बृहदारण्यकोपनिषद्

अध्याय 2: अजातशत्रु, और याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद

इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥

66 श्लोक · 2 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

अजातशत्रु, और याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद

अभिमानी गार्ग्य बालाकि काशी के राजा अजातशत्रु को ब्रह्म सिखाने चलते हैं और सूर्य, चन्द्र, बिजली के पुरुषों के नाम लेते हैं; राजा हर एक को अस्वीकार करते हैं। फिर राजा उन्हें एक सोए हुए मनुष्य के पास ले जाकर दिखाते हैं कि नींद में चेतन आत्मा कहाँ जाता है और कहाँ से लौटता है, जैसे अग्नि से चिनगारियाँ। ब्रह्म के दो रूप हैं, मूर्त और अमूर्त; उसका निर्देश है नेति नेति। घर छोड़ने से पहले याज्ञवल्क्य सम्पत्ति बाँटना चाहते हैं। मैत्रेयी पूछती हैं कि क्या धन से अमृतत्व मिलेगा। वे बताते हैं कि सब कुछ आत्मा के लिए प्रिय होता है; आत्मा को देखना, सुनना, मनन और निदिध्यासन करना है। जहाँ सब आत्मा हो गया, वहाँ ज्ञाता को किससे जानें? अन्त में मधुविद्या है।

2.1.1

द्वितीयोऽध्यायः ।
प्रथमं ब्राह्मणम्
(अजातशत्रुब्राह्मणं वा पर्यंकविद्याब्राह्मणम्)
दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस ।
स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति ।
स होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मः, जनको जनक इति वै जना धावन्तीति

dvitīyo'dhyāyaḥ |
prathamaṃ brāhmaṇam
(ajātaśatrubrāhmaṇaṃ vā paryaṃkavidyābrāhmaṇam)
dṛptabālākirhānūcāno gārgya āsa |
sa hovācājātaśatruṃ kāśyaṃ brahma te bravāṇīti |
sa hovācājātaśatruḥ sahasrametasyāṃ vāci dadmaḥ, janako janaka iti vai janā dhāvantīti

गर्ग कुल के दृप्तबालाकि नाम के एक विद्वान थे, वेद में पारंगत पर अभिमानी। उन्होंने काशी के राजा अजातशत्रु से कहा, "मैं तुम्हें ब्रह्म का उपदेश दूँ।" अजातशत्रु बोले, "इस वचन के लिए ही मैं सहस्र गौएँ देता हूँ। लोग तो 'जनक, जनक' कहते हुए दौड़ते हैं, मानो दाता केवल वही हों।"

2.1.2

स होवाच गार्ग्यः य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुर् मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः ।
अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति

sa hovāca gārgyaḥ ya evāsāvāditye puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatrur mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ |
atiṣṭhāḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ mūrdhā rājeti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste'tiṣṭhāḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ mūrdhā rājā bhavati

गार्ग्य ने कहा, "सूर्य में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे सब प्राणियों से ऊपर स्थित, उनका मस्तक और राजा मानकर उपासता हूँ।" जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सब प्राणियों में श्रेष्ठ, उनका मस्तक और राजा बनता है।

2.1.3

स होवाच गार्ग्यः य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः ।
बृहन् पाण्दरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्तेऽहरहर्सुतः प्रसुतो भवति ।
नास्यान्नं क्षीयते

sa hovāca gārgyaḥ ya evāsau candre puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ |
bṛhan pāṇdaravāsāḥ somo rājeti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste'haraharsutaḥ prasuto bhavati |
nāsyānnaṃ kṣīyate

गार्ग्य ने कहा, "चन्द्रमा में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे श्वेत वस्त्रधारी महान राजा सोम मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, उसके लिए प्रतिदिन सोम निचोड़ा जाता है और उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता।

2.1.4

स होवाच गार्ग्यः य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः ।
तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति ।
तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति

sa hovāca gārgyaḥ ya evāsau vidyuti puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ |
tejasvīti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste tejasvī ha bhavati |
tejasvinī hāsya prajā bhavati

गार्ग्य ने कहा, "विद्युत में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे तेजस्वी मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह तेजस्वी होता है और उसकी संतान भी तेजस्वी होती है।

2.1.5

स होवाच गार्ग्यः य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः ।
पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamākāśe puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ |
pūrṇamapravartīti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste pūryate prajayā paśubhirnāsyāsmāllokātprajodvartate

गार्ग्य ने कहा, "आकाश में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे पूर्ण और अचल मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह संतान और पशुओं से भर जाता है, और उसकी वंश परंपरा इस लोक से उच्छिन्न नहीं होती।

2.1.6

स होवाच गार्ग्यः य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः ।
इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ vāyau puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ |
indro vaikuṇṭho'parājitā seneti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste jiṣṇurhāparājiṣṇurbhavatyanyatastyajāyī

गार्ग्य ने कहा, "वायु में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे इन्द्र वैकुण्ठ और अपराजित सेना मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह विजयी और अजेय होता है तथा शत्रुओं को जीत लेता है।

2.1.7

स होवाच गार्ग्यः य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः ।
विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति ।
विषासहिर्हास्य प्रजा भवति

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamagnau puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ |
viṣāsahiriti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste viṣāsahirha bhavati |
viṣāsahirhāsya prajā bhavati

गार्ग्य ने कहा, "अग्नि में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे सब कुछ सहने और जीतने वाला मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह सहनशील और प्रबल होता है, और उसकी संतान भी वैसी ही होती है।

2.1.8

स होवाच गार्ग्यः य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः ।
प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपं हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपम् ।
अथो प्रतिरुपोऽस्माज्जायते

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamapsu puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ |
pratirūpa iti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste pratirūpaṃ haivainamupagacchati nāpratirūpam |
atho pratirupo'smājjāyate

गार्ग्य ने कहा, "जल में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे प्रतिरूप, अर्थात अनुकूल छवि मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, उसके पास अनुकूल ही आता है, प्रतिकूल नहीं, और उससे अनुरूप संतान जन्म लेती है।

2.1.9

स होवाच गार्ग्यः य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः ।
रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति ।
रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवति ।
अथो यैः संनिगच्छति ।
सर्वांस्तानतिरोचते

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamādarśe puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ |
rociṣṇuriti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste rociṣṇurha bhavati |
rociṣṇurhāsya prajā bhavati |
atho yaiḥ saṃnigacchati |
sarvāṃstānatirocate

गार्ग्य ने कहा, "दर्पण में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे दीप्तिमान मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह दीप्तिमान होता है, उसकी संतान भी दीप्तिमान होती है, और जिनसे वह मिलता है उन सबसे अधिक चमकता है।

2.1.10

स होवाच गार्ग्यः य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः ।
असुरिति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति ।
नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ yantaṃ paścācchabdo'nūdetyetamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ |
asuriti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste sarvaṃ haivāsmiṃlloka āyureti |
nainaṃ purā kālātprāṇo jahāti

गार्ग्य ने कहा, "चलते हुए मनुष्य के पीछे जो शब्द उठता है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे प्राणशक्ति मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह इस लोक में पूर्ण आयु पाता है और समय से पहले प्राण उसे नहीं छोड़ते।

2.1.11

स होवाच गार्ग्यः य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः ।
द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति ।
नास्माद्गणश्छिद्यते

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ dikṣu puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ |
dvitīyo'napaga iti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste dvitīyavān ha bhavati |
nāsmādgaṇaśchidyate

गार्ग्य ने कहा, "दिशाओं में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे कभी साथ न छोड़ने वाला दूसरा साथी मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, उसके साथी सदा बने रहते हैं और उसका समूह उससे कभी अलग नहीं होता।

2.1.12

स होवाच गार्ग्यः य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः ।
मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति ।
नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ chāyāmayaḥ puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ |
mṛtyuriti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāste sarvaṃ haivāsmiṃlloka āyureti |
nainaṃ purā kālānmṛtyurāgacchati

गार्ग्य ने कहा, "छायामय जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे मृत्यु मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह इस लोक में पूर्ण आयु पाता है और समय से पहले मृत्यु उसके पास नहीं आती।

2.1.13

स होवाच गार्ग्यः य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति ।
स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः ।
आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति ।
स य एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवति ।
आत्मन्विनी हास्य प्रजा भवति ।
स ह तूष्णीमास गार्ग्यः

sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamātmani puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti |
sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ |
ātmanvīti vā ahametamupāsa iti |
sa ya etamevamupāsta ātmanvī ha bhavati |
ātmanvinī hāsya prajā bhavati |
sa ha tūṣṇīmāsa gārgyaḥ

गार्ग्य ने कहा, "शरीर में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे आत्मवान मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह आत्मवान होता है और उसकी संतान भी आत्मवती होती है। तब गार्ग्य चुप हो गए।

2.1.14

स होवाचाजातशत्रुः एतावन्नू३ इति ।
एतावद्धीति ।
नैतावता विदितं भवतीति ।
स होवाच गार्ग्यः उप त्वायानीति

sa hovācājātaśatruḥ etāvannū3 iti |
etāvaddhīti |
naitāvatā viditaṃ bhavatīti |
sa hovāca gārgyaḥ upa tvāyānīti

अजातशत्रु ने पूछा, "क्या बस इतना ही?" गार्ग्य बोले, "इतना ही।" राजा ने कहा, "इतने से ब्रह्म नहीं जाना जाता।" तब गार्ग्य ने कहा, "मैं शिष्य बनकर आपके पास आना चाहता हूँ।"

2.1.15

स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति ।
व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति ।
तं पाणावादायोत्तस्थौ ।
तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुः ।
तमेतैर्नामभिरामन्त्रयां चक्रे बृहन् पाण्दरवासः सोम राजन्निति ।
स नोत्तस्थौ ।
तं पाणिनापेषं बोधयां चकार ।
स होत्तस्थौ

sa hovācājātaśatruḥ pratilomaṃ caitadyadbrāhmaṇaḥ kṣatriyamupeyādbrahma me vakṣyatīti |
vyeva tvā jñapayiṣyāmīti |
taṃ pāṇāvādāyottasthau |
tau ha puruṣaṃ suptamājagmatuḥ |
tametairnāmabhirāmantrayāṃ cakre bṛhan pāṇdaravāsaḥ soma rājanniti |
sa nottasthau |
taṃ pāṇināpeṣaṃ bodhayāṃ cakāra |
sa hottasthau

अजातशत्रु बोले, "यह उलटी रीति है कि ब्राह्मण क्षत्रिय के पास ब्रह्म सीखने आए। फिर भी मैं तुम्हें इसका बोध कराऊँगा।" वे उनका हाथ पकड़कर उठे। दोनों एक सोए हुए पुरुष के पास पहुँचे। राजा ने उसे उन्हीं नामों से पुकारा, "हे महान, श्वेत वस्त्रधारी, राजा सोम!" वह नहीं उठा। तब राजा ने हाथ से दबाकर उसे जगाया, और वह उठ बैठा।

2.1.16

स होवाचाजातशत्रुः यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागादिति ।
तदु ह न मेने गार्ग्यः

sa hovācājātaśatruḥ yatraiṣa etatsupto'bhūdya eṣa vijñānamayaḥ puruṣaḥ kvaiṣa tadābhūtkuta etadāgāditi |
tadu ha na mene gārgyaḥ

अजातशत्रु ने कहा, "जब यह मनुष्य सो रहा था, तब यह विज्ञानमय पुरुष कहाँ था, और अब कहाँ से लौटकर आया है?" गार्ग्य यह नहीं जानते थे।

2.1.17

स होवाचाजातशत्रुः यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्नानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते ।
तानि यदा गृह्णाति ।
अथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम ।
तद्गृहीत एव प्राणो भवति ।
गृहीता वाग् ।
गृहीतं चक्षुर् ।
गृहीतं श्रोत्रम् ।
गृहीतं मनः

sa hovācājātaśatruḥ yatraiṣa etatsupto'bhūdya eṣa vijñānamayaḥ puruṣastadeṣāṃ prāṇānāṃ vijñānena vijnānamādāya ya eṣo'ntarhṛdaya ākāśastasmiñchete |
tāni yadā gṛhṇāti |
atha haitatpuruṣaḥ svapiti nāma |
tadgṛhīta eva prāṇo bhavati |
gṛhītā vāg |
gṛhītaṃ cakṣur |
gṛhītaṃ śrotram |
gṛhītaṃ manaḥ

अजातशत्रु बोले, "जब यह मनुष्य सोया था, तब इस विज्ञानमय पुरुष ने अपने विज्ञान से इन्द्रियों की ज्ञानशक्ति को समेटकर हृदय के भीतर के आकाश में विश्राम किया। जब वह इन्हें समेट लेता है, तभी कहते हैं कि मनुष्य सो रहा है। तब प्राण, वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन, सब भीतर समेटे रहते हैं।"

2.1.18

स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकाः ।
तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मणः ।
उतेवोच्चावचं निगच्छति ।
स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते

sa yatraitatsvapnyayā carati te hāsya lokāḥ |
taduteva mahārājo bhavatyuteva mahābrāhmaṇaḥ |
utevoccāvacaṃ nigacchati |
sa yathā mahārājo jānapadān gṛhītvā sve janapade yathākāmaṃ parivartetaivamevaiṣa etatprāṇān gṛhītvā sve śarīre yathākāmaṃ parivartate

जब वह स्वप्न में विचरता है, तब वे ही उसके लोक होते हैं। वहाँ वह मानो महाराजा बन जाता है, या महान ब्राह्मण, और ऊँची नीची अवस्थाओं में जाता है। जैसे कोई महाराजा अपनी प्रजा को साथ लेकर अपने राज्य में इच्छानुसार घूमता है, वैसे ही यह इन्द्रियों को साथ लेकर अपने शरीर में इच्छानुसार घूमता है।

2.1.19

अथ यदा सुषुप्तो भवति ।
यदा न कस्य चन वेद ।
हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ।
ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ।
स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वाऽतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीत ।
एवमेवैष एतच्छेते

atha yadā suṣupto bhavati |
yadā na kasya cana veda |
hitā nāma nāḍyo dvāsaptatiḥ sahasrāṇi hṛdayātpurītatamabhipratiṣṭhante |
tābhiḥ pratyavasṛpya purītati śete |
sa yathā kumāro vā mahārājo vā mahābrāhmaṇo vā'tighnīmānandasya gatvā śayīta |
evamevaiṣa etacchete

फिर जब वह गहरी नींद में होता है और किसी भी वस्तु को नहीं जानता, तब वह हृदय से पूरे शरीर में फैली हिता नाम की बहत्तर हज़ार नाड़ियों से लौटकर शरीर में ही विश्राम करता है। जैसे कोई बालक, महाराजा या महान ब्राह्मण आनन्द की चरम अवस्था पाकर सोए, वैसे ही वह वहाँ सोता है।

2.1.20

स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथा अग्नेः क्षुद्रा विष्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति ।
तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति ।
प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्

sa yathorṇanābhistantunoccaredyathā agneḥ kṣudrā viṣphuliṅgā vyuccarantyevamevāsmādātmanaḥ sarve prāṇāḥ sarve lokāḥ sarve devāḥ sarvāṇi bhūtāni vyuccaranti |
tasyopaniṣatsatyasya satyamiti |
prāṇā vai satyaṃ teṣāmeṣa satyam

जैसे मकड़ी अपने तन्तु पर ऊपर चढ़ती है, और जैसे अग्नि से छोटी छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से सब प्राण, सब लोक, सब देवता और सब प्राणी निकलते हैं। इसका गूढ़ नाम है सत्य का सत्य। प्राण सत्य हैं, और आत्मा उनका भी सत्य है।

2.2.1

(सर्वान्नब्राह्मणं वा शिशुब्राह्मणम्)
यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो भ्रातृव्यानवरुणद्धि ।
अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः ।
तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः स्थूणान्नं दाम

(sarvānnabrāhmaṇaṃ vā śiśubrāhmaṇam)
yo ha vai śiśuṃ sādhānaṃ sapratyādhānaṃ sasthūṇaṃ sadāmaṃ veda sapta ha dviṣato bhrātṛvyānavaruṇaddhi |
ayaṃ vāva śiśuryo'yaṃ madhyamaḥ prāṇaḥ |
tasyedamevādhānamidaṃ pratyādhānaṃ prāṇaḥ sthūṇānnaṃ dāma

जो शिशु को उसके आधान, प्रत्याधान, खूँटे और रस्सी सहित जानता है, वह सात द्वेषी शत्रुओं को रोक देता है। यह शिशु शरीर के भीतर का मध्यम प्राण है। शरीर उसका आधान है, सिर उसका प्रत्याधान, प्राण उसका खूँटा और अन्न उसकी रस्सी।

2.2.2

तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते ।
तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तः ।
अथ या अक्षन्नापस्ताभिः पर्जन्यः ।
या कनीनका तयादित्यः ।
यत्कृष्णं तेनाग्निर् ।
यच्छुक्लं तेनेन्द्रः ।
अधरयैनं वर्तन्या पृथिव्यन्वायत्ता ।
द्यौरुत्तरया ।
नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद

tametāḥ saptākṣitaya upatiṣṭhante |
tadyā imā akṣaṃllohinyo rājayastābhirenaṃ rudro'nvāyattaḥ |
atha yā akṣannāpastābhiḥ parjanyaḥ |
yā kanīnakā tayādityaḥ |
yatkṛṣṇaṃ tenāgnir |
yacchuklaṃ tenendraḥ |
adharayainaṃ vartanyā pṛthivyanvāyattā |
dyauruttarayā |
nāsyānnaṃ kṣīyate ya evaṃ veda

सात अक्षय शक्तियाँ उसकी सेवा में रहती हैं। आँख की लाल रेखाओं से रुद्र उससे जुड़े हैं, आँख के जल से पर्जन्य, पुतली से आदित्य, काले भाग से अग्नि और श्वेत भाग से इन्द्र। नीचे की पलक से पृथ्वी उससे जुड़ी है और ऊपर की पलक से द्युलोक। जो ऐसा जानता है, उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता।

2.2.3

तदेष श्लोको भवति
अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् ।
तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति ।
अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न इति ।
इदं तच्छरीर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः ।
तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपमिति ।
प्राणा वै यशो विश्वरूपम् ।
प्राणानेतदाह ।
तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति ।
प्राणा वा ऋषयः ।
प्राणाणेतदाह ।
वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति ।
वाग्घ्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्ते

tadeṣa śloko bhavati
arvāgbilaścamasa ūrdhvabudhnastasmin yaśo nihitaṃ viśvarūpam |
tasyāsata ṛṣayaḥ sapta tīre vāgaṣṭamī brahmaṇā saṃvidāneti |
arvāgbilaścamasa ūrdhvabudhna iti |
idaṃ taccharīra eṣa hyarvāgbilaścamasa ūrdhvabudhnaḥ |
tasmin yaśo nihitaṃ viśvarūpamiti |
prāṇā vai yaśo viśvarūpam |
prāṇānetadāha |
tasyāsata ṛṣayaḥ sapta tīra iti |
prāṇā vā ṛṣayaḥ |
prāṇāṇetadāha |
vāgaṣṭamī brahmaṇā saṃvidāneti |
vāgghyaṣṭamī brahmaṇā saṃvitte

इस पर एक श्लोक है: "एक चमस है जिसका मुख नीचे और तल ऊपर है; उसमें सब रूपों वाला यश रखा है। उसके किनारे पर सात ऋषि बैठे हैं, और आठवीं वाणी है जो ब्रह्म से जुड़ी है।" यह चमस सिर है, जिसका मुख नीचे और तल ऊपर है। सब रूपों वाला यश प्राण हैं। सात ऋषि भी प्राण ही हैं। आठवीं वाणी है, क्योंकि वाणी ब्रह्म अर्थात वेद से जुड़ी है।

2.2.4

इमावेव गोतमभरद्वाजौ ।
अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः ।
इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी ।
अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निः ।
इमावेव वसिष्ठकश्यपौ ।
अयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपः ।
वागेवात्रिः ।
वाचा ह्यन्नमद्यते ।
अत्तिर्ह वै नामैतद्यदौत्रिरिति ।
सर्वस्यात्ता भवति ।
सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद

imāveva gotamabharadvājau |
ayameva gotamo'yaṃ bharadvājaḥ |
imāveva viśvāmitrajamadagnī |
ayameva viśvāmitro'yaṃ jamadagniḥ |
imāveva vasiṣṭhakaśyapau |
ayameva vasiṣṭho'yaṃ kaśyapaḥ |
vāgevātriḥ |
vācā hyannamadyate |
attirha vai nāmaitadyadautririti |
sarvasyāttā bhavati |
sarvamasyānnaṃ bhavati ya evaṃ veda

ये दोनों कान गोतम और भरद्वाज हैं; यह गोतम है, वह भरद्वाज। ये दोनों नेत्र विश्वामित्र और जमदग्नि हैं; यह विश्वामित्र है, वह जमदग्नि। ये दोनों नासिका छिद्र वसिष्ठ और कश्यप हैं। जिह्वा रूपी वाणी अत्रि है, क्योंकि वाणी से ही अन्न खाया जाता है, और अत्रि का वास्तविक नाम अत्ति है, अर्थात खाने वाला। जो ऐसा जानता है, वह सबका भोक्ता होता है और सब उसका अन्न बन जाता है।

2.3.1

(मूर्तामूर्तब्राह्मणम्)
द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे ।
मूर्तं चैवामूर्तं च ।
मर्त्यं चामृतं च ।
स्थितं च यच्च ।
सच्च त्यं च

(mūrtāmūrtabrāhmaṇam)
dve vāva brahmaṇo rūpe |
mūrtaṃ caivāmūrtaṃ ca |
martyaṃ cāmṛtaṃ ca |
sthitaṃ ca yacca |
sacca tyaṃ ca

ब्रह्म के दो रूप हैं: मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और गतिशील, सत् और त्यत् अर्थात परे वाला।

2.3.2

तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्च ।
एतन्मर्त्यम् ।
एतत्स्थितम् ।
एतत्सत् ।
तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति ।
सतो ह्येष रसः

tadetanmūrtaṃ yadanyadvāyoścāntarikṣācca |
etanmartyam |
etatsthitam |
etatsat |
tasyaitasya mūrtasyaitasya martyasyaitasya sthitasyaitasya sata eṣa raso ya eṣa tapati |
sato hyeṣa rasaḥ

वायु और अन्तरिक्ष से भिन्न जो कुछ है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, स्थित है, सत् है। इस मूर्त, मर्त्य, स्थित और सत् का सार वह सूर्य है जो वहाँ तपता है, क्योंकि वही सत् का रस है।

2.3.3

अथामूर्तम् ।
वायुश्चान्तरिक्षश्च ।
एतदमृतम् ।
एतद्यत् ।
एतत्त्यम् ।
तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः ।
त्यस्य ह्येष रस ।
इत्यधिदैवतम्

athāmūrtam |
vāyuścāntarikṣaśca |
etadamṛtam |
etadyat |
etattyam |
tasyaitasyāmūrtasyaitasyāmṛtasyaitasya yata etasya tyasyaiṣa raso ya eṣa etasminmaṇḍale puruṣaḥ |
tyasya hyeṣa rasa |
ityadhidaivatam

अब अमूर्त: वह वायु और अन्तरिक्ष है। यह अमृत है, गतिशील है, त्यत् अर्थात परे वाला है। इस अमूर्त, अमृत, गतिशील और परे वाले का सार सूर्यमण्डल के भीतर स्थित पुरुष है, क्योंकि वही त्यत् का रस है। यह देवताओं के सम्बन्ध में कहा गया।

2.3.4

अथाध्यात्मम् ।
इदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाशः ।
एतन्मर्त्यम् ।
एतत्स्थितम् ।
एतत्सत् ।
तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः ।
सतो ह्येष रसः

athādhyātmam |
idameva mūrtaṃ yadanyatprāṇācca yaścāyamantarātmannākāśaḥ |
etanmartyam |
etatsthitam |
etatsat |
tasyaitasya mūrtasyaitasya martyasyaitasya sthitasyaitasya sata eṣa raso yaccakṣuḥ |
sato hyeṣa rasaḥ

अब शरीर के सम्बन्ध में। प्राण और शरीर के भीतर के आकाश से भिन्न जो कुछ है, वह मूर्त है। यह मर्त्य, स्थित और सत् है। इस मूर्त, मर्त्य, स्थित और सत् का सार नेत्र है, क्योंकि वही सत् का रस है।

2.3.5

अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाशः ।
एतदमृतम् ।
एतद्यत् ।
एतत्त्यत् ।
तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः ।
त्यस्य ह्येष रसः

athāmūrtaṃ prāṇaśca yaścāyamantarātmannākāśaḥ |
etadamṛtam |
etadyat |
etattyat |
tasyaitasyāmūrtasyaitasyāmṛtasyaitasya yata etasya tyasyaiṣa raso yo'yaṃ dakṣiṇe'kṣan puruṣaḥ |
tyasya hyeṣa rasaḥ

अब अमूर्त: वह प्राण और शरीर के भीतर का आकाश है। यह अमृत, गतिशील और परे वाला है। इस अमूर्त, अमृत, गतिशील और परे वाले का सार दाहिने नेत्र में स्थित पुरुष है, क्योंकि वही त्यत् का रस है।

2.3.6

तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् ।
यथा माहारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तम् ।
सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेद ।
अथात आदेशो नेति नेति ।
न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्ति ।
अथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति ।
प्राणा वै सत्यम् ।
तेषामेष सत्यम्

tasya haitasya puruṣasya rūpam |
yathā māhārajanaṃ vāso yathā pāṇḍvāvikaṃ yathendragopo yathāgnyarciryathā puṇḍarīkaṃ yathā sakṛdvidyuttam |
sakṛdvidyutteva ha vā asya śrīrbhavati ya evaṃ veda |
athāta ādeśo neti neti |
na hyetasmāditi netyanyatparamasti |
atha nāmadheyaṃ satyasya satyamiti |
prāṇā vai satyam |
teṣāmeṣa satyam

इस पुरुष का रूप केसरिया रंगे वस्त्र जैसा है, श्वेत ऊन जैसा, लाल इन्द्रगोप कीट जैसा, अग्नि की लपट जैसा, श्वेत कमल जैसा, और एक बार चमकी बिजली जैसा। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजली की तरह चमक उठती है। अब उपदेश है: नेति नेति, यह नहीं, यह नहीं। इस 'नेति' से परे और कुछ नहीं है। इसका नाम है सत्य का सत्य। प्राण सत्य हैं, और यह उनका भी सत्य है।

2.4.1

(मैत्रेयीब्राह्मणम्)
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः उद्यास्यन् वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि ।
हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति

(maitreyībrāhmaṇam)
maitreyīti hovāca yājñavalkyaḥ udyāsyan vā are'hamasmātsthānādasmi |
hanta te'nayā kātyāyanyāntaṃ karavāṇīti

याज्ञवल्क्य ने कहा, "मैत्रेयी, मैं अब इस गृहस्थ आश्रम को छोड़कर जाने वाला हूँ। आओ, तुम्हारे और कात्यायनी के बीच संपत्ति का बँटवारा कर दूँ।"

2.4.2

सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथं तेनामृता स्यामिति ।
नेति होवाच याज्ञवल्क्यः ।
यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यात् ।
अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति

sā hovāca maitreyī yannu ma iyaṃ bhagoḥ sarvā pṛthivī vittena pūrṇā syātkathaṃ tenāmṛtā syāmiti |
neti hovāca yājñavalkyaḥ |
yathaivopakaraṇavatāṃ jīvitaṃ tathaiva te jīvitaṃ syāt |
amṛtatvasya tu nāśāsti vitteneti

मैत्रेयी ने कहा, "भगवन्, यदि धन से भरी यह सारी पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं उससे अमर हो जाऊँगी?" याज्ञवल्क्य बोले, "नहीं। तुम्हारा जीवन वैसा ही होगा जैसा साधन सम्पन्न लोगों का होता है। धन से अमृतत्व की कोई आशा नहीं है।"

2.4.3

सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम् ।
यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति

sā hovāca maitreyī yenāhaṃ nāmṛtā syāṃ kimahaṃ tena kuryām |
yadeva bhagavān veda tadeva me brūhīti

मैत्रेयी ने कहा, "जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसे लेकर मैं क्या करूँगी? भगवन्, आप जो जानते हैं, वही मुझे बताइए।"

2.4.4

स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषसे ।
एह्यास्स्व ।
व्याख्यास्यामि ते ।
व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति

sa hovāca yājñavalkyaḥ priyā batāre naḥ satī priyaṃ bhāṣase |
ehyāssva |
vyākhyāsyāmi te |
vyācakṣāṇasya tu me nididhyāsasveti

याज्ञवल्क्य बोले, "तुम सदा मुझे प्रिय रही हो, और अब भी प्रिय बात कह रही हो। आओ, बैठो। मैं तुम्हें समझाऊँगा। मेरे समझाते समय तुम उस पर ध्यान करना।"

2.4.5

स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति ।
न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति ।
न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति ।
न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति ।
न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति ।
न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति ।
न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति ।
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ।
आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्

sa hovāca na vā are patyuḥ kāmāya patiḥ priyo bhavatyātmanastu kāmāya patiḥ priyo bhavati |
na vā are jāyāyai kāmāya jāyā priyā bhavatyātmanastu kāmāya jāyā priyā bhavati |
na vā are putrāṇāṃ kāmāya putrāḥ priyā bhavantyātmanastu kāmāya putrāḥ priyā bhavanti |
na vā are vittasya kāmāya vittaṃ priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya vittaṃ priyaṃ bhavati |
na vā are brahmaṇaḥ kāmāya brahma priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya brahma priyaṃ bhavati |
na vā are kṣatrasya kāmāya kṣatraṃ priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya kṣatraṃ priyaṃ bhavati |
na vā are lokānāṃ kāmāya lokāḥ priyā bhavantyātmanastu kāmāya lokāḥ priyā bhavanti |
na vā are devānāṃ kāmāya devāḥ priyā bhavantyātmanastu kāmāya devāḥ priyā bhavanti |
na vā are bhūtānāṃ kāmāya bhūtāni priyāṇi bhavantyātmanastu kāmāya bhūtāni priyāṇi bhavanti |
na vā are sarvasya kāmāya sarvaṃ priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya sarvaṃ priyaṃ bhavati |
ātmā vā are draṣṭavyaḥ śrotavyo mantavyo nididhyāsitavyo maitreyi |
ātmano vā are darśanena śravaṇena matyā vijñānenedaṃ sarvaṃ viditam

वे बोले, "पति के लिए पति प्रिय नहीं होता, आत्मा के लिए पति प्रिय होता है। पत्नी, पुत्र, धन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देवता और प्राणी भी अपने लिए नहीं, आत्मा के लिए ही प्रिय होते हैं। सब कुछ अपने लिए नहीं, आत्मा के लिए ही प्रिय होता है। हे मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन करने योग्य है। आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान से यह सब जान लिया जाता है।"

2.4.6

ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद ।
क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद ।
लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद ।
देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद ।
भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद ।
सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद ।
इदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानीदं सर्वं यदयमात्मा

brahma taṃ parādādyo'nyatrātmano brahma veda |
kṣatraṃ taṃ parādādyo'nyatrātmanaḥ kṣatraṃ veda |
lokāstaṃ parāduryo'nyatrātmano lokān veda |
devāstaṃ parāduryo'nyatrātmano devān veda |
bhūtāni taṃ parāduryo'nyatrātmano bhūtāni veda |
sarvaṃ taṃ parādādyo'nyatrātmanaḥ sarvaṃ veda |
idaṃ brahmedaṃ kṣatramime lokā ime devā imāni bhūtānīdaṃ sarvaṃ yadayamātmā

जो ब्राह्मण को आत्मा से भिन्न जानता है, ब्राह्मण उसे त्याग देता है। जो क्षत्रिय को आत्मा से भिन्न जानता है, क्षत्रिय उसे त्याग देता है। जो लोकों, देवताओं, प्राणियों और सब कुछ को आत्मा से भिन्न जानता है, वे सब उसे त्याग देते हैं। यह ब्राह्मण, यह क्षत्रिय, ये लोक, ये देवता, ये प्राणी, यह सब कुछ, यही आत्मा है।

2.4.7

स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय ।
दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः

sa yathā dundubherhanyamānasya na bāhyāñchabdāñchaknuyādgrahaṇāya |
dundubhestu grahaṇena dundubhyāghātasya vā śabdo gṛhītaḥ

जब नगाड़ा बजाया जा रहा हो, तो उससे बाहर निकलती ध्वनियों को अलग अलग नहीं पकड़ा जा सकता; पर नगाड़े को, या बजाने वाले को पकड़ लेने से ध्वनि भी पकड़ में आ जाती है।

2.4.8

स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः

sa yathā śaṅkhasya dhmāyamānasya na bāhyāñchabdāñchaknuyādgrahaṇāya śaṅkhasya tu grahaṇena śaṅkhadhmasya vā śabdo gṛhītaḥ

जब शंख फूँका जा रहा हो, तो उससे निकलती ध्वनियों को अलग अलग नहीं पकड़ा जा सकता; पर शंख को, या फूँकने वाले को पकड़ लेने से ध्वनि पकड़ में आ जाती है।

2.4.9

स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः

sa yathā vīṇāyai vādyamānāyai na bāhyāñchabdāñchaknuyādgrahaṇāya vīṇāyai tu grahaṇena vīṇāvādasya vā śabdo gṛhītaḥ

जब वीणा बजाई जा रही हो, तो उससे निकलती ध्वनियों को अलग अलग नहीं पकड़ा जा सकता; पर वीणा को, या वादक को पकड़ लेने से ध्वनि पकड़ में आ जाती है।

2.4.10

स यथार्द्रैधाग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येव वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्याननि ।
अस्यैवैतानि निश्वसितानि

sa yathārdraidhāgnerabhyāhitātpṛthagdhūmā viniścarantyeva vā are'sya mahato bhūtasya niḥśvasitametadyadṛgvedo yajurvedaḥ sāmavedo'tharvāṅgirasa itihāsaḥ purāṇaṃ vidyā upaniṣadaḥ ślokāḥ sūtrāṇyanuvyākhyānāni vyākhyānani |
asyaivaitāni niśvasitāni

जैसे गीले ईंधन से जलाई अग्नि से अलग अलग धुआँ निकलता है, वैसे ही हे मैत्रेयी, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वांगिरस, इतिहास, पुराण, विद्याएँ, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान और व्याख्यान, ये सब उसी महान सत्ता का निःश्वास हैं। ये सब उसी के द्वारा श्वास के रूप में बाहर आए हैं।

2.4.11

स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनम् ।
एवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम् ।
एवं सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनम् ।
एवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनम् ।
एवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनम् ।
एवं सर्वेषं शब्दानां श्रोत्रमेकायनम् ।
एवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम् ।
एवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनम् ।
एवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनम् ।
एवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम् ।
एवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनम् ।
एवं सर्वेषामध्वनां पादावेकायनम् ।
एवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनम्

sa yathā sarvāsāmapāṃ samudra ekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ sparśānāṃ tvagekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ gandhānāṃ nāsike ekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ rasānāṃ jihvaikāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ rūpāṇāṃ cakṣurekāyanam |
evaṃ sarveṣaṃ śabdānāṃ śrotramekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ saṃkalpānāṃ mana ekāyanam |
evaṃ sarvāsāṃ vidyānāṃ hṛdayamekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ karmaṇāṃ hastāvekāyanam |
evaṃ sarveṣāmānandānāmupastha ekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ visargāṇāṃ pāyurekāyanam |
evaṃ sarveṣāmadhvanāṃ pādāvekāyanam |
evaṃ sarveṣāṃ vedānāṃ vāgekāyanam

जैसे सब जलों का एक ही आश्रय समुद्र है, वैसे ही सब स्पर्शों का आश्रय त्वचा है, सब गंधों का नासिका, सब रसों का जिह्वा, सब रूपों का नेत्र, सब शब्दों का श्रोत्र, सब संकल्पों का मन, सब विद्याओं का हृदय, सब कर्मों का हाथ, सब आनन्दों का उपस्थ, सब विसर्जनों का पायु, सब मार्गों का पैर, और सब वेदों का आश्रय वाणी है।

2.4.12

स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्यात् ।
यतोयतस्त्वाददीत लवणम् ।
एवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव ।
एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति ।
न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमि ।
इति होवाच याज्ञवल्क्यः

sa yathā saindhavakhilya udake prāsta udakamevānuvilīyeta na hāsyodgrahaṇāyeva syāt |
yatoyatastvādadīta lavaṇam |
evaṃ vā ara idaṃ mahadbhūtamanantamapāraṃ vijñānaghana eva |
etebhyo bhūtebhyaḥ samutthāya tānyevānuvinaśyati |
na pretya saṃjñāstītyare bravīmi |
iti hovāca yājñavalkyaḥ

जैसे जल में डाली गई नमक की डली जल में ही घुल जाती है और फिर निकाली नहीं जा सकती, पर जहाँ से भी जल लो वह खारा ही होता है, वैसे ही हे मैत्रेयी, यह महान सत्ता अनन्त और अपार है, केवल विज्ञानघन है। इन भूतों से उठकर यह उन्हीं के साथ विलीन हो जाती है। देह छूटने के बाद कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती। याज्ञवल्क्य ने कहा, "यही मैं कहता हूँ।"

2.4.13

सा होवाच मैत्रेयी अत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति ।
स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीमि ।
अलं वा अर इदं विज्ञानाय

sā hovāca maitreyī atraiva mā bhagavānamūmuhanna pretya saṃjñāstīti |
sa hovāca na vā are'haṃ mohaṃ bravīmi |
alaṃ vā ara idaṃ vijñānāya

मैत्रेयी ने कहा, "भगवन्, यह कहकर कि देह छूटने के बाद संज्ञा नहीं रहती, आपने मुझे भ्रम में डाल दिया।" वे बोले, "हे मैत्रेयी, मैं भ्रम की बात नहीं कह रहा। समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है।"

2.4.14

यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं शृणोति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति ।
यत्र वास्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं शृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कं मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् ।
येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् ।
विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति

yatra hi dvaitamiva bhavati taditara itaraṃ jighrati taditara itaraṃ paśyati taditara itaraṃ śṛṇoti taditara itaraṃ jighrati taditara itaramabhivadati taditara itaraṃ manute taditara itaraṃ vijānāti |
yatra vāsya sarvamātmaivābhūttatkena kaṃ jighrettatkena kaṃ jighrettatkena kaṃ paśyettatkena kaṃ śṛṇuyāttatkena kamabhivadettatkena kaṃ manvīta tatkena kaṃ vijānīyāt |
yenedaṃ sarvaṃ vijānāti taṃ kena vijānīyāt |
vijñātāramare kena vijānīyāditi

जहाँ मानो द्वैत होता है, वहाँ एक दूसरे को सूँघता है, देखता है, सुनता है, दूसरे से बोलता है, दूसरे का मनन करता है और दूसरे को जानता है। पर जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ किससे किसे सूँघे, देखे, सुने, किससे बोले, किसका मनन करे, किसे जाने? जिससे यह सब जाना जाता है, उसे किससे जाने? हे मैत्रेयी, जानने वाले को किससे जाना जाए?

2.5.1

(मधुब्राह्मणम्)
इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यस्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

(madhubrāhmaṇam)
iyaṃ pṛthivī sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asyai pṛthivyai sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasyāṃ pṛthivyāṃ tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yascāyamadhyātmaṃ śārīrastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह पृथ्वी सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस पृथ्वी के लिए मधु हैं। इस पृथ्वी में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.2

इमा आपः सर्वेषां भूतानां मधु ।
आसामपां सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं रैतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

imā āpaḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
āsāmapāṃ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamāsvapsu tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ raitasastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

ये जल सब प्राणियों के लिए मधु हैं, और सब प्राणी इन जलों के लिए मधु हैं। जलों में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में वीर्य में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.3

अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayamagniḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asyāgneḥ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasminnagnau tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ vāṅmayastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह अग्नि सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस अग्नि के लिए मधु हैं। अग्नि में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में वाणी में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.4

अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन् वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यमेव स योऽयमात्मा ।
इदं अमृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayaṃ vāyuḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asya vāyoḥ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasmin vāyau tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ prāṇastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yameva sa yo'yamātmā |
idaṃ amṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह वायु सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस वायु के लिए मधु हैं। वायु में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में प्राण रूप जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.5

अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayamādityaḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asyādityasya sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasminnāditye tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ cākṣuṣastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह आदित्य सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस आदित्य के लिए मधु हैं। आदित्य में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में नेत्र में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.6

इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मधु ।
आसां दिशां सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

imā diśaḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
āsāṃ diśāṃ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamāsu dikṣu tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ śrautraḥ prātiśrutkastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

ये दिशाएँ सब प्राणियों के लिए मधु हैं, और सब प्राणी इन दिशाओं के लिए मधु हैं। दिशाओं में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में श्रोत्र और प्रतिध्वनि में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.7

अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्व् ।
अस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन् चन्द्रे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतम् ।
इदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayaṃ candraḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhv |
asya candrasya sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasmin candre tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ mānasastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmedamamṛtam |
idaṃ brahmedaṃ sarvam

यह चन्द्रमा सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस चन्द्रमा के लिए मधु हैं। चन्द्रमा में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में मन में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.8

इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानं मधु ।
अस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

iyaṃ vidyutsarveṣāṃ bhūtānaṃ madhu |
asyai vidyutaḥ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasyāṃ vidyuti tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ taijasastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह विद्युत सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस विद्युत के लिए मधु हैं। विद्युत में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर के तेज में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.9

अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भुतानां मधु ।
अस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन्स्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayaṃ stanayitnuḥ sarveṣāṃ bhutānāṃ madhu |
asya stanayitnoḥ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasminstanayitnau tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ śābdaḥ sauvarastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह मेघगर्जन सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इसके लिए मधु हैं। मेघगर्जन में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में शब्द और स्वर में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.10

अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayamākāśaḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asyākāśasya sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasminnākāśe tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ hṛdyākāśastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह आकाश सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस आकाश के लिए मधु हैं। आकाश में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और हृदय के आकाश में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.11

अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

ayaṃ dharmaḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asya dharmasya sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasmin dharme tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ dhārmastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह धर्म सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस धर्म के लिए मधु हैं। धर्म में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में धर्ममय जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.12

इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

idaṃ satyaṃ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asya satyasya sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasmin satye tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ sātyastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह सत्य सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस सत्य के लिए मधु हैं। सत्य में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में सत्यमय जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.13

इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन्मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्

idaṃ mānuṣaṃ sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asya mānuṣasya sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasminmānuṣe tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamadhyātmaṃ mānuṣastejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam

यह मनुष्य जाति सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इसके लिए मधु हैं। मनुष्य जाति में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में मनुष्य रूप जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.14

अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मधु ।
अस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु ।
यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा ।
इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥

ayamātmā sarveṣāṃ bhūtānāṃ madhu |
asyātmanaḥ sarvāṇi bhūtāni madhu |
yaścāyamasminnātmani tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo yaścāyamātmā tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣo'yameva sa yo'yamātmā |
idamamṛtamidaṃ brahmedaṃ sarvam ||

यह आत्मा सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस आत्मा के लिए मधु हैं। इस आत्मा में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और भीतर आत्मा रूप जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।

2.5.15

स वा अयमात्मा सर्वेषां अधिपतिः सर्वेषां भूतानां राजा ।
तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः ।
एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः

sa vā ayamātmā sarveṣāṃ adhipatiḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ rājā |
tadyathā rathanābhau ca rathanemau cārāḥ sarve samarpitāḥ |
evamevāsminnātmani sarvāṇi bhūtāni sarve devāḥ sarve lokāḥ sarve prāṇāḥ sarva eta ātmānaḥ samarpitāḥ

यह आत्मा सब प्राणियों का अधिपति और राजा है। जैसे रथ के पहिये की नाभि और नेमि में सब अरे जुड़े रहते हैं, वैसे ही इस आत्मा में सब प्राणी, सब देवता, सब लोक, सब प्राण और ये सब जीवात्माएँ पिरोए हुए हैं।

इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच

2.5.16

तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वां नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।
दध्यङ्ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति

tadetadṛṣiḥ paśyannavocat tadvāṃ narā sanaye daṃsa ugramāviṣkṛṇomi tanyaturna vṛṣṭim |
dadhyaṅha yanmadhvātharvaṇo vāmaśvasya śīrṣṇā pra yadīmuvāceti

यही वह मधुविद्या है जो आथर्वण दध्यङ् ने अश्विनीकुमारों को सिखाई थी। इसे देखकर ऋषि ने कहा: "हे वीरो, जैसे मेघगर्जन वर्षा की सूचना देता है, वैसे ही मैं तुम्हारे उस उग्र कर्म को प्रकट करता हूँ, कि किस प्रकार अथर्वा के पुत्र दध्यङ् ने घोड़े के सिर से तुम्हें मधु का उपदेश दिया।"

2.5.17

तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विनौ दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।
स वां मधु प्र वोचदृतायन् त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपिकक्ष्यं वामिति

tadetadṛṣiḥ paśyannavocat ātharvaṇāyāśvinau dadhīce'śvyaṃ śiraḥ pratyairayatam |
sa vāṃ madhu pra vocadṛtāyan tvāṣṭraṃ yaddasrāvapikakṣyaṃ vāmiti

इसे देखकर ऋषि ने कहा: "हे अश्विनीकुमारो, तुमने अथर्वा के पुत्र दधीचि पर घोड़े का सिर लगाया। अपने वचन के पक्के उन्होंने तुम्हें त्वष्टा का मधु बताया, और हे अद्भुतकर्मा, उसका गूढ़ रहस्य भी।"

2.5.18

तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः ।
पुरः स पक्षी भुत्वा पुरः पुरुष आविशदिति ।
स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयः ।
नैनेन किं चनानावृतम् ।
नैनेन किं चनासंवृतम्

tadetadṛṣiḥ paśyannavocat puraścakre dvipadaḥ puraścakre catuṣpadaḥ |
puraḥ sa pakṣī bhutvā puraḥ puruṣa āviśaditi |
sa vā ayaṃ puruṣaḥ sarvāsu pūrṣu puriśayaḥ |
nainena kiṃ canānāvṛtam |
nainena kiṃ canāsaṃvṛtam

इसे देखकर ऋषि ने कहा: "उसने दो पैरों वाले शरीर बनाए, उसने चार पैरों वाले शरीर बनाए। पहले पक्षी बनकर वह पुरुष रूप में उनमें प्रविष्ट हुआ।" यह पुरुष सब शरीर रूपी पुरों में निवास करता है। ऐसा कुछ नहीं जो उससे ढका न हो, ऐसा कुछ नहीं जो उससे भरा न हो।

2.5.19

तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय ।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति ।
अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्रणि बहूनि चानन्तानि च ।
तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् ।
अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः ।
इत्यनुशासनम्

tadetadṛṣiḥ paśyannavocat rūpaṃrūpaṃ pratirūpo babhūva tadasya rūpaṃ praticakṣaṇāya |
indro māyābhiḥ pururūpa īyate yuktā hyasya harayaḥ śatā daśeti |
ayaṃ vai harayo'yaṃ vai daśa ca sahasraṇi bahūni cānantāni ca |
tadetadbrahmāpūrvamanaparamanantaramabāhyam |
ayamātmā brahma sarvānubhūḥ |
ityanuśāsanam

इसे देखकर ऋषि ने कहा: "वह हर रूप का प्रतिरूप बना, और वह रूप उसे प्रकट करने के लिए है। इन्द्र अपनी माया शक्तियों से अनेक रूपों में विचरते हैं; उनके रथ में दस सौ घोड़े जुते हैं।" वही घोड़े हैं; वही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त हैं। यह ब्रह्म न पहले वाला है न बाद वाला, न भीतर वाला न बाहर वाला। यह आत्मा ही ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला। यही उपदेश है।

2.6.1

अथ वंशः
पौतिमाष्यो गौपवनात् ।
गौपवनः पशुतिमाष्यात् ।
पशुतिमाष्यो गौपवनात् ।
गौपवनः कौशिकात् ।
कौशिकः कौण्डिन्यात् ।
कौण्डिन्यः शाण्डिल्यात् ।
शाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च ।
गौतमः

atha vaṃśaḥ
pautimāṣyo gaupavanāt |
gaupavanaḥ paśutimāṣyāt |
paśutimāṣyo gaupavanāt |
gaupavanaḥ kauśikāt |
kauśikaḥ kauṇḍinyāt |
kauṇḍinyaḥ śāṇḍilyāt |
śāṇḍilyaḥ kauśikācca gautamācca |
gautamaḥ

अब गुरु परंपरा। पौतिमाष्य ने गौपवन से पाया, गौपवन ने पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कौशिक और गौतम से, और गौतम ने...

2.6.2

आग्निवेश्यात् ।
आग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्च ।
आनभिम्लात आनभिम्लातात् ।
आनभिम्लात आनभिम्लातात् ।
आनभिम्लातो गौतमात् ।
गौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्याम् ।
सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात् ।
पाराशर्यो भारद्वाजात् ।
भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च ।
गौतमो भारद्वाजात् ।
भारद्वाजः पाराशर्यात् ।
पाराशर्यो वैजवापायनात् ।
वैजवापायनः कौशिकायनेः ।
कौशिकायनिः

āgniveśyāt |
āgniveśyaḥ śāṇḍilyāccānabhimlātācca |
ānabhimlāta ānabhimlātāt |
ānabhimlāta ānabhimlātāt |
ānabhimlāto gautamāt |
gautamaḥ saitavaprācīnayogyābhyām |
saitavaprācīnayogyau pārāśaryāt |
pārāśaryo bhāradvājāt |
bhāradvājo bhāradvājācca gautamācca |
gautamo bhāradvājāt |
bhāradvājaḥ pārāśaryāt |
pārāśaryo vaijavāpāyanāt |
vaijavāpāyanaḥ kauśikāyaneḥ |
kauśikāyaniḥ

...आग्निवेश्य से। आग्निवेश्य ने शाण्डिल्य और आनभिम्लात से पाया, आनभिम्लात ने आनभिम्लात से, और उन्होंने गौतम से। गौतम ने सैतव और प्राचीनयोग्य से पाया, उन्होंने पाराशर्य से, पाराशर्य ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने भारद्वाज और गौतम से, गौतम ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने वैजवापायन से, वैजवापायन ने कौशिकायनि से, और कौशिकायनि ने...

2.6.3

घृतकौशिकात् ।
घृतकौशिकः प्राशर्यायणात् ।
पारशर्यायणः पाराशर्यात् ।
पाराशर्यो जातूकर्ण्यात् ।
जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्च ।
आसुरायणस्त्रैवणेः ।
त्रैवणिरौपजन्धनेः ।
औपजन्धनिरासुरेः ।
आसुरिर्भारद्वाजात् ।
भारद्वाज आत्रेयात् ।
आत्रेयो माण्टेः ।
माण्टिर्गौतमात् ।
गौतमो वात्स्यात् ।
वात्स्यः शाण्डिल्यात् ।
शाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात् ।
कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् ।
कुमारहारितो गालवात् ।
गालवो विदर्भीकौण्डिन्यात् ।
विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवात् ।
वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् ।
पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसात् ।
अयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रात् ।
आभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वाष्ट्रात् ।
विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽव्शिभ्याम् ।
अश्विनौ दधीच आथर्वणात् ।
दध्यङ्ङाथर्वणोऽथर्वणो दैवात् ।
अथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनात् ।
मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात् ।
प्रध्वंसन एकर्षेः ।
एकर्षिर्विप्रचित्तेः ।
विप्रचित्तिर्व्यष्टेर् ।
व्यष्टिः सनारोः ।
सनारुः सनातनात् ।
सनातनः सनगात् ।
सनगः परमेष्ठिनः ।
परमेष्ठी ब्रह्मणः ।
ब्रह्म स्वयंभु ।
ब्रह्मणे नमः

ghṛtakauśikāt |
ghṛtakauśikaḥ prāśaryāyaṇāt |
pāraśaryāyaṇaḥ pārāśaryāt |
pārāśaryo jātūkarṇyāt |
jātūkarṇya āsurāyaṇācca yāskācca |
āsurāyaṇastraivaṇeḥ |
traivaṇiraupajandhaneḥ |
aupajandhanirāsureḥ |
āsurirbhāradvājāt |
bhāradvāja ātreyāt |
ātreyo māṇṭeḥ |
māṇṭirgautamāt |
gautamo vātsyāt |
vātsyaḥ śāṇḍilyāt |
śāṇḍilyaḥ kaiśoryātkāpyāt |
kaiśoryaḥ kāpyaḥ kumārahāritāt |
kumārahārito gālavāt |
gālavo vidarbhīkauṇḍinyāt |
vidarbhīkauṇḍinyo vatsanapāto bābhravāt |
vatsanapādbābhravaḥ pathaḥ saubharāt |
panthāḥ saubharo'yāsyādāṅgirasāt |
ayāsya āṅgirasa ābhūtestvāṣṭrāt |
ābhūtistvāṣṭro viśvarūpāttvāṣṭrāt |
viśvarūpastvāṣṭro'vśibhyām |
aśvinau dadhīca ātharvaṇāt |
dadhyaṅṅātharvaṇo'tharvaṇo daivāt |
atharvā daivo mṛtyoḥ prādhvaṃsanāt |
mṛtyuḥ prādhvaṃsanaḥ pradhvaṃsanāt |
pradhvaṃsana ekarṣeḥ |
ekarṣirvipracitteḥ |
vipracittirvyaṣṭer |
vyaṣṭiḥ sanāroḥ |
sanāruḥ sanātanāt |
sanātanaḥ sanagāt |
sanagaḥ parameṣṭhinaḥ |
parameṣṭhī brahmaṇaḥ |
brahma svayaṃbhu |
brahmaṇe namaḥ

...घृतकौशिक से। आगे परंपरा इस प्रकार है: पाराशर्यायण, पाराशर्य, जातूकर्ण्य, आसुरायण और यास्क, त्रैवणि, औपजन्धनि, आसुरि, भारद्वाज, आत्रेय, माण्टि, गौतम, वात्स्य, शाण्डिल्य, कैशोर्य काप्य, कुमारहारित, गालव, विदर्भीकौण्डिन्य, वत्सनपात् बाभ्रव, पन्था सौभर, अयास्य आंगिरस, आभूति त्वाष्ट्र, विश्वरूप त्वाष्ट्र, अश्विनीकुमार, दध्यङ् आथर्वण, अथर्वा दैव, मृत्यु प्राध्वंसन, प्रध्वंसन, एकर्षि, विप्रचित्ति, व्यष्टि, सनारु, सनातन, सनग और परमेष्ठी, जिन्होंने इसे ब्रह्म से पाया। ब्रह्म स्वयंभू है। ब्रह्म को नमस्कार।

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