eveti |
anantaṃ vai mano'nantā viśve devāḥ |
anantameva sa tena lokaṃ jayati

याज्ञवल्क्य, आज दक्षिण दिशा में बैठा ब्रह्मा कितने देवताओं से यज्ञ की रक्षा करता है? एक से। वह एक कौन? मन ही। मन अनन्त है, विश्वेदेव भी अनन्त हैं। उसके द्वारा वह अनन्त लोक जीतता है।

3.1.10

याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति ।
तिस्र इति ।
कतमास्तास्तिस्र इति ।
पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया ।
कतमास्ताः ।
या अध्यात्ममिति ।
प्राण एव पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या ।
किं ताभिर्जयतीति ।
पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकं शस्यया ।
ततो ह होताश्वल उपरराम

yājñavalkyeti hovāca katyayamadyodgātāsmin yajñe stotriyāḥ stoṣyatīti |
tisra iti |
katamāstāstisra iti |
puronuvākyā ca yājyā ca śasyaiva tṛtīyā |
katamāstāḥ |
yā adhyātmamiti |
prāṇa eva puronuvākyāpāno yājyā vyānaḥ śasyā |
kiṃ tābhirjayatīti |
pṛthivīlokameva puronuvākyayā jayatyantarikṣalokaṃ yājyayā dyulokaṃ śasyayā |
tato ha hotāśvala upararāma

याज्ञवल्क्य, आज इस यज्ञ में उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओं का गान करेगा? तीन। वे कौन सी? पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या। शरीर के सम्बन्ध में वे कौन सी हैं? प्राण पुरोनुवाक्या है, अपान याज्या है, व्यान शस्या है। उनसे वह क्या जीतता है? पुरोनुवाक्या से पृथ्वीलोक, याज्या से अन्तरिक्षलोक और शस्या से द्युलोक जीतता है। तब होता अश्वल चुप हो गए।

3.2.1

(आर्तभागब्राह्मणं वा जारत्कारवब्राह्मणम्)
अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ ।
याज्ञवल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति ।
अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ।
ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति

(ārtabhāgabrāhmaṇaṃ vā jāratkāravabrāhmaṇam)
atha hainaṃ jāratkārava ārtabhāgaḥ papraccha |
yājñavalkyeti hovāca kati grahāḥ katyatigrahā iti |
aṣṭau grahā aṣṭāvatigrahā iti |
ye te'ṣṭau grahā aṣṭāvatigrahāḥ katame ta iti

तब जरत्कारु वंश के आर्तभाग ने उनसे पूछा, याज्ञवल्क्य, ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने? आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह। वे आठ ग्रह और आठ अतिग्रह कौन से हैं? (ग्रह का अर्थ है पकड़ने वाली इन्द्रिय, अतिग्रह उसे पकड़ने वाला विषय।)

3.2.2

प्राणो वै ग्रहः ।
सोऽपानेनातिग्रहेण गृहीतः ।
प्राणेन हि गन्धाञ्जिघ्रति

prāṇo vai grahaḥ |
so'pānenātigraheṇa gṛhītaḥ |
prāṇena hi gandhāñjighrati

प्राण, अर्थात् घ्राण, ग्रह है। वह अपान रूपी अतिग्रह, अर्थात् गन्ध, से पकड़ा हुआ है, क्योंकि प्राण से ही मनुष्य गन्धों को सूँघता है।

3.2.3

वाग्वै ग्रहः ।
स नाम्नातिग्रहेण गृहीतः ।
वाचा हि नामान्यभिवदति

vāgvai grahaḥ |
sa nāmnātigraheṇa gṛhītaḥ |
vācā hi nāmānyabhivadati

वाणी ग्रह है। वह नाम रूपी अतिग्रह से पकड़ी हुई है, क्योंकि वाणी से ही मनुष्य नामों का उच्चारण करता है।

3.2.4

जिह्वा वै ग्रहः ।
स रसेनातिग्रहेण गृहीतः ।
जिह्वया हि रसान् विजानाति

jihvā vai grahaḥ |
sa rasenātigraheṇa gṛhītaḥ |
jihvayā hi rasān vijānāti

जिह्वा ग्रह है। वह रस रूपी अतिग्रह से पकड़ी हुई है, क्योंकि जिह्वा से ही मनुष्य रसों को जानता है।

3.2.5

चक्षुर्वै ग्रहः ।
स रूपेणातिग्रहेण गृहीतः ।
चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति

cakṣurvai grahaḥ |
sa rūpeṇātigraheṇa gṛhītaḥ |
cakṣuṣā hi rūpāṇi paśyati

नेत्र ग्रह है। वह रूप रूपी अतिग्रह से पकड़ा हुआ है, क्योंकि नेत्र से ही मनुष्य रूपों को देखता है।

3.2.6

श्रोत्रं वै ग्रहः ।
स शब्देनातिग्रहेण गृहीतः ।
श्रोत्रेण हि शब्दाञ्शृणोति

śrotraṃ vai grahaḥ |
sa śabdenātigraheṇa gṛhītaḥ |
śrotreṇa hi śabdāñśṛṇoti

कान ग्रह है। वह शब्द रूपी अतिग्रह से पकड़ा हुआ है, क्योंकि कान से ही मनुष्य शब्दों को सुनता है।

3.2.7

मनो वै ग्रहः ।
स कामेनातिग्रहेण गृहीतः ।
मनसा हि कामान् कामयते

mano vai grahaḥ |
sa kāmenātigraheṇa gṛhītaḥ |
manasā hi kāmān kāmayate

मन ग्रह है। वह काम रूपी अतिग्रह से पकड़ा हुआ है, क्योंकि मन से ही मनुष्य कामनाएँ करता है।

3.2.8

हस्तौ वै ग्रहः ।
स कर्मणातिग्रहेण गृहीतः ।
हस्ताभ्यां हि कर्म करोति

hastau vai grahaḥ |
sa karmaṇātigraheṇa gṛhītaḥ |
hastābhyāṃ hi karma karoti

दोनों हाथ ग्रह हैं। वे कर्म रूपी अतिग्रह से पकड़े हुए हैं, क्योंकि हाथों से ही मनुष्य कर्म करता है।

3.2.9

त्वग्वै ग्रहः ।
स स्पर्शेनातिग्रहेण गृहीतः ।
त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत ।
इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः

tvagvai grahaḥ |
sa sparśenātigraheṇa gṛhītaḥ |
tvacā hi sparśān vedayata |
ityaṣṭau grahā aṣṭāvatigrahāḥ

त्वचा ग्रह है। वह स्पर्श रूपी अतिग्रह से पकड़ी हुई है, क्योंकि त्वचा से ही मनुष्य स्पर्शों का अनुभव करता है। ये ही आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं।

3.2.10

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित्सा देवता यस्या मृत्युरन्नमिति ।
अग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नम् ।
अप पुनर्मृत्युं जयति

yājñavalkyeti hovāca yadidaṃ sarvaṃ mṛtyorannaṃ kā svitsā devatā yasyā mṛtyurannamiti |
agnirvai mṛtyuḥ so'pāmannam |
apa punarmṛtyuṃ jayati

आर्तभाग ने कहा, याज्ञवल्क्य, जब यह सब मृत्यु का अन्न है, तो वह कौन सा देवता है जिसका अन्न स्वयं मृत्यु है? याज्ञवल्क्य बोले, अग्नि ही मृत्यु है, और वह जल का अन्न है। जो ऐसा जानता है वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है।

3.2.11

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात्प्राणाः क्रामन्त्याहो नेति ।
नेति होवाच याज्ञवल्क्यः ।
अत्रैव समवनीयन्ते ।
स उच्छ्वयति ।
आध्मायति ।
आध्मातो मृतः शेते

yājñavalkyeti hovāca yatrāyaṃ puruṣo mriyata udasmātprāṇāḥ krāmantyāho neti |
neti hovāca yājñavalkyaḥ |
atraiva samavanīyante |
sa ucchvayati |
ādhmāyati |
ādhmāto mṛtaḥ śete

याज्ञवल्क्य, जब यह पुरुष मरता है, तो क्या उसके प्राण उससे ऊपर निकल जाते हैं या नहीं? याज्ञवल्क्य ने कहा, नहीं। वे यहीं समा जाते हैं। वह फूल जाता है, वायु से भर जाता है, और फूला हुआ मृत शरीर पड़ा रहता है।

3.2.12

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते ।
किमेनं न जहातीति ।
नामेति ।
अनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवाः ।
अनन्तमेव स तेन लोकं जयति

yājñavalkyeti hovāca yatrāyaṃ puruṣo mriyate |
kimenaṃ na jahātīti |
nāmeti |
anantaṃ vai nāmānantā viśve devāḥ |
anantameva sa tena lokaṃ jayati

याज्ञवल्क्य, जब यह पुरुष मरता है, तब कौन सी वस्तु उसे नहीं छोड़ती? नाम। नाम अनन्त है, विश्वेदेव भी अनन्त हैं। उसके द्वारा वह अनन्त लोक जीतता है।

3.2.13

याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीति ।
आहर सौम्य हस्तम् आर्तभाग ।
आवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत्सजन इति ।
तौ होत्क्रम्य मन्त्रयां चक्राते ।
तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुः ।
अथ ह यत्प्रशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः ।
पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ।
ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम

yājñavalkyeti hovāca yatrāsya puruṣasya mṛtasyāgniṃ vāgapyeti vātaṃ prāṇaścakṣurādityaṃ manaścandraṃ diśaḥ śrotraṃ pṛthivīṃ śarīramākāśamātmauṣadhīrlomāni vanaspatīn keśā apsu lohitaṃ ca retaśca nidhīyate kvāyaṃ tadā puruṣo bhavatīti |
āhara saumya hastam ārtabhāga |
āvāmevaitasya vediṣyāvo na nāvetatsajana iti |
tau hotkramya mantrayāṃ cakrāte |
tau ha yadūcatuḥ karma haiva tadūcatuḥ |
atha ha yatpraśaṃsatuḥ karma haiva tatpraśaśaṃsatuḥ |
puṇyo vai puṇyena karmaṇā bhavati pāpaḥ pāpeneti |
tato ha jāratkārava ārtabhāga upararāma

याज्ञवल्क्य, जब इस मृत पुरुष की वाणी अग्नि में, प्राण वायु में, नेत्र सूर्य में, मन चन्द्रमा में, कान दिशाओं में, शरीर पृथ्वी में, आत्मा आकाश में, रोम ओषधियों में, केश वनस्पतियों में चले जाते हैं, और रक्त तथा वीर्य जल में रख दिए जाते हैं, तब यह पुरुष कहाँ रहता है? सौम्य आर्तभाग, अपना हाथ दो। इसे हम दोनों ही जानेंगे, यह भीड़ में कहने की बात नहीं। दोनों ने अलग जाकर विचार किया। उन्होंने जो कहा वह कर्म ही था, जिसकी प्रशंसा की वह कर्म ही था। पुण्य कर्म से मनुष्य पुण्यवान होता है, पाप कर्म से पापी। तब आर्तभाग चुप हो गए।

3.3.1

(भुज्युब्राह्मणम्)
अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ।
ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानैम ।
तस्यासीद्दुहिता गन्धर्वगृहीता ।
तमपृच्छाम कोऽसीति ।
सोऽब्रवीत्सुधन्वाङ्गिरस इति ।
तं यदा लोकानामन्तानपृच्छाम ।
अथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति ।
क्व पारिक्षिता अभवन् ।
स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य ।
क्व पारिक्षिता अभवन्निति

(bhujyubrāhmaṇam)
atha hainaṃ bhujyurlāhyāyaniḥ papraccha yājñavalkyeti hovāca madreṣu carakāḥ paryavrajāma |
te patañcalasya kāpyasya gṛhānaima |
tasyāsīdduhitā gandharvagṛhītā |
tamapṛcchāma ko'sīti |
so'bravītsudhanvāṅgirasa iti |
taṃ yadā lokānāmantānapṛcchāma |
athainamabrūma kva pārikṣitā abhavanniti |
kva pārikṣitā abhavan |
sa tvā pṛcchāmi yājñavalkya |
kva pārikṣitā abhavanniti

तब लह्य के वंशज भुज्यु ने उनसे पूछा, याज्ञवल्क्य, हम विद्या के लिए भ्रमण करते हुए मद्र देश में पतञ्चल काप्य के घर पहुँचे। उनकी पुत्री पर एक गन्धर्व का आवेश था। हमने उससे पूछा, तुम कौन हो? उसने कहा, मैं आङ्गिरस सुधन्वा हूँ। जब हमने उससे लोकों की सीमाओं के बारे में पूछा, तो यह भी पूछा कि परीक्षित के वंशज कहाँ गए? सो मैं तुमसे पूछता हूँ, याज्ञवल्क्य, परीक्षित के वंशज कहाँ गए?

3.3.2

स होवाच उवाच वै सः ।
अगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति ।
क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति ।
द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यान्ययं लोकः ।
तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति ।
तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति ।
तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्त्रं तावानन्तरेणाकाशः तानैन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत् ।
तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्निति ।
एवमिव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्माद्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिः ।
अप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ।
ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम

sa hovāca uvāca vai saḥ |
agacchan vai te tadyatrāśvamedhayājino gacchantīti |
kva nvaśvamedhayājino gacchantīti |
dvātriṃśataṃ vai devarathāhnyānyayaṃ lokaḥ |
taṃ samantaṃ pṛthivī dvistāvatparyeti |
tāṃ samantaṃ pṛthivīṃ dvistāvatsamudraḥ paryeti |
tadyāvatī kṣurasya dhārā yāvadvā makṣikāyāḥ pattraṃ tāvānantareṇākāśaḥ tānaindraḥ suparṇo bhūtvā vāyave prāyacchat |
tān vāyurātmani dhitvā tatrāgamayadyatrāśvamedhayājino'bhavanniti |
evamiva vai sa vāyumeva praśaśaṃsa tasmādvāyureva vyaṣṭirvāyuḥ samaṣṭiḥ |
apa punarmṛtyuṃ jayati ya evaṃ veda |
tato ha bhujyurlāhyāyanirupararāma

याज्ञवल्क्य ने कहा, उसने अवश्य कहा होगा कि वे वहाँ गए जहाँ अश्वमेध करने वाले जाते हैं। अश्वमेध करने वाले कहाँ जाते हैं? यह लोक सूर्य के रथ की बत्तीस दिनों की यात्रा जितना विस्तृत है। उसे चारों ओर से उससे दुगुनी पृथ्वी घेरे है, और उस पृथ्वी को चारों ओर से उतना ही दुगुना समुद्र घेरे है। दोनों के बीच छुरे की धार या मक्खी के पंख जितना सूक्ष्म आकाश है। इन्द्र ने पक्षी बनकर उन्हें वायु को सौंपा, और वायु ने उन्हें अपने में रखकर वहाँ पहुँचाया जहाँ अश्वमेध करने वाले रहते हैं। इस प्रकार उसने वायु की ही प्रशंसा की। वायु ही व्यष्टि है, वायु ही समष्टि है। जो ऐसा जानता है वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है। तब भुज्यु चुप हो गए।

3.4.1

(उषस्तब्राह्मणं वा निर्गुणात्मविद्याब्राह्मणम्)
अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ ।
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति ।
एष त आत्मा सर्वान्तरः ।
यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरः ।
योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरः ।
यो व्यानेन व्यनिति स त आत्मा सर्वान्तरः ।
य उदानेनोदनिति स त आत्मा सर्वान्तरः ।
एष त आत्मा सर्वान्तरः

(uṣastabrāhmaṇaṃ vā nirguṇātmavidyābrāhmaṇam)
atha hainamuṣastaścākrāyaṇaḥ papraccha |
yājñavalkyeti hovāca yatsākṣādaparokṣādbrahma ya ātmā sarvāntarastaṃ me vyācakṣveti |
eṣa ta ātmā sarvāntaraḥ |
yaḥ prāṇena prāṇiti sa ta ātmā sarvāntaraḥ |
yo'pānenāpāniti sa ta ātmā sarvāntaraḥ |
yo vyānena vyaniti sa ta ātmā sarvāntaraḥ |
ya udānenodaniti sa ta ātmā sarvāntaraḥ |
eṣa ta ātmā sarvāntaraḥ

तब चक्र के पुत्र उषस्त ने उनसे पूछा, याज्ञवल्क्य, जो साक्षात् और अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबके भीतर रहने वाला आत्मा है, उसे मुझे समझाओ। यह तुम्हारा आत्मा है जो सबके भीतर है। याज्ञवल्क्य, सबके भीतर कौन सा? जो प्राण से श्वास लेता है, वह तुम्हारा सर्वान्तर आत्मा है। जो अपान से श्वास छोड़ता है, जो व्यान से व्याप्त होता है, जो उदान से ऊपर उठता है, वही तुम्हारा सर्वान्तर आत्मा है। यही तुम्हारा आत्मा है जो सबके भीतर है।

3.4.2

स होवाचोषस्तश्चाक्रायणः यथा वै ब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति ।
यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति ।
एष त आत्मा सर्वान्तरः ।
कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरः ।
न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः ।
न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयाः ।
न मतेर्मन्तारं मन्वीथा ।
न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।
एष त आत्मा सर्वान्तरः ।
अतोऽन्यदार्तम् ।
ततो होषस्तश्चाक्रायण उपरराम

sa hovācoṣastaścākrāyaṇaḥ yathā vai brūyādasau gaurasāvaśva ityevamevaitadvyapadiṣṭaṃ bhavati |
yadeva sākṣādaparokṣādbrahma ya ātmā sarvāntarastaṃ me vyācakṣveti |
eṣa ta ātmā sarvāntaraḥ |
katamo yājñavalkya sarvāntaraḥ |
na dṛṣṭerdraṣṭāraṃ paśyeḥ |
na śruteḥ śrotāraṃ śṛṇuyāḥ |
na matermantāraṃ manvīthā |
na vijñātervijñātāraṃ vijānīyāḥ |
eṣa ta ātmā sarvāntaraḥ |
ato'nyadārtam |
tato hoṣastaścākrāyaṇa upararāma

उषस्त ने कहा, जैसे कोई कहे कि यह गाय है, यह घोड़ा है, वैसे ही तुमने संकेत भर कर दिया। जो साक्षात् और अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सर्वान्तर आत्मा है, उसे मुझे समझाओ। यह तुम्हारा आत्मा है जो सबके भीतर है। याज्ञवल्क्य, सबके भीतर कौन सा? तुम दृष्टि के द्रष्टा को नहीं देख सकते, श्रवण के श्रोता को नहीं सुन सकते, मनन के मन्ता का मनन नहीं कर सकते, विज्ञान के विज्ञाता को नहीं जान सकते। यही तुम्हारा सर्वान्तर आत्मा है। इसके अतिरिक्त सब कुछ दुःखमय है। तब उषस्त चुप हो गए।

3.5.1

अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच ।
यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेति ।
एष त आत्मा सर्वान्तरः ।
कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरः ।
योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति ।
एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।
या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणा ।
उभे ह्येते एषणे एव भवतः ।
तस्माद्ब्रामणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।
बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः ।
अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः ।
स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्तेनेदृश एव ।
अतोऽन्यदार्तम् ।
ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम

atha hainaṃ kaholaḥ kauṣītakeyaḥ papraccha yājñavalkyeti hovāca |
yadeva sākṣādaparokṣādbrahma ya ātmā sarvāntarastaṃ me vyācakṣveti |
eṣa ta ātmā sarvāntaraḥ |
katamo yājñavalkya sarvāntaraḥ |
yo'śanāyāpipāse śokaṃ mohaṃ jarāṃ mṛtyumatyeti |
etaṃ vai tamātmānaṃ viditvā brāhmaṇāḥ putraiṣaṇāyāśca vittaiṣaṇāyāśca lokaiṣaṇāyāśca vyutthāyātha bhikṣācaryaṃ caranti |
yā hyeva putraiṣaṇā sā vittaiṣaṇā yā vittaiṣaṇā sā lokaiṣaṇā |
ubhe hyete eṣaṇe eva bhavataḥ |
tasmādbrāmaṇaḥ pāṇḍityaṃ nirvidya bālyena tiṣṭhāset |
bālyaṃ ca pāṇḍityaṃ ca nirvidyātha muniḥ |
amaunaṃ ca maunaṃ ca nirvidyātha brāhmaṇaḥ |
sa brāhmaṇaḥ kena syādyena syāttenedṛśa eva |
ato'nyadārtam |
tato ha kaholaḥ kauṣītakeya upararāma

तब कुषीतक के वंशज कहोल ने पूछा, याज्ञवल्क्य, जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सर्वान्तर आत्मा है, उसे मुझे समझाओ। यह तुम्हारा आत्मा है जो सबके भीतर है। सबके भीतर कौन सा? जो भूख और प्यास, शोक और मोह, बुढ़ापे और मृत्यु से परे है। इसी आत्मा को जानकर ब्राह्मण पुत्र की कामना, धन की कामना और लोक की कामना से ऊपर उठकर भिक्षा का जीवन जीते हैं। जो पुत्र की कामना है वही धन की कामना है, जो धन की कामना है वही लोक की कामना है, दोनों कामनाएँ ही हैं। इसलिए ब्राह्मण पाण्डित्य को पूरा कर बालक के भाव में रहे। बालभाव और पाण्डित्य दोनों को पूरा कर वह मुनि होता है। मौन और अमौन दोनों को पूरा कर वह सच्चा ब्राह्मण होता है। वह ब्राह्मण कैसा आचरण करता है? जैसा भी करे, वह वैसा ही रहता है। इसके अतिरिक्त सब दुःखमय है। तब कहोल चुप हो गए।

3.6.1

(गार्गीब्राह्मणम्)
अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच ।
यदिदं सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति ।
वायौ गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेति ।
अन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओतश्च प्रोतश्चेति ।
गन्धर्वलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
अदित्यलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
चन्द्रलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
नक्षत्रलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
देवलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
इन्द्रलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खल्विन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
प्रजापतिलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
ब्रह्मलोकेषु गार्गीति ।
कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ।
स होवाच गार्गि मातिप्राक्षीः ।
मा ते मूर्धा व्यपप्तत् ।
अनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि ।
गार्गि मातिप्राक्षीरिति ।
ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम

(gārgībrāhmaṇam)
atha hainaṃ gārgī vācaknavī papraccha yājñavalkyeti hovāca |
yadidaṃ sarvamapsvotaṃ ca protaṃ ca kasminnu khalvāpa otāśca protāśceti |
vāyau gārgīti |
kasminnu khalu vāyurotaśca protaśceti |
antarikṣalokeṣu gārgīti |
kasminnu khalvantarikṣalokā otaśca protaśceti |
gandharvalokeṣu gārgīti |
kasminnu khalu gandharvalokā otāśca protāśceti |
adityalokeṣu gārgīti |
kasminnu khalvādityalokā otāśca protāśceti |
candralokeṣu gārgīti |
kasminnu khalu candralokā otāśca protāśceti |
nakṣatralokeṣu gārgīti |
kasminnu khalu nakṣatralokā otāśca protāśceti |
devalokeṣu gārgīti |
kasminnu khalu devalokā otāśca protāśceti |
indralokeṣu gārgīti |
kasminnu khalvindralokā otāśca protāśceti |
prajāpatilokeṣu gārgīti |
kasminnu khalu prajāpatilokā otāśca protāśceti |
brahmalokeṣu gārgīti |
kasminnu khalu brahmalokā otāśca protāśceti |
sa hovāca gārgi mātiprākṣīḥ |
mā te mūrdhā vyapaptat |
anatipraśnyāṃ vai devatāmatipṛcchasi |
gārgi mātiprākṣīriti |
tato ha gārgī vācaknavyupararāma

तब वचक्नु की पुत्री गार्गी ने पूछा, याज्ञवल्क्य, यह सब जल में ओतप्रोत है, तो जल किसमें ओतप्रोत है? वायु में, गार्गी। वायु किसमें? अन्तरिक्षलोकों में। अन्तरिक्षलोक किसमें? गन्धर्वलोकों में। गन्धर्वलोक आदित्यलोकों में, आदित्यलोक चन्द्रलोकों में, चन्द्रलोक नक्षत्रलोकों में, नक्षत्रलोक देवलोकों में, देवलोक इन्द्रलोकों में, इन्द्रलोक प्रजापतिलोकों में, और प्रजापतिलोक ब्रह्मलोकों में ओतप्रोत हैं। ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं? याज्ञवल्क्य बोले, गार्गी, अति प्रश्न मत करो, कहीं तुम्हारा मस्तक न गिर जाए। जिस देवता के विषय में अति प्रश्न नहीं करना चाहिए, उसके विषय में तुम अति प्रश्न कर रही हो। गार्गी, अति प्रश्न मत करो। तब गार्गी चुप हो गईं।

3.7.1

(उद्दालकब्राह्मणं, अन्तर्यामिब्राह्मणं वा सृष्टिप्रवेशब्राह्मणम्)
अथैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच ।
मद्रेष्ववसाम पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानाः ।
तस्यासीद्भार्या गन्धर्वगृहीता ।
तमपृच्छाम कोऽसीति ।
सोऽब्रवीत्कबन्ध आथर्वण इति ।
सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं यस्मिन्नयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्तीति ।
सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तद्भगवन् वेदेति ।
सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च ।
वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतान्यन्तरो यमयति ।
सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति ।
सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च ।
यो वै तत्काप्य सूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित्स लोकवित्स देववित्स वेदवित्स आत्मवित्स सर्ववित् ।
इति तेभ्योऽब्रवीत् ।
तदहं वेद ।
तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वांस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यति ।
वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति ।
यो वा इदं कश्च ब्रूयाद्वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति

(uddālakabrāhmaṇaṃ, antaryāmibrāhmaṇaṃ vā sṛṣṭipraveśabrāhmaṇam)
athainamuddālaka āruṇiḥ papraccha yājñavalkyeti hovāca |
madreṣvavasāma patañcalasya kāpyasya gṛheṣu yajñamadhīyānāḥ |
tasyāsīdbhāryā gandharvagṛhītā |
tamapṛcchāma ko'sīti |
so'bravītkabandha ātharvaṇa iti |
so'bravītpatañcalaṃ kāpyaṃ yājñikāṃśca vettha nu tvaṃ kāpya tatsūtraṃ yasminnayaṃ ca lokaḥ paraśca lokaḥ sarvāṇi ca bhūtāni saṃdṛbdhāni bhavantīti |
so'bravītpatañcalaḥ kāpyo nāhaṃ tadbhagavan vedeti |
so'bravītpatañcalaṃ kāpyaṃ yājñikāṃśca |
vettha nu tvaṃ kāpya tamantaryāmiṇaṃ ya imaṃ ca lokaṃ paraṃ ca lokaṃ sarvāṇi ca bhūtānyantaro yamayati |
so'bravītpatañcalaḥ kāpyo nāhaṃ taṃ bhagavan vedeti |
so'bravītpatañcalaṃ kāpyaṃ yājñikāṃśca |
yo vai tatkāpya sūtraṃ vidyāttaṃ cāntaryāmiṇamiti sa brahmavitsa lokavitsa devavitsa vedavitsa ātmavitsa sarvavit |
iti tebhyo'bravīt |
tadahaṃ veda |
taccettvaṃ yājñavalkya sūtramavidvāṃstaṃ cāntaryāmiṇaṃ brahmagavīrudajase mūrdhā te vipatiṣyati |
veda vā ahaṃ gautama tatsūtraṃ taṃ cāntaryāmiṇamiti |
yo vā idaṃ kaśca brūyādveda vedeti yathā vettha tathā brūhīti

तब अरुण के पुत्र उद्दालक ने पूछा, याज्ञवल्क्य, हम मद्र देश में पतञ्चल काप्य के घर यज्ञविद्या पढ़ते रहते थे। उनकी पत्नी पर कबन्ध आथर्वण नाम के गन्धर्व का आवेश था। उसने काप्य और याज्ञिकों से पूछा, क्या तुम उस सूत्र को जानते हो जिसमें यह लोक, परलोक और सब भूत गुँथे हैं? क्या तुम उस अन्तर्यामी को जानते हो जो भीतर रहकर इन सबका नियमन करता है? काप्य दोनों को नहीं जानते थे। गन्धर्व ने कहा, जो उस सूत्र और अन्तर्यामी को जानता है, वह ब्रह्म, लोकों, देवों, वेदों, आत्मा और सबको जानता है। मैं उन्हें जानता हूँ। याज्ञवल्क्य, यदि तुम उन्हें बिना जाने ब्रह्मवेत्ता की गायें ले जाओगे, तो तुम्हारा मस्तक गिर जाएगा। गौतम, मैं उस सूत्र और अन्तर्यामी को जानता हूँ। यह तो कोई भी कह सकता है कि मैं जानता हूँ, जैसा जानते हो वैसा बताओ।

3.7.2

स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रम् ।
वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति ।
तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यस्रंसिषतास्याङ्गानीति ।
वायुना हि गौतम सूत्रेण सम्दृब्धानि भवन्तीति ।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ।
अन्तर्यामिणं ब्रूहीति

sa hovāca vāyurvai gautama tatsūtram |
vāyunā vai gautama sūtreṇāyaṃ ca lokaḥ paraśca lokaḥ sarvāṇi ca bhūtāni saṃdṛbdhāni bhavanti |
tasmādvai gautama puruṣaṃ pretamāhurvyasraṃsiṣatāsyāṅgānīti |
vāyunā hi gautama sūtreṇa samdṛbdhāni bhavantīti |
evamevaitadyājñavalkya |
antaryāmiṇaṃ brūhīti

याज्ञवल्क्य बोले, गौतम, वायु ही वह सूत्र है। वायु रूपी सूत्र से ही यह लोक, परलोक और सब भूत गुँथे हुए हैं। इसीलिए जब कोई मरता है तो लोग कहते हैं कि इसके अंग ढीले पड़ गए, क्योंकि वे वायु रूपी सूत्र से ही बँधे थे। ठीक है, याज्ञवल्क्य। अब अन्तर्यामी का वर्णन करो।

3.7.3

यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yaḥ pṛthivyāṃ tiṣṭhan pṛthivyā antaro yaṃ pṛthivī na veda yasya pṛthivī śarīraṃ yaḥ pṛthivīmantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो पृथ्वी में रहता हुआ भी पृथ्वी से भिन्न है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती, पृथ्वी जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर पृथ्वी का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.4

योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo'psu tiṣṭhannadbhyo'ntaro yamāpo na viduryasyāpaḥ śarīraṃ yo'po'ntaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो जल में रहता हुआ भी जल से भिन्न है, जिसे जल नहीं जानता, जल जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर जल का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.5

योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo'gnau tiṣṭhannagnerantaro yamagnirna veda yasyāgniḥ śarīraṃ yo'gnimantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो अग्नि में रहता हुआ भी अग्नि से भिन्न है, जिसे अग्नि नहीं जानती, अग्नि जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर अग्नि का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.6

योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्षं शरीरं योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo'ntarikṣe tiṣṭhannantarikṣādantaro yamantarikṣaṃ na veda yasyāntarikṣaṃ śarīraṃ yo'ntarikṣamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो अन्तरिक्ष में रहता हुआ भी अन्तरिक्ष से भिन्न है, जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर अन्तरिक्ष का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.7

यो वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo vāyau tiṣṭhan vāyorantaro yaṃ vāyurna veda yasya vāyuḥ śarīraṃ yo vāyumantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो वायु में रहता हुआ भी वायु से भिन्न है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर वायु का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.8

यो दिवि तिष्ठन् दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo divi tiṣṭhan divo'ntaro yaṃ dyaurna veda yasya dyauḥ śarīraṃ yo divamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो द्युलोक में रहता हुआ भी द्युलोक से भिन्न है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर द्युलोक का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.9

य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

ya āditye tiṣṭhannādityādantaro yamādityo na veda yasyādityaḥ śarīraṃ ya ādityamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो आदित्य में रहता हुआ भी आदित्य से भिन्न है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर आदित्य का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.10

यो दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo dikṣu tiṣṭhan digbhyo'ntaro yaṃ diśo na viduryasya diśaḥ śarīraṃ yo diśo'ntaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो दिशाओं में रहता हुआ भी दिशाओं से भिन्न है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं, जो भीतर रहकर दिशाओं का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.11

यश्चन्द्रतारके तिष्ठञ्चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्रतारकं शरीरं यश्चन्द्रतारकमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yaścandratārake tiṣṭhañcandratārakādantaro yaṃ candratārakaṃ na veda yasya candratārakaṃ śarīraṃ yaścandratārakamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो चन्द्रमा और तारों में रहता हुआ भी उनसे भिन्न है, जिसे चन्द्रमा और तारे नहीं जानते, वे जिसका शरीर हैं, जो भीतर रहकर उनका नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.12

य आकाशे तिष्ठन्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

ya ākāśe tiṣṭhannākāśādantaro yamākāśo na veda yasyākāśaḥ śarīraṃ ya ākāśamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो आकाश में रहता हुआ भी आकाश से भिन्न है, जिसे आकाश नहीं जानता, आकाश जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर आकाश का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.13

यस्तमसि तिष्ठंस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yastamasi tiṣṭhaṃstamaso'ntaro yaṃ tamo na veda yasya tamaḥ śarīraṃ yastamo'ntaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो अन्धकार में रहता हुआ भी अन्धकार से भिन्न है, जिसे अन्धकार नहीं जानता, अन्धकार जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर अन्धकार का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.14

यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yastejasi tiṣṭhaṃstejaso'ntaro yaṃ tejo na veda yasya tejaḥ śarīraṃ yastejo'ntaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो तेज में रहता हुआ भी तेज से भिन्न है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर तेज का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.15

अथाधिभूतम् ।
यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भुतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।
इत्यधिभूतम्

athādhibhūtam |
yaḥ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhan sarvebhyo bhūtebhyo'ntaro yaṃ sarvāṇi bhūtāni na viduryasya sarvāṇi bhutāni śarīraṃ yaḥ sarvāṇi bhūtānyantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ |
ityadhibhūtam

अब भूतों के सम्बन्ध में। जो सब भूतों में रहता हुआ भी सब भूतों से भिन्न है, जिसे कोई भूत नहीं जानता, सब भूत जिसका शरीर हैं, जो भीतर रहकर सब भूतों का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है। यह अधिभूत हुआ।

3.7.16

अथाध्यात्मम् । यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयति एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

athādhyātmam | yaḥ prāṇe tiṣṭhan prāṇādantaro yaṃ prāṇo na veda yasya prāṇaḥ śarīraṃ yaḥ prāṇamantaro yamayati eṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

अब शरीर के सम्बन्ध में। जो प्राण में रहता हुआ भी प्राण से भिन्न है, जिसे प्राण नहीं जानता, प्राण जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर प्राण का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.17

यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ्न वेद यस्य वाक्शरीरं यो वाचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo vāci tiṣṭhan vāco'ntaro yaṃ vāṅna veda yasya vākśarīraṃ yo vācamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो वाणी में रहता हुआ भी वाणी से भिन्न है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर वाणी का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.18

यश्चक्षुषि तिष्ठञ्चक्षुषोऽन्तरो यं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yaścakṣuṣi tiṣṭhañcakṣuṣo'ntaro yaṃ cakṣurna veda yasya cakṣuḥ śarīraṃ yaścakṣurantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो नेत्र में रहता हुआ भी नेत्र से भिन्न है, जिसे नेत्र नहीं जानता, नेत्र जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर नेत्र का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.19

यः श्रोत्रे तिष्ठञ्छ्रोत्रादन्तरो यं श्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्रं शरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yaḥ śrotre tiṣṭhañchrotrādantaro yaṃ śrotraṃ na veda yasya śrotraṃ śarīraṃ yaḥ śrotramantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो कान में रहता हुआ भी कान से भिन्न है, जिसे कान नहीं जानता, कान जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर कान का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.20

यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo manasi tiṣṭhanmanaso'ntaro yaṃ mano na veda yasya manaḥ śarīraṃ yo mano'ntaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो मन में रहता हुआ भी मन से भिन्न है, जिसे मन नहीं जानता, मन जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर मन का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.21

यस्त्वचि तिष्ठंस्त्वचोऽन्तरो यं त्वङ्न वेद यस्य त्वक्शरीरं यस्त्वचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yastvaci tiṣṭhaṃstvaco'ntaro yaṃ tvaṅna veda yasya tvakśarīraṃ yastvacamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो त्वचा में रहता हुआ भी त्वचा से भिन्न है, जिसे त्वचा नहीं जानती, त्वचा जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर त्वचा का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.22

यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः

yo vijñāne tiṣṭhan vijñānādantaro yaṃ vijñānaṃ na veda yasya vijñānaṃ śarīraṃ yo vijñānamantaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ

जो विज्ञान, अर्थात् बुद्धि, में रहता हुआ भी उससे भिन्न है, जिसे विज्ञान नहीं जानता, विज्ञान जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर विज्ञान का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है।

3.7.23

यो रेतसि तिष्ठं रेतसोऽन्तरो यं रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।
अदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञतो विज्ञाता ।
नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता ।
एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।
अतोऽन्यदार्तम् ।
ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम

yo retasi tiṣṭhaṃ retaso'ntaro yaṃ reto na veda yasya retaḥ śarīraṃ yo reto'ntaro yamayatyeṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ |
adṛṣṭo draṣṭāśrutaḥ śrotāmato mantāvijñato vijñātā |
nānyo'to'sti draṣṭā nānyo'to'sti śrotā nānyo'to'sti mantā nānyo'to'sti vijñātā |
eṣa ta ātmāntaryāmyamṛtaḥ |
ato'nyadārtam |
tato hoddālaka āruṇirupararāma

जो वीर्य में रहता हुआ भी वीर्य से भिन्न है, जिसे वीर्य नहीं जानता, वीर्य जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर वीर्य का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है। वह देखा नहीं जाता पर स्वयं देखता है, सुना नहीं जाता पर सुनता है, मनन का विषय नहीं पर मनन करता है, जाना नहीं जाता पर जानता है। उससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं, कोई श्रोता नहीं, कोई मन्ता नहीं, कोई विज्ञाता नहीं। वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है। उसके अतिरिक्त सब दुःखमय है। तब उद्दालक आरुणि चुप हो गए।

3.8.1

(वाचक्नवीब्राह्मणं, अक्षरब्राह्मणं वा सृष्टिप्रवेशब्राह्मणम्)
अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि ।
तौ चेन्मे विवक्ष्यति ।
न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति ।
पृच्छ गार्गीति

(vācaknavībrāhmaṇaṃ, akṣarabrāhmaṇaṃ vā sṛṣṭipraveśabrāhmaṇam)
atha ha vācaknavyuvāca brāhmaṇā bhagavanto hantāhamimaṃ dvau praśnau prakṣyāmi |
tau cenme vivakṣyati |
na vai jātu yuṣmākamimaṃ kaścidbrahmodyaṃ jeteti |
pṛccha gārgīti

तब वाचक्नवी गार्गी ने कहा, पूज्य ब्राह्मणो, मैं इनसे दो प्रश्न पूछूँगी। यदि ये उनका उत्तर दे दें, तो आप में से कोई भी ब्रह्मविषयक चर्चा में इन्हें कभी नहीं जीत सकेगा। याज्ञवल्क्य ने कहा, पूछो गार्गी।

3.8.2

सा होवाच अहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थाम् ।
तौ मे ब्रूहीति ।
पृच्छ गार्गीति

sā hovāca ahaṃ vai tvā yājñavalkya yathā kāśyo vā vaideho vograputra ujjyaṃ dhanuradhijyaṃ kṛtvā dvau bāṇavantau sapatnātivyādhinau haste kṛtvopottiṣṭhedevamevāhaṃ tvā dvābhyāṃ praśnābhyāmupodasthām |
tau me brūhīti |
pṛccha gārgīti

गार्गी बोलीं, याज्ञवल्क्य, जैसे काशी या विदेह का कोई वीर पुत्र अपने उतरे हुए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर, शत्रु को बेधने वाले दो बाण हाथ में लेकर सामने खड़ा हो, वैसे ही मैं दो प्रश्न लेकर तुम्हारे सामने खड़ी हूँ। उनका उत्तर दो। पूछो गार्गी।

3.8.3

सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति

sā hovāca yadūrdhvaṃ yājñavalkya divo yadavākpṛthivyā yadantarā dyāvāpṛthivī ime yadbhūtaṃ ca bhavacca bhaviṣyaccetyācakṣate kasmiṃstadotaṃ ca protaṃ ceti

गार्गी बोलीं, याज्ञवल्क्य, जो द्युलोक से ऊपर है, जो पृथ्वी से नीचे है, जो इन दोनों के बीच है, और जिसे लोग भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह किसमें ओतप्रोत है?

3.8.4

स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति

sa hovāca yadūrdhvaṃ gārgi divo yadavākpṛthivyā yadantarā dyāvāpṛthivī ime yadbhūtaṃ ca bhavacca bhaviṣyaccetyācakṣata ākāśe tadotaṃ ca protaṃ ceti

याज्ञवल्क्य बोले, गार्गी, जो द्युलोक से ऊपर, पृथ्वी से नीचे और दोनों के बीच है, जिसे लोग भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह आकाश में ओतप्रोत है।

3.8.5

सा होवच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति

sā hovaca namaste'stu yājñavalkya yo ma etaṃ vyavoco'parasmai dhārayasveti pṛccha gārgīti

गार्गी बोलीं, याज्ञवल्क्य, तुम्हें नमस्कार, तुमने मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे दिया। अब दूसरे के लिए तैयार हो जाओ। पूछो गार्गी।

3.8.6

सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति

sā hovāca yadūrdhvaṃ yājñavalkya divo yadavākpṛthivyā yadantarā dyāvāpṛthivī ime yadbhūtaṃ ca bhavacca bhaviṣyaccetyācakṣate kasmiṃstadotaṃ ca protaṃ ceti

गार्गी बोलीं, याज्ञवल्क्य, जो द्युलोक से ऊपर है, जो पृथ्वी से नीचे है, जो इन दोनों के बीच है, और जिसे लोग भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह किसमें ओतप्रोत है?

3.8.7

स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति ।
कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति

sa hovāca yadūrdhvaṃ gārgi divo yadavākpṛthivyā yadantarā dyāvāpṛthivī ime yadbhūtaṃ ca bhavacca bhaviṣyaccetyācakṣata ākāśa eva tadotaṃ ca protaṃ ceti |
kasminnu khalvākāśa otaśca protaśceti

याज्ञवल्क्य बोले, गार्गी, जो द्युलोक से ऊपर, पृथ्वी से नीचे और दोनों के बीच है, जिसे लोग भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह आकाश में ही ओतप्रोत है। तो आकाश किसमें ओतप्रोत है?

3.8.8

स होवाच एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखमगात्रमनन्तरमबाह्यम् ।
न तदश्नाति किं चन ।
न तदश्नाति कश्चन

sa hovāca etadvai tadakṣaraṃ gārgi brāhmaṇā abhivadantyasthūlamanaṇvahrasvamadīrghamalohitamasnehamacchāyamatamo'vāyvanākāśamasaṅgamarasamagandhamacakṣuṣkamaśrotramavāgamano'tejaskamaprāṇamamukhamagātramanantaramabāhyam |
na tadaśnāti kiṃ cana |
na tadaśnāti kaścana

याज्ञवल्क्य बोले, गार्गी, उसी को ब्रह्मवेत्ता अक्षर, अर्थात् अविनाशी, कहते हैं। वह न स्थूल है न सूक्ष्म, न छोटा न लम्बा, न अग्नि जैसा लाल न जल जैसा स्निग्ध। वह छायारहित, अन्धकाररहित, वायुरहित, आकाशरहित और संगरहित है। उसमें न रस है न गन्ध, न नेत्र न कान, न वाणी न मन, न तेज न प्राण, न मुख न माप। उसका न भीतर है न बाहर। वह कुछ नहीं खाता और उसे कोई नहीं खाता।

3.8.9

एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्यचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः ।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः ।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्ति ।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां च दिशमनु ।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि मनुष्याः प्रशसन्ति यजमानं देवा दर्वीं पितरोऽन्वायत्ताः वा अक्षरस्य्

etasya vā akṣarasya praśāsane gārgi sūryacandramasau vidhṛtau tiṣṭhataḥ |
etasya vā akṣarasya praśāsane gārgi dyāvāpṛthivyau vidhṛte tiṣṭhataḥ |
etasya vā akṣarasya praśāsane gārgi nimeṣā muhūrtā ahorātrāṇyardhamāsā māsā ṛtavaḥ saṃvatsarā iti vidhṛtāstiṣṭhanti |
etasya vā akṣarasya praśāsane gārgi prācyo'nyā nadyaḥ syandante śvetebhyaḥ parvatebhyaḥ pratīcyo'nyā yāṃ yāṃ ca diśamanu |
etasya vā akṣarasya praśāsane gārgi manuṣyāḥ praśasanti yajamānaṃ devā darvīṃ pitaro'nvāyattāḥ vā akṣarasy

गार्गी, इसी अक्षर के प्रशासन में सूर्य और चन्द्रमा धारण किए हुए स्थित हैं। इसी के प्रशासन में द्युलोक और पृथ्वी धारण किए हुए स्थित हैं। इसी के प्रशासन में निमेष, मुहूर्त, दिन रात, पक्ष, मास, ऋतुएँ और संवत्सर धारण किए हुए स्थित हैं। इसी के प्रशासन में कुछ नदियाँ श्वेत पर्वतों से पूर्व की ओर बहती हैं, कुछ पश्चिम की ओर, और कुछ अपनी अपनी दिशा में। गार्गी, इसी अक्षर के प्रशासन में मनुष्य दाता की प्रशंसा करते हैं, देवता यजमान पर और पितर दर्वी, अर्थात् आहुति की कलछी, पर आश्रित रहते हैं।

3.8.10

यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति
यो वा एतदक्षरमविदित्वा गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः ।
अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः

yo vā etadakṣaraṃ gārgyaviditvāsmiṃlloke juhoti yajate tapastapyate bahūni varṣasahasrāṇyantavadevāsya tadbhavati
yo vā etadakṣaramaviditvā gārgyaviditvāsmāllokātpraiti sa kṛpaṇaḥ |
atha ya etadakṣaraṃ gārgi viditvāsmāllokātpraiti sa brāhmaṇaḥ

गार्गी, जो इस अक्षर को जाने बिना इस लोक में हवन करता है, यज्ञ करता है और अनेक सहस्र वर्षों तक तप करता है, उसका वह सब फल नाशवान ही होता है। जो इस अक्षर को जाने बिना इस लोक से जाता है, वह कृपण, अर्थात् दया का पात्र, है। और गार्गी, जो इस अक्षर को जानकर इस लोक से जाता है, वही ब्राह्मण है।

3.8.11

तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ ।
नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ ।
नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ ।
नान्यदतोऽस्ति मन्तृ ।
नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ ।
एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च

tadvā etadakṣaraṃ gārgyadṛṣṭaṃ draṣṭraśrutaṃ śrotramataṃ mantravijñātaṃ vijñātṛ |
nānyadato'sti draṣṭṛ |
nānyadato'sti śrotṛ |
nānyadato'sti mantṛ |
nānyadato'sti vijñātṛ |
etasminnu khalvakṣare gārgyākāśa otaśca protaśca

गार्गी, यह अक्षर देखा नहीं जाता पर स्वयं द्रष्टा है, सुना नहीं जाता पर श्रोता है, मनन का विषय नहीं पर मन्ता है, जाना नहीं जाता पर विज्ञाता है। इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं, कोई श्रोता नहीं, कोई मन्ता नहीं, कोई विज्ञाता नहीं। गार्गी, इसी अक्षर में आकाश ओतप्रोत है।

3.8.12

सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वम् ।
न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति ।
ततो ह वाचक्नव्युपरराम

sā hovāca brāhmaṇā bhagavantastadeva bahu manyadhvaṃ yadasmānnamaskāreṇa mucyedhvam |
na vai jātu yuṣmākamimaṃ kaścidbrahmodyaṃ jeteti |
tato ha vācaknavyupararāma

गार्गी बोलीं, पूज्य ब्राह्मणो, यदि आप इन्हें नमस्कार करके ही छूट जाएँ, तो इसी को बड़ी बात समझिए। आप में से कोई भी ब्रह्मविषयक चर्चा में इन्हें कभी नहीं जीत सकेगा। तब वाचक्नवी चुप हो गईं।

3.9.1

(शाकल्यब्राह्मणग्रन्थो वा शाकल्यब्राह्मणम्)
अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति ।
स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते ।
त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ।
ओमिति होवाच ।
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति ।
त्रयस्त्रिंशदिति ।
ओमिति होवाच ।
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति ।
षडिति ।
ओमिति होवाच ।
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति ।
त्रय इति ।
ओमिति होवाच ।
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति ।
द्वाविति ।
ओमिति होवाच ।
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति ।
अध्यर्ध इति ।
ओमिति होवाच ।
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति ।
एक इति ।
ओमिति होवाच ।
कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति

(śākalyabrāhmaṇagrantho vā śākalyabrāhmaṇam)
atha hainaṃ vidagdhaḥ śākalyaḥ papraccha kati devā yājñavalkyeti |
sa haitayaiva nividā pratipede yāvanto vaiśvadevasya nividyucyante |
trayaśca trī ca śatā trayaśca trī ca sahasreti |
omiti hovāca |
katyeva devā yājñavalkyeti |
trayastriṃśaditi |
omiti hovāca |
katyeva devā yājñavalkyeti |
ṣaḍiti |
omiti hovāca |
katyeva devā yājñavalkyeti |
traya iti |
omiti hovāca |
katyeva devā yājñavalkyeti |
dvāviti |
omiti hovāca |
katyeva devā yājñavalkyeti |
adhyardha iti |
omiti hovāca |
katyeva devā yājñavalkyeti |
eka iti |
omiti hovāca |
katame te trayaśca trī ca śatā trayaśca trī ca sahasreti

तब विदग्ध शाकल्य ने पूछा, याज्ञवल्क्य, देवता कितने हैं? याज्ञवल्क्य ने वैश्वदेव शस्त्र की निविद् के अनुसार उत्तर दिया, तीन सौ तीन और तीन हज़ार तीन। शाकल्य बोले, ठीक। याज्ञवल्क्य, वस्तुतः देवता कितने हैं? तैंतीस। ठीक। वस्तुतः कितने? छह। ठीक। वस्तुतः कितने? तीन। ठीक। वस्तुतः कितने? दो। ठीक। वस्तुतः कितने? डेढ़। ठीक। वस्तुतः कितने? एक। ठीक। तो वे तीन सौ तीन और तीन हज़ार तीन कौन से हैं?

3.9.2

स होवाच महिमान एवैषामेते ।
त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति ।
कतमे ते त्रयस्त्रिंशदिति ।
अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्याः त एकत्रिंशदैन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति

sa hovāca mahimāna evaiṣāmete |
trayastriṃśattveva devā iti |
katame te trayastriṃśaditi |
aṣṭau vasava ekādaśa rudrā dvādaśādityāḥ ta ekatriṃśadaindraścaiva prajāpatiśca trayastriṃśāviti

याज्ञवल्क्य बोले, वे तो इनकी महिमाएँ, अर्थात् विभूतियाँ, हैं। देवता तैंतीस ही हैं। वे तैंतीस कौन से? आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य, ये इकतीस हुए। इन्द्र और प्रजापति मिलाकर तैंतीस होते हैं।

3.9.3

कतमे वसव इति ।
अग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौः च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसवः ।
एतेषु हीदं सर्वं वसु हितं इति तस्माद्वसव इति

katame vasava iti |
agniśca pṛthivī ca vāyuścāntarikṣaṃ cādityaśca dyauḥ ca candramāśca nakṣatrāṇi caite vasavaḥ |
eteṣu hīdaṃ sarvaṃ vasu hitaṃ iti tasmādvasava iti

वसु कौन से हैं? अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और नक्षत्र, ये वसु हैं। इन्हीं में यह सब जगत् रूपी धन बसा हुआ है, इसीलिए ये वसु कहलाते हैं।

3.9.4

कतमे रुद्रा इति ।
दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः ।
ते यदास्माच्छरीरान्मर्त्यादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति ।
तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति

katame rudrā iti |
daśeme puruṣe prāṇā ātmaikādaśaḥ |
te yadāsmāccharīrānmartyādutkrāmantyatha rodayanti |
tadyadrodayanti tasmādrudrā iti

रुद्र कौन से हैं? पुरुष में रहने वाले दस प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा, अर्थात् मन। जब ये इस मरणशील शरीर से निकलते हैं तब लोगों को रुलाते हैं। रुलाने के कारण ही ये रुद्र कहलाते हैं।

3.9.5

कतम आदित्या इति ।
द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्याः ।
एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति ।
ते यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति

katama ādityā iti |
dvādaśa vai māsāḥ saṃvatsarasyaita ādityāḥ |
ete hīdaṃ sarvamādadānā yanti |
te yadidaṃ sarvamādadānā yanti tasmādādityā iti

आदित्य कौन से हैं? संवत्सर के बारह मास ही आदित्य हैं, क्योंकि ये सब कुछ लेते हुए चलते हैं। सबको ग्रहण करते हुए चलने के कारण ही ये आदित्य कहलाते हैं।

3.9.6

कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति ।
स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति ।
कतमः स्तनयित्नुरिति ।
अशनिरिति ।
कतमो यज्ञ इति ।
पशव इति

katama indraḥ katamaḥ prajāpatiriti |
stanayitnurevendro yajñaḥ prajāpatiriti |
katamaḥ stanayitnuriti |
aśaniriti |
katamo yajña iti |
paśava iti

इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन? मेघगर्जन ही इन्द्र है, यज्ञ ही प्रजापति है। मेघगर्जन क्या है? वज्र, अर्थात् बिजली। यज्ञ क्या है? पशु।

3.9.7

कतमे षडिति ।
अग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षश्चादित्यश्च द्यौश्चैते षट् ।
एते हीदं सर्वं षडिति

katame ṣaḍiti |
agniśca pṛthivī ca vāyuścāntarikṣaścādityaśca dyauścaite ṣaṭ |
ete hīdaṃ sarvaṃ ṣaḍiti

छह कौन से हैं? अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक, ये छह हैं। यह सब इन्हीं छह में समाया है।

3.9.8

कतमे ते त्रयो देवा इति ।
इम एव त्रयो लोकाः ।
एषु हीमे सर्वे देवा इति ।
कतमौ तौ द्वौ देवा इति ।
अन्नं चैव प्राणश्चेति ।
कतमोऽध्यर्ध इति ।
योऽयं पवत इति

katame te trayo devā iti |
ima eva trayo lokāḥ |
eṣu hīme sarve devā iti |
katamau tau dvau devā iti |
annaṃ caiva prāṇaśceti |
katamo'dhyardha iti |
yo'yaṃ pavata iti

तीन देवता कौन से हैं? ये तीन लोक ही, क्योंकि इन्हीं में सब देवता रहते हैं। दो देवता कौन से? अन्न और प्राण। डेढ़ देवता कौन? यह जो बहता है, अर्थात् वायु।

3.9.9

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवते ।
अथ कथमध्यर्ध इति ।
यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति ।
कतम एको देव इति ।
प्राण इति ।
स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते

tadāhuryadayameka ivaiva pavate |
atha kathamadhyardha iti |
yadasminnidaṃ sarvamadhyārdhnottenādhyardha iti |
katama eko deva iti |
prāṇa iti |
sa brahma tyadityācakṣate

लोग कहते हैं कि यह वायु तो एक ही की भाँति बहता है, फिर डेढ़ कैसे? क्योंकि इसी में यह सब समृद्ध हुआ, इसलिए यह अध्यर्ध, अर्थात् डेढ़, कहलाता है। एक देवता कौन है? प्राण। उसी को ब्रह्म, त्यत्, अर्थात् वह, कहते हैं।

3.9.10

पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायं शारीरः पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
अमृतमिति होवाच

pṛthivyeva yasyāyatanamagnirloko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyaṃ śārīraḥ puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
amṛtamiti hovāca

शाकल्य ने कहा, जिस पुरुष का आयतन पृथ्वी है, लोक अग्नि है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। याज्ञवल्क्य बोले, जिसे तुम सबकी आत्मा का परम आश्रय कहते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। यह शरीर में रहने वाला पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, अमृत।

3.9.11

काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायं काममयः पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
स्त्रिय इति होवाच

kāma eva yasyāyatanaṃ hṛdayaṃ loko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyaṃ kāmamayaḥ puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
striya iti hovāca

जिस पुरुष का आयतन काम है, लोक हृदय है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। यह काममय पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, स्त्रियाँ।

3.9.12

रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवासावादित्ये पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
सत्यमिति होवाच

rūpāṇyeva yasyāyatanaṃ cakṣurloko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāsāvāditye puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
satyamiti hovāca

जिस पुरुष का आयतन रूप है, लोक नेत्र है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। वह आदित्य में स्थित पुरुष ही है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, सत्य।

3.9.13

आकश एव यस्यायतनं श्रोत्रं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायं श्रौतः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
दिश इति होवच

ākaśa eva yasyāyatanaṃ śrotraṃ loko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyaṃ śrautaḥ prātiśrutkaḥ puruṣaḥ sa eṣa |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
diśa iti hovaca

जिस पुरुष का आयतन आकाश है, लोक कान है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। श्रवण और प्रतिध्वनि में रहने वाला पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, दिशाएँ।

3.9.14

तम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायं छायामयः पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
मृत्युरिति होवाच

tama eva yasyāyatanaṃ hṛdayaṃ loko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyaṃ chāyāmayaḥ puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
mṛtyuriti hovāca

जिस पुरुष का आयतन अन्धकार है, लोक हृदय है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। छायामय पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, मृत्यु।

3.9.15

रूपाण्येव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायमादर्शे पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
सत्यमिति होवाच

rūpāṇyeva yasyāyatanaṃ hṛdayaṃ loko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyamādarśe puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
satyamiti hovāca

जिस पुरुष का आयतन रूप है, लोक हृदय है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। दर्पण में दिखने वाला पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, असु, अर्थात् प्राण।

3.9.16

आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायं अप्सु पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
वरुण इति होवाच

āpa eva yasyāyatanaṃ hṛdayaṃ loko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyaṃ apsu puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
varuṇa iti hovāca

जिस पुरुष का आयतन जल है, लोक हृदय है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। जल में रहने वाला पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, वरुण।

3.9.17

रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् ।
याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ ।
य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एषः ।
वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति ।
प्रजापतिरिति होवाच

reta eva yasyāyatanaṃ hṛdayaṃ loko mano jyotiryo vai taṃ puruṣaṃ vidyātsarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ sa vai veditā syāt |
yājñavalkya veda vā ahaṃ taṃ puruṣaṃ sarvasyātmanaḥ parāyaṇaṃ yamāttha |
ya evāyaṃ putramayaḥ puruṣaḥ sa eṣaḥ |
vadaiva śākalya tasya kā devateti |
prajāpatiriti hovāca

जिस पुरुष का आयतन वीर्य है, लोक हृदय है, ज्योति मन है, जो हर आत्मा का परम आश्रय है, उसे जो जानता है वही ज्ञाता है। जिसकी तुम बात करते हो, उस पुरुष को मैं जानता हूँ। पुत्र रूप पुरुष ही वह है। शाकल्य, बताओ, उसका देवता कौन है? शाकल्य बोले, प्रजापति।

3.9.18

शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यः ।
त्वां स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयणमक्रता३ इति

śākalyeti hovāca yājñavalkyaḥ |
tvāṃ svidime brāhmaṇā aṅgārāvakṣayaṇamakratā3 iti

याज्ञवल्क्य ने कहा, शाकल्य, क्या इन ब्राह्मणों ने तुम्हें अंगारे उठाने का चिमटा बना लिया है?

3.9.19

याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यः ।
यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मनानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति ।
दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति ।
यद्दिशो वेत्थ सदेवाः सप्रतिष्ठाः

yājñavalkyeti hovāca śākalyaḥ |
yadidaṃ kurupañcālānāṃ brāhmanānatyavādīḥ kiṃ brahma vidvāniti |
diśo veda sadevāḥ sapratiṣṭhā iti |
yaddiśo vettha sadevāḥ sapratiṣṭhāḥ

शाकल्य ने कहा, याज्ञवल्क्य, तुम किस ब्रह्मज्ञान के बल पर कुरु और पांचाल के ब्राह्मणों से बढ़कर बोले हो? मैं देवताओं और आधारों सहित दिशाओं को जानता हूँ। यदि तुम देवताओं और आधारों सहित दिशाओं को जानते हो, तो बताओ,

3.9.20

किंदेवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीति ।
आदित्यदेवत इति ।
स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ।
चक्षुषीति ।
कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति ।
रूपेष्विति ।
चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ।
कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति ।
हृदय इति होवाच ।
हृदयेन हि रूपाणि जानाति ।
हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीति ।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य

kiṃdevato'syāṃ prācyāṃ diśyasīti |
ādityadevata iti |
sa ādityaḥ kasmin pratiṣṭhita iti |
cakṣuṣīti |
kasminnu cakṣuḥ pratiṣṭhitamiti |
rūpeṣviti |
cakṣuṣā hi rūpāṇi paśyati |
kasminnu rūpāṇi pratiṣṭhitānīti |
hṛdaya iti hovāca |
hṛdayena hi rūpāṇi jānāti |
hṛdaye hyeva rūpāṇi pratiṣṭhitāni bhavantīti |
evamevaitadyājñavalkya

इस पूर्व दिशा में तुम किस देवता के रूप में हो? आदित्य देवता के रूप में। वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है? नेत्र में। नेत्र किसमें प्रतिष्ठित है? रूपों में, क्योंकि नेत्र से ही रूप देखे जाते हैं। रूप किसमें प्रतिष्ठित हैं? याज्ञवल्क्य बोले, हृदय में, क्योंकि हृदय से ही रूपों को जाना जाता है, रूप हृदय में ही प्रतिष्ठित हैं। ठीक है, याज्ञवल्क्य।

3.9.21

किंदेवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति ।
यमदेवत इति ।
स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ।
यज्ञ इति ।
कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति ।
दक्षिणायामिति ।
कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति ।
श्रद्धायामिति ।
यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति ।
श्रद्धायां ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति ।
कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति ।
हृदय इति होवाच ।
हृदयेन हि श्रद्धाम् ।
हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीति ।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य

kiṃdevato'syāṃ dakṣiṇāyāṃ diśyasīti |
yamadevata iti |
sa yamaḥ kasmin pratiṣṭhita iti |
yajña iti |
kasminnu yajñaḥ pratiṣṭhita iti |
dakṣiṇāyāmiti |
kasminnu dakṣiṇā pratiṣṭhiteti |
śraddhāyāmiti |
yadā hyeva śraddhatte'tha dakṣiṇāṃ dadāti |
śraddhāyāṃ hyeva dakṣiṇā pratiṣṭhiteti |
kasminnu śraddhā pratiṣṭhiteti |
hṛdaya iti hovāca |
hṛdayena hi śraddhām |
hṛdaye hyeva śraddhā pratiṣṭhitā bhavatīti |
evamevaitadyājñavalkya

इस दक्षिण दिशा में तुम किस देवता के रूप में हो? यम देवता के रूप में। यम किसमें प्रतिष्ठित है? यज्ञ में। यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? दक्षिणा में। दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है? श्रद्धा में, क्योंकि जब मनुष्य श्रद्धा करता है तभी दक्षिणा देता है। श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है? याज्ञवल्क्य बोले, हृदय में, क्योंकि हृदय से ही श्रद्धा को जाना जाता है, श्रद्धा हृदय में ही प्रतिष्ठित है। ठीक है, याज्ञवल्क्य।

3.9.22

किंदेवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति ।
वरुणदेवत इति ।
स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ।
अप्स्विति ।
कस्मिन्न्वापः प्रतिष्ठिता इति ।
रेतसीति ।
कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति ।
हृदय इति ।
तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति ।
हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीति ।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य

kiṃdevato'syāṃ pratīcyāṃ diśyasīti |
varuṇadevata iti |
sa varuṇaḥ kasmin pratiṣṭhita iti |
apsviti |
kasminnvāpaḥ pratiṣṭhitā iti |
retasīti |
kasminnu retaḥ pratiṣṭhitamiti |
hṛdaya iti |
tasmādapi pratirūpaṃ jātamāhurhṛdayādiva sṛpto hṛdayādiva nirmita iti |
hṛdaye hyeva retaḥ pratiṣṭhitaṃ bhavatīti |
evamevaitadyājñavalkya

इस पश्चिम दिशा में तुम किस देवता के रूप में हो? वरुण देवता के रूप में। वरुण किसमें प्रतिष्ठित है? जल में। जल किसमें प्रतिष्ठित है? वीर्य में। वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है? हृदय में। इसीलिए पिता के समान दिखने वाले पुत्र के बारे में लोग कहते हैं कि यह मानो उसके हृदय से निकला है, मानो हृदय से ही बना है। वीर्य हृदय में ही प्रतिष्ठित है। ठीक है, याज्ञवल्क्य।

3.9.23

किंदेवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति ।
सोमदेवत इति ।
स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ।
दीक्षायामिति ।
कस्मिन्नु दिक्षा प्रतिष्ठितेति ।
सत्य इति ।
तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति ।
सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति ।
कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति ।
हृदय इति होवाच ।
हृदयेन हि सत्यं जानाति ।
हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीति ।
एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य

kiṃdevato'syāmudīcyāṃ diśyasīti |
somadevata iti |
sa somaḥ kasmin pratiṣṭhita iti |
dīkṣāyāmiti |
kasminnu dikṣā pratiṣṭhiteti |
satya iti |
tasmādapi dīkṣitamāhuḥ satyaṃ vadeti |
satye hyeva dīkṣā pratiṣṭhiteti |
kasminnu satyaṃ pratiṣṭhitamiti |
hṛdaya iti hovāca |
hṛdayena hi satyaṃ jānāti |
hṛdaye hyeva satyaṃ pratiṣṭhitaṃ bhavatīti |
evamevaitadyājñavalkya

इस उत्तर दिशा में तुम किस देवता के रूप में हो? सोम देवता के रूप में। सोम किसमें प्रतिष्ठित है? दीक्षा में। दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है? सत्य में। इसीलिए दीक्षित व्यक्ति से कहते हैं, सत्य बोलो। दीक्षा सत्य में ही प्रतिष्ठित है। सत्य किसमें प्रतिष्ठित है? याज्ञवल्क्य बोले, हृदय में, क्योंकि हृदय से ही सत्य को जाना जाता है, सत्य हृदय में ही प्रतिष्ठित है। ठीक है, याज्ञवल्क्य।

3.9.24

किंदेवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीति ।
अग्निदेवत इति ।
सोऽग्निः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ।
वाचीति ।
कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेति ।
हृदय इति ।
कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति

kiṃdevato'syāṃ dhruvāyāṃ diśyasīti |
agnidevata iti |
so'gniḥ kasmin pratiṣṭhita iti |
vācīti |
kasminnu vākpratiṣṭhiteti |
hṛdaya iti |
kasminnu hṛdayaṃ pratiṣṭhitamiti

इस ध्रुव, अर्थात् ऊर्ध्व, दिशा में तुम किस देवता के रूप में हो? अग्नि देवता के रूप में। अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है? वाणी में। वाणी किसमें प्रतिष्ठित है? हृदय में। हृदय किसमें प्रतिष्ठित है?

3.9.25

अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यः ।
यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै ।
यद्ध्येतदन्यत्रास्मत्स्याच्छ्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति

ahalliketi hovāca yājñavalkyaḥ |
yatraitadanyatrāsmanmanyāsai |
yaddhyetadanyatrāsmatsyācchvāno vainadadyurvayāṃsi vainadvimathnīranniti

याज्ञवल्क्य बोले, अरे मूर्ख, तुम सोचते हो कि यह हमसे अलग कहीं और टिका है! यदि यह हमसे अलग कहीं होता, तो इस शरीर को कुत्ते खा जाते या पक्षी नोच डालते।

3.9.26

कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति ।
प्राण इति ।
कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इति ।
अपान इति ।
कस्मिन्न्वपानः प्रतिष्ठित इति ।
व्यान इति ।
कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इति ।
उदान इति ।
कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति ।
समान इति ।
स एष नेति नेत्यात्मा ।
अगृह्यो न हि गृह्यते ।
अशीर्यो न हि शीर्यते ।
असङ्गो न सज्यते ।
असितो न व्यथते ।
न रिष्यति ।
एतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अद्द्. अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः ।
स यस्तान् पुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ।
तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ।
तं ह न मेने शाकल्यस् ।
तस्य ह मूर्धा विपपात ।
अपि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुरन्यन्मन्यमानाः

kasminnu tvaṃ cātmā ca pratiṣṭhitau stha iti |
prāṇa iti |
kasminnu prāṇaḥ pratiṣṭhita iti |
apāna iti |
kasminnvapānaḥ pratiṣṭhita iti |
vyāna iti |
kasminnu vyānaḥ pratiṣṭhita iti |
udāna iti |
kasminnūdānaḥ pratiṣṭhita iti |
samāna iti |
sa eṣa neti netyātmā |
agṛhyo na hi gṛhyate |
aśīryo na hi śīryate |
asaṅgo na sajyate |
asito na vyathate |
na riṣyati |
etānyaṣṭāvāyatanānyaṣṭau lokā add. aṣṭau devā aṣṭau puruṣāḥ |
sa yastān puruṣānniruhya pratyuhyātyakrāmattaṃ tvaupaniṣadaṃ puruṣaṃ pṛcchāmi |
taṃ cenme na vivakṣyasi mūrdhā te vipatiṣyatīti |
taṃ ha na mene śākalyas |
tasya ha mūrdhā vipapāta |
api hāsya parimoṣiṇo'sthīnyapajahruranyanmanyamānāḥ

तुम और तुम्हारा शरीर किसमें प्रतिष्ठित हो? प्राण में। प्राण किसमें? अपान में। अपान किसमें? व्यान में। व्यान किसमें? उदान में। उदान किसमें? समान में। यह आत्मा नेति नेति, अर्थात् यह नहीं, यह नहीं, है। वह अग्राह्य है, क्योंकि पकड़ा नहीं जाता। अशीर्य है, क्योंकि नष्ट नहीं होता। असंग है, क्योंकि कहीं नहीं बँधता। वह बन्धनरहित है, न व्यथित होता है, न उसकी हानि होती है। ये आठ आयतन, आठ लोक, आठ देवता और आठ पुरुष हैं। जो इन पुरुषों को अलग करके, फिर समेटकर, उनसे परे चला गया, उस औपनिषद पुरुष के बारे में मैं तुमसे पूछता हूँ। यदि तुम उसे न बता सके तो तुम्हारा मस्तक गिर जाएगा। शाकल्य उसे नहीं जानते थे, और उनका मस्तक गिर पड़ा। चोर भी उनकी अस्थियों को कुछ और समझकर उठा ले गए।

3.9.27

अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु ।
सर्वे वा मा पृच्छत ।
यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान् वा वः पृच्छामीति ।
ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः

atha hovāca brāhmaṇā bhagavanto yo vaḥ kāmayate sa mā pṛcchatu |
sarve vā mā pṛcchata |
yo vaḥ kāmayate taṃ vaḥ pṛcchāmi sarvān vā vaḥ pṛcchāmīti |
te ha brāhmaṇā na dadhṛṣuḥ

तब याज्ञवल्क्य ने कहा, पूज्य ब्राह्मणो, आप में से जो चाहे वह मुझसे पूछे, या आप सब मिलकर पूछें। या आप में से जो चाहे उससे मैं पूछूँ, या आप सबसे पूछूँ। पर ब्राह्मणों का साहस न हुआ।

3.9.29

तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ
यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः

tān haitaiḥ ślokaiḥ papraccha
yathā vṛkṣo vanaspatistathaiva puruṣo'mṛṣā |
tasya lomāni parṇāni tvagasyotpāṭikā bahiḥ

तब उन्होंने इन श्लोकों से उनसे पूछा। पुरुष वन के विशाल वृक्ष जैसा ही है, यह सत्य है। उसके रोम पत्ते हैं, उसकी त्वचा बाहर की छाल है।

3.9.30

त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः ।
तस्मात्तदातृण्णात्प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात्

tvaca evāsya rudhiraṃ prasyandi tvaca utpaṭaḥ |
tasmāttadātṛṇṇātpraiti raso vṛkṣādivāhatāt

जैसे वृक्ष की छाल से रस बहता है, वैसे ही उसकी त्वचा से रक्त बहता है। इसलिए घायल होने पर उससे रक्त वैसे ही निकलता है जैसे चोट खाए वृक्ष से रस।

3.9.31

मांसान्यस्य शकराणि किनाटं स्नाव तत्स्थिरम् ।
अस्थीन्यन्तरतो दारुणि मज्जा मज्जोपमा कृता

māṃsānyasya śakarāṇi kināṭaṃ snāva tatsthiram |
asthīnyantarato dāruṇi majjā majjopamā kṛtā

उसका मांस लकड़ी की भीतरी परत है, उसकी नसें उसके नीचे का दृढ़ रेशा हैं। भीतर की हड्डियाँ लकड़ी हैं, और उसकी मज्जा वृक्ष की मज्जा जैसी है।

3.9.32

यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति

yadvṛkṣo vṛkṇo rohati mūlānnavataraḥ punaḥ |
martyaḥ svinmṛtyunā vṛkṇaḥ kasmānmūlātprarohati

जब वृक्ष काटा जाता है, तो वह अपनी जड़ से फिर नया होकर उग आता है। पर जब मृत्यु मनुष्य को काट देती है, तो वह किस जड़ से फिर उगता है?

3.9.33

रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः

retasa iti mā vocata jīvatastatprajāyate |
dhānāruha iva vai vṛkṣo'ñjasā pretya sambhavaḥ

बीज से, ऐसा मत कहो, क्योंकि बीज तो जीवित से ही उत्पन्न होता है। वृक्ष बीज से भी उगता है, और मरने के बाद भी वह स्पष्ट रूप से फिर उग आता है।

3.9.34

यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति

yatsamūlamāvṛheyurvṛkṣaṃ na punarābhavet |
martyaḥ svinmṛtyunā vṛkṇaḥ kasmānmūlātprarohati

यदि वृक्ष को जड़ सहित उखाड़ दिया जाए, तो वह फिर नहीं उगता। तो मृत्यु से कटा हुआ मनुष्य किस जड़ से फिर उगता है?

3.9.35

जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्

jāta eva na jāyate ko nvenaṃ janayetpunaḥ |
vijñānamānandaṃ brahma rātirdātuḥ parāyaṇam

यदि कहो कि वह एक बार जन्म ले चुका, अब फिर जन्म नहीं लेता, तो भी उसे फिर कौन जन्म देता है? ब्रह्म विज्ञान और आनन्द स्वरूप है, वही दानी का परम आश्रय है।

3.9.36

जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम् ॥
तिष्ठमानस्य तद्विद इति

jāta eva na jāyate ko nvenaṃ janayetpunaḥ |
vijñānamānandaṃ brahma rātirdātuḥ parāyaṇam ||
tiṣṭhamānasya tadvida iti

यदि कहो कि वह एक बार जन्म ले चुका, अब फिर जन्म नहीं लेता, तो भी उसे फिर कौन जन्म देता है? इसका उत्तर ब्राह्मण न दे सके। श्रुति का अपना उत्तर यह है: ब्रह्म विज्ञान और आनन्द स्वरूप है, वही दानी का परम आश्रय है और उसका भी जो उसे जानकर उसमें स्थित रहता है।

इति बृहदारण्यकोपनिषदि तृतीयोऽध्यायः ॥
द्वितीयोऽध्यायः (previous chapter)
चतुर्तोऽध्यायः (next chapter)

iti bṛhadāraṇyakopaniṣadi tṛtīyo'dhyāyaḥ ||
dvitīyo'dhyāyaḥ (previous chapter)
caturto'dhyāyaḥ (next chapter)

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)