अध्याय 2: अजातशत्रु, और याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद
इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
66 श्लोक · 2 में से 6
इस अध्याय में क्या होता है
अजातशत्रु, और याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद
अभिमानी गार्ग्य बालाकि काशी के राजा अजातशत्रु को ब्रह्म सिखाने चलते हैं और सूर्य, चन्द्र, बिजली के पुरुषों के नाम लेते हैं; राजा हर एक को अस्वीकार करते हैं। फिर राजा उन्हें एक सोए हुए मनुष्य के पास ले जाकर दिखाते हैं कि नींद में चेतन आत्मा कहाँ जाता है और कहाँ से लौटता है, जैसे अग्नि से चिनगारियाँ। ब्रह्म के दो रूप हैं, मूर्त और अमूर्त; उसका निर्देश है नेति नेति। घर छोड़ने से पहले याज्ञवल्क्य सम्पत्ति बाँटना चाहते हैं। मैत्रेयी पूछती हैं कि क्या धन से अमृतत्व मिलेगा। वे बताते हैं कि सब कुछ आत्मा के लिए प्रिय होता है; आत्मा को देखना, सुनना, मनन और निदिध्यासन करना है। जहाँ सब आत्मा हो गया, वहाँ ज्ञाता को किससे जानें? अन्त में मधुविद्या है।
द्वितीयोऽध्यायः । प्रथमं ब्राह्मणम् (अजातशत्रुब्राह्मणं वा पर्यंकविद्याब्राह्मणम्) दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस । स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति । स होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मः, जनको जनक इति वै जना धावन्तीति
dvitīyo'dhyāyaḥ | prathamaṃ brāhmaṇam (ajātaśatrubrāhmaṇaṃ vā paryaṃkavidyābrāhmaṇam) dṛptabālākirhānūcāno gārgya āsa | sa hovācājātaśatruṃ kāśyaṃ brahma te bravāṇīti | sa hovācājātaśatruḥ sahasrametasyāṃ vāci dadmaḥ, janako janaka iti vai janā dhāvantīti
गर्ग कुल के दृप्तबालाकि नाम के एक विद्वान थे, वेद में पारंगत पर अभिमानी। उन्होंने काशी के राजा अजातशत्रु से कहा, "मैं तुम्हें ब्रह्म का उपदेश दूँ।" अजातशत्रु बोले, "इस वचन के लिए ही मैं सहस्र गौएँ देता हूँ। लोग तो 'जनक, जनक' कहते हुए दौड़ते हैं, मानो दाता केवल वही हों।"
स होवाच गार्ग्यः य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुर् मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति
sa hovāca gārgyaḥ ya evāsāvāditye puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatrur mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ | atiṣṭhāḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ mūrdhā rājeti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste'tiṣṭhāḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ mūrdhā rājā bhavati
गार्ग्य ने कहा, "सूर्य में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे सब प्राणियों से ऊपर स्थित, उनका मस्तक और राजा मानकर उपासता हूँ।" जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सब प्राणियों में श्रेष्ठ, उनका मस्तक और राजा बनता है।
स होवाच गार्ग्यः य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । बृहन् पाण्दरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्तेऽहरहर्सुतः प्रसुतो भवति । नास्यान्नं क्षीयते
sa hovāca gārgyaḥ ya evāsau candre puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ | bṛhan pāṇdaravāsāḥ somo rājeti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste'haraharsutaḥ prasuto bhavati | nāsyānnaṃ kṣīyate
गार्ग्य ने कहा, "चन्द्रमा में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे श्वेत वस्त्रधारी महान राजा सोम मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, उसके लिए प्रतिदिन सोम निचोड़ा जाता है और उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता।
स होवाच गार्ग्यः य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति । तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति
sa hovāca gārgyaḥ ya evāsau vidyuti puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ | tejasvīti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste tejasvī ha bhavati | tejasvinī hāsya prajā bhavati
गार्ग्य ने कहा, "विद्युत में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे तेजस्वी मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह तेजस्वी होता है और उसकी संतान भी तेजस्वी होती है।
स होवाच गार्ग्यः य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamākāśe puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ | pūrṇamapravartīti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste pūryate prajayā paśubhirnāsyāsmāllokātprajodvartate
गार्ग्य ने कहा, "आकाश में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे पूर्ण और अचल मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह संतान और पशुओं से भर जाता है, और उसकी वंश परंपरा इस लोक से उच्छिन्न नहीं होती।
स होवाच गार्ग्यः य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ vāyau puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ | indro vaikuṇṭho'parājitā seneti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste jiṣṇurhāparājiṣṇurbhavatyanyatastyajāyī
गार्ग्य ने कहा, "वायु में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे इन्द्र वैकुण्ठ और अपराजित सेना मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह विजयी और अजेय होता है तथा शत्रुओं को जीत लेता है।
स होवाच गार्ग्यः य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति । विषासहिर्हास्य प्रजा भवति
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamagnau puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ | viṣāsahiriti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste viṣāsahirha bhavati | viṣāsahirhāsya prajā bhavati
गार्ग्य ने कहा, "अग्नि में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे सब कुछ सहने और जीतने वाला मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह सहनशील और प्रबल होता है, और उसकी संतान भी वैसी ही होती है।
स होवाच गार्ग्यः य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपं हैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपम् । अथो प्रतिरुपोऽस्माज्जायते
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamapsu puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ | pratirūpa iti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste pratirūpaṃ haivainamupagacchati nāpratirūpam | atho pratirupo'smājjāyate
गार्ग्य ने कहा, "जल में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे प्रतिरूप, अर्थात अनुकूल छवि मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, उसके पास अनुकूल ही आता है, प्रतिकूल नहीं, और उससे अनुरूप संतान जन्म लेती है।
स होवाच गार्ग्यः य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति । रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवति । अथो यैः संनिगच्छति । सर्वांस्तानतिरोचते
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamādarśe puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ | rociṣṇuriti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste rociṣṇurha bhavati | rociṣṇurhāsya prajā bhavati | atho yaiḥ saṃnigacchati | sarvāṃstānatirocate
गार्ग्य ने कहा, "दर्पण में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे दीप्तिमान मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह दीप्तिमान होता है, उसकी संतान भी दीप्तिमान होती है, और जिनसे वह मिलता है उन सबसे अधिक चमकता है।
स होवाच गार्ग्यः य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । असुरिति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति । नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ yantaṃ paścācchabdo'nūdetyetamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ | asuriti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste sarvaṃ haivāsmiṃlloka āyureti | nainaṃ purā kālātprāṇo jahāti
गार्ग्य ने कहा, "चलते हुए मनुष्य के पीछे जो शब्द उठता है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे प्राणशक्ति मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह इस लोक में पूर्ण आयु पाता है और समय से पहले प्राण उसे नहीं छोड़ते।
स होवाच गार्ग्यः य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति । नास्माद्गणश्छिद्यते
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ dikṣu puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ | dvitīyo'napaga iti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste dvitīyavān ha bhavati | nāsmādgaṇaśchidyate
गार्ग्य ने कहा, "दिशाओं में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे कभी साथ न छोड़ने वाला दूसरा साथी मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, उसके साथी सदा बने रहते हैं और उसका समूह उससे कभी अलग नहीं होता।
स होवाच गार्ग्यः य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते सर्वं हैवास्मिंल्लोक आयुरेति । नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyaṃ chāyāmayaḥ puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasminsaṃvadiṣṭhāḥ | mṛtyuriti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāste sarvaṃ haivāsmiṃlloka āyureti | nainaṃ purā kālānmṛtyurāgacchati
गार्ग्य ने कहा, "छायामय जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे मृत्यु मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह इस लोक में पूर्ण आयु पाता है और समय से पहले मृत्यु उसके पास नहीं आती।
स होवाच गार्ग्यः य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवति । आत्मन्विनी हास्य प्रजा भवति । स ह तूष्णीमास गार्ग्यः
sa hovāca gārgyaḥ ya evāyamātmani puruṣa etamevāhaṃ brahmopāsa iti | sa hovācājātaśatruḥ mā maitasmin saṃvadiṣṭhāḥ | ātmanvīti vā ahametamupāsa iti | sa ya etamevamupāsta ātmanvī ha bhavati | ātmanvinī hāsya prajā bhavati | sa ha tūṣṇīmāsa gārgyaḥ
गार्ग्य ने कहा, "शरीर में जो पुरुष है, उसी की मैं ब्रह्म रूप में उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु बोले, "उसके विषय में मुझसे बात मत करो। मैं उसे आत्मवान मानकर उपासता हूँ।" जो ऐसा उपासता है, वह आत्मवान होता है और उसकी संतान भी आत्मवती होती है। तब गार्ग्य चुप हो गए।
स होवाचाजातशत्रुः एतावन्नू३ इति । एतावद्धीति । नैतावता विदितं भवतीति । स होवाच गार्ग्यः उप त्वायानीति
sa hovācājātaśatruḥ etāvannū3 iti | etāvaddhīti | naitāvatā viditaṃ bhavatīti | sa hovāca gārgyaḥ upa tvāyānīti
अजातशत्रु ने पूछा, "क्या बस इतना ही?" गार्ग्य बोले, "इतना ही।" राजा ने कहा, "इतने से ब्रह्म नहीं जाना जाता।" तब गार्ग्य ने कहा, "मैं शिष्य बनकर आपके पास आना चाहता हूँ।"
स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति । व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति । तं पाणावादायोत्तस्थौ । तौ ह पुरुषं सुप्तमाजग्मतुः । तमेतैर्नामभिरामन्त्रयां चक्रे बृहन् पाण्दरवासः सोम राजन्निति । स नोत्तस्थौ । तं पाणिनापेषं बोधयां चकार । स होत्तस्थौ
sa hovācājātaśatruḥ pratilomaṃ caitadyadbrāhmaṇaḥ kṣatriyamupeyādbrahma me vakṣyatīti | vyeva tvā jñapayiṣyāmīti | taṃ pāṇāvādāyottasthau | tau ha puruṣaṃ suptamājagmatuḥ | tametairnāmabhirāmantrayāṃ cakre bṛhan pāṇdaravāsaḥ soma rājanniti | sa nottasthau | taṃ pāṇināpeṣaṃ bodhayāṃ cakāra | sa hottasthau
अजातशत्रु बोले, "यह उलटी रीति है कि ब्राह्मण क्षत्रिय के पास ब्रह्म सीखने आए। फिर भी मैं तुम्हें इसका बोध कराऊँगा।" वे उनका हाथ पकड़कर उठे। दोनों एक सोए हुए पुरुष के पास पहुँचे। राजा ने उसे उन्हीं नामों से पुकारा, "हे महान, श्वेत वस्त्रधारी, राजा सोम!" वह नहीं उठा। तब राजा ने हाथ से दबाकर उसे जगाया, और वह उठ बैठा।
अजातशत्रु बोले, "जब यह मनुष्य सोया था, तब इस विज्ञानमय पुरुष ने अपने विज्ञान से इन्द्रियों की ज्ञानशक्ति को समेटकर हृदय के भीतर के आकाश में विश्राम किया। जब वह इन्हें समेट लेता है, तभी कहते हैं कि मनुष्य सो रहा है। तब प्राण, वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन, सब भीतर समेटे रहते हैं।"
स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकाः । तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मणः । उतेवोच्चावचं निगच्छति । स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते
sa yatraitatsvapnyayā carati te hāsya lokāḥ | taduteva mahārājo bhavatyuteva mahābrāhmaṇaḥ | utevoccāvacaṃ nigacchati | sa yathā mahārājo jānapadān gṛhītvā sve janapade yathākāmaṃ parivartetaivamevaiṣa etatprāṇān gṛhītvā sve śarīre yathākāmaṃ parivartate
जब वह स्वप्न में विचरता है, तब वे ही उसके लोक होते हैं। वहाँ वह मानो महाराजा बन जाता है, या महान ब्राह्मण, और ऊँची नीची अवस्थाओं में जाता है। जैसे कोई महाराजा अपनी प्रजा को साथ लेकर अपने राज्य में इच्छानुसार घूमता है, वैसे ही यह इन्द्रियों को साथ लेकर अपने शरीर में इच्छानुसार घूमता है।
फिर जब वह गहरी नींद में होता है और किसी भी वस्तु को नहीं जानता, तब वह हृदय से पूरे शरीर में फैली हिता नाम की बहत्तर हज़ार नाड़ियों से लौटकर शरीर में ही विश्राम करता है। जैसे कोई बालक, महाराजा या महान ब्राह्मण आनन्द की चरम अवस्था पाकर सोए, वैसे ही वह वहाँ सोता है।
जैसे मकड़ी अपने तन्तु पर ऊपर चढ़ती है, और जैसे अग्नि से छोटी छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से सब प्राण, सब लोक, सब देवता और सब प्राणी निकलते हैं। इसका गूढ़ नाम है सत्य का सत्य। प्राण सत्य हैं, और आत्मा उनका भी सत्य है।
(sarvānnabrāhmaṇaṃ vā śiśubrāhmaṇam) yo ha vai śiśuṃ sādhānaṃ sapratyādhānaṃ sasthūṇaṃ sadāmaṃ veda sapta ha dviṣato bhrātṛvyānavaruṇaddhi | ayaṃ vāva śiśuryo'yaṃ madhyamaḥ prāṇaḥ | tasyedamevādhānamidaṃ pratyādhānaṃ prāṇaḥ sthūṇānnaṃ dāma
जो शिशु को उसके आधान, प्रत्याधान, खूँटे और रस्सी सहित जानता है, वह सात द्वेषी शत्रुओं को रोक देता है। यह शिशु शरीर के भीतर का मध्यम प्राण है। शरीर उसका आधान है, सिर उसका प्रत्याधान, प्राण उसका खूँटा और अन्न उसकी रस्सी।
सात अक्षय शक्तियाँ उसकी सेवा में रहती हैं। आँख की लाल रेखाओं से रुद्र उससे जुड़े हैं, आँख के जल से पर्जन्य, पुतली से आदित्य, काले भाग से अग्नि और श्वेत भाग से इन्द्र। नीचे की पलक से पृथ्वी उससे जुड़ी है और ऊपर की पलक से द्युलोक। जो ऐसा जानता है, उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता।
इस पर एक श्लोक है: "एक चमस है जिसका मुख नीचे और तल ऊपर है; उसमें सब रूपों वाला यश रखा है। उसके किनारे पर सात ऋषि बैठे हैं, और आठवीं वाणी है जो ब्रह्म से जुड़ी है।" यह चमस सिर है, जिसका मुख नीचे और तल ऊपर है। सब रूपों वाला यश प्राण हैं। सात ऋषि भी प्राण ही हैं। आठवीं वाणी है, क्योंकि वाणी ब्रह्म अर्थात वेद से जुड़ी है।
ये दोनों कान गोतम और भरद्वाज हैं; यह गोतम है, वह भरद्वाज। ये दोनों नेत्र विश्वामित्र और जमदग्नि हैं; यह विश्वामित्र है, वह जमदग्नि। ये दोनों नासिका छिद्र वसिष्ठ और कश्यप हैं। जिह्वा रूपी वाणी अत्रि है, क्योंकि वाणी से ही अन्न खाया जाता है, और अत्रि का वास्तविक नाम अत्ति है, अर्थात खाने वाला। जो ऐसा जानता है, वह सबका भोक्ता होता है और सब उसका अन्न बन जाता है।
tadetanmūrtaṃ yadanyadvāyoścāntarikṣācca | etanmartyam | etatsthitam | etatsat | tasyaitasya mūrtasyaitasya martyasyaitasya sthitasyaitasya sata eṣa raso ya eṣa tapati | sato hyeṣa rasaḥ
वायु और अन्तरिक्ष से भिन्न जो कुछ है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, स्थित है, सत् है। इस मूर्त, मर्त्य, स्थित और सत् का सार वह सूर्य है जो वहाँ तपता है, क्योंकि वही सत् का रस है।
अब अमूर्त: वह वायु और अन्तरिक्ष है। यह अमृत है, गतिशील है, त्यत् अर्थात परे वाला है। इस अमूर्त, अमृत, गतिशील और परे वाले का सार सूर्यमण्डल के भीतर स्थित पुरुष है, क्योंकि वही त्यत् का रस है। यह देवताओं के सम्बन्ध में कहा गया।
अब शरीर के सम्बन्ध में। प्राण और शरीर के भीतर के आकाश से भिन्न जो कुछ है, वह मूर्त है। यह मर्त्य, स्थित और सत् है। इस मूर्त, मर्त्य, स्थित और सत् का सार नेत्र है, क्योंकि वही सत् का रस है।
अब अमूर्त: वह प्राण और शरीर के भीतर का आकाश है। यह अमृत, गतिशील और परे वाला है। इस अमूर्त, अमृत, गतिशील और परे वाले का सार दाहिने नेत्र में स्थित पुरुष है, क्योंकि वही त्यत् का रस है।
tasya haitasya puruṣasya rūpam | yathā māhārajanaṃ vāso yathā pāṇḍvāvikaṃ yathendragopo yathāgnyarciryathā puṇḍarīkaṃ yathā sakṛdvidyuttam | sakṛdvidyutteva ha vā asya śrīrbhavati ya evaṃ veda | athāta ādeśo neti neti | na hyetasmāditi netyanyatparamasti | atha nāmadheyaṃ satyasya satyamiti | prāṇā vai satyam | teṣāmeṣa satyam
इस पुरुष का रूप केसरिया रंगे वस्त्र जैसा है, श्वेत ऊन जैसा, लाल इन्द्रगोप कीट जैसा, अग्नि की लपट जैसा, श्वेत कमल जैसा, और एक बार चमकी बिजली जैसा। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजली की तरह चमक उठती है। अब उपदेश है: नेति नेति, यह नहीं, यह नहीं। इस 'नेति' से परे और कुछ नहीं है। इसका नाम है सत्य का सत्य। प्राण सत्य हैं, और यह उनका भी सत्य है।
sā hovāca maitreyī yannu ma iyaṃ bhagoḥ sarvā pṛthivī vittena pūrṇā syātkathaṃ tenāmṛtā syāmiti | neti hovāca yājñavalkyaḥ | yathaivopakaraṇavatāṃ jīvitaṃ tathaiva te jīvitaṃ syāt | amṛtatvasya tu nāśāsti vitteneti
मैत्रेयी ने कहा, "भगवन्, यदि धन से भरी यह सारी पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं उससे अमर हो जाऊँगी?" याज्ञवल्क्य बोले, "नहीं। तुम्हारा जीवन वैसा ही होगा जैसा साधन सम्पन्न लोगों का होता है। धन से अमृतत्व की कोई आशा नहीं है।"
स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि । आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्
sa hovāca na vā are patyuḥ kāmāya patiḥ priyo bhavatyātmanastu kāmāya patiḥ priyo bhavati | na vā are jāyāyai kāmāya jāyā priyā bhavatyātmanastu kāmāya jāyā priyā bhavati | na vā are putrāṇāṃ kāmāya putrāḥ priyā bhavantyātmanastu kāmāya putrāḥ priyā bhavanti | na vā are vittasya kāmāya vittaṃ priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya vittaṃ priyaṃ bhavati | na vā are brahmaṇaḥ kāmāya brahma priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya brahma priyaṃ bhavati | na vā are kṣatrasya kāmāya kṣatraṃ priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya kṣatraṃ priyaṃ bhavati | na vā are lokānāṃ kāmāya lokāḥ priyā bhavantyātmanastu kāmāya lokāḥ priyā bhavanti | na vā are devānāṃ kāmāya devāḥ priyā bhavantyātmanastu kāmāya devāḥ priyā bhavanti | na vā are bhūtānāṃ kāmāya bhūtāni priyāṇi bhavantyātmanastu kāmāya bhūtāni priyāṇi bhavanti | na vā are sarvasya kāmāya sarvaṃ priyaṃ bhavatyātmanastu kāmāya sarvaṃ priyaṃ bhavati | ātmā vā are draṣṭavyaḥ śrotavyo mantavyo nididhyāsitavyo maitreyi | ātmano vā are darśanena śravaṇena matyā vijñānenedaṃ sarvaṃ viditam
वे बोले, "पति के लिए पति प्रिय नहीं होता, आत्मा के लिए पति प्रिय होता है। पत्नी, पुत्र, धन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देवता और प्राणी भी अपने लिए नहीं, आत्मा के लिए ही प्रिय होते हैं। सब कुछ अपने लिए नहीं, आत्मा के लिए ही प्रिय होता है। हे मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन करने योग्य है। आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान से यह सब जान लिया जाता है।"
brahma taṃ parādādyo'nyatrātmano brahma veda | kṣatraṃ taṃ parādādyo'nyatrātmanaḥ kṣatraṃ veda | lokāstaṃ parāduryo'nyatrātmano lokān veda | devāstaṃ parāduryo'nyatrātmano devān veda | bhūtāni taṃ parāduryo'nyatrātmano bhūtāni veda | sarvaṃ taṃ parādādyo'nyatrātmanaḥ sarvaṃ veda | idaṃ brahmedaṃ kṣatramime lokā ime devā imāni bhūtānīdaṃ sarvaṃ yadayamātmā
जो ब्राह्मण को आत्मा से भिन्न जानता है, ब्राह्मण उसे त्याग देता है। जो क्षत्रिय को आत्मा से भिन्न जानता है, क्षत्रिय उसे त्याग देता है। जो लोकों, देवताओं, प्राणियों और सब कुछ को आत्मा से भिन्न जानता है, वे सब उसे त्याग देते हैं। यह ब्राह्मण, यह क्षत्रिय, ये लोक, ये देवता, ये प्राणी, यह सब कुछ, यही आत्मा है।
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय । दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः
sa yathā dundubherhanyamānasya na bāhyāñchabdāñchaknuyādgrahaṇāya | dundubhestu grahaṇena dundubhyāghātasya vā śabdo gṛhītaḥ
जब नगाड़ा बजाया जा रहा हो, तो उससे बाहर निकलती ध्वनियों को अलग अलग नहीं पकड़ा जा सकता; पर नगाड़े को, या बजाने वाले को पकड़ लेने से ध्वनि भी पकड़ में आ जाती है।
जैसे गीले ईंधन से जलाई अग्नि से अलग अलग धुआँ निकलता है, वैसे ही हे मैत्रेयी, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वांगिरस, इतिहास, पुराण, विद्याएँ, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान और व्याख्यान, ये सब उसी महान सत्ता का निःश्वास हैं। ये सब उसी के द्वारा श्वास के रूप में बाहर आए हैं।
स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनम् । एवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम् । एवं सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनम् । एवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनम् । एवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनम् । एवं सर्वेषं शब्दानां श्रोत्रमेकायनम् । एवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम् । एवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनम् । एवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनम् । एवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम् । एवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनम् । एवं सर्वेषामध्वनां पादावेकायनम् । एवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनम्
जैसे सब जलों का एक ही आश्रय समुद्र है, वैसे ही सब स्पर्शों का आश्रय त्वचा है, सब गंधों का नासिका, सब रसों का जिह्वा, सब रूपों का नेत्र, सब शब्दों का श्रोत्र, सब संकल्पों का मन, सब विद्याओं का हृदय, सब कर्मों का हाथ, सब आनन्दों का उपस्थ, सब विसर्जनों का पायु, सब मार्गों का पैर, और सब वेदों का आश्रय वाणी है।
स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्यात् । यतोयतस्त्वाददीत लवणम् । एवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव । एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति । न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमि । इति होवाच याज्ञवल्क्यः
sa yathā saindhavakhilya udake prāsta udakamevānuvilīyeta na hāsyodgrahaṇāyeva syāt | yatoyatastvādadīta lavaṇam | evaṃ vā ara idaṃ mahadbhūtamanantamapāraṃ vijñānaghana eva | etebhyo bhūtebhyaḥ samutthāya tānyevānuvinaśyati | na pretya saṃjñāstītyare bravīmi | iti hovāca yājñavalkyaḥ
जैसे जल में डाली गई नमक की डली जल में ही घुल जाती है और फिर निकाली नहीं जा सकती, पर जहाँ से भी जल लो वह खारा ही होता है, वैसे ही हे मैत्रेयी, यह महान सत्ता अनन्त और अपार है, केवल विज्ञानघन है। इन भूतों से उठकर यह उन्हीं के साथ विलीन हो जाती है। देह छूटने के बाद कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती। याज्ञवल्क्य ने कहा, "यही मैं कहता हूँ।"
सा होवाच मैत्रेयी अत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति । स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीमि । अलं वा अर इदं विज्ञानाय
sā hovāca maitreyī atraiva mā bhagavānamūmuhanna pretya saṃjñāstīti | sa hovāca na vā are'haṃ mohaṃ bravīmi | alaṃ vā ara idaṃ vijñānāya
मैत्रेयी ने कहा, "भगवन्, यह कहकर कि देह छूटने के बाद संज्ञा नहीं रहती, आपने मुझे भ्रम में डाल दिया।" वे बोले, "हे मैत्रेयी, मैं भ्रम की बात नहीं कह रहा। समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है।"
जहाँ मानो द्वैत होता है, वहाँ एक दूसरे को सूँघता है, देखता है, सुनता है, दूसरे से बोलता है, दूसरे का मनन करता है और दूसरे को जानता है। पर जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ किससे किसे सूँघे, देखे, सुने, किससे बोले, किसका मनन करे, किसे जाने? जिससे यह सब जाना जाता है, उसे किससे जाने? हे मैत्रेयी, जानने वाले को किससे जाना जाए?
यह पृथ्वी सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस पृथ्वी के लिए मधु हैं। इस पृथ्वी में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
ये जल सब प्राणियों के लिए मधु हैं, और सब प्राणी इन जलों के लिए मधु हैं। जलों में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में वीर्य में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह अग्नि सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस अग्नि के लिए मधु हैं। अग्नि में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में वाणी में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह वायु सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस वायु के लिए मधु हैं। वायु में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में प्राण रूप जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह आदित्य सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस आदित्य के लिए मधु हैं। आदित्य में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में नेत्र में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
ये दिशाएँ सब प्राणियों के लिए मधु हैं, और सब प्राणी इन दिशाओं के लिए मधु हैं। दिशाओं में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में श्रोत्र और प्रतिध्वनि में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह चन्द्रमा सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस चन्द्रमा के लिए मधु हैं। चन्द्रमा में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में मन में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह विद्युत सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस विद्युत के लिए मधु हैं। विद्युत में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर के तेज में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह मेघगर्जन सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इसके लिए मधु हैं। मेघगर्जन में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में शब्द और स्वर में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह आकाश सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस आकाश के लिए मधु हैं। आकाश में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और हृदय के आकाश में स्थित जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह धर्म सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस धर्म के लिए मधु हैं। धर्म में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में धर्ममय जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह सत्य सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस सत्य के लिए मधु हैं। सत्य में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में सत्यमय जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह मनुष्य जाति सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इसके लिए मधु हैं। मनुष्य जाति में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और शरीर में मनुष्य रूप जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
यह आत्मा सब प्राणियों के लिए मधु है, और सब प्राणी इस आत्मा के लिए मधु हैं। इस आत्मा में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और भीतर आत्मा रूप जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वे दोनों यही आत्मा हैं। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है।
स वा अयमात्मा सर्वेषां अधिपतिः सर्वेषां भूतानां राजा । तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः । एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः
sa vā ayamātmā sarveṣāṃ adhipatiḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ rājā | tadyathā rathanābhau ca rathanemau cārāḥ sarve samarpitāḥ | evamevāsminnātmani sarvāṇi bhūtāni sarve devāḥ sarve lokāḥ sarve prāṇāḥ sarva eta ātmānaḥ samarpitāḥ
यह आत्मा सब प्राणियों का अधिपति और राजा है। जैसे रथ के पहिये की नाभि और नेमि में सब अरे जुड़े रहते हैं, वैसे ही इस आत्मा में सब प्राणी, सब देवता, सब लोक, सब प्राण और ये सब जीवात्माएँ पिरोए हुए हैं।
यही वह मधुविद्या है जो आथर्वण दध्यङ् ने अश्विनीकुमारों को सिखाई थी। इसे देखकर ऋषि ने कहा: "हे वीरो, जैसे मेघगर्जन वर्षा की सूचना देता है, वैसे ही मैं तुम्हारे उस उग्र कर्म को प्रकट करता हूँ, कि किस प्रकार अथर्वा के पुत्र दध्यङ् ने घोड़े के सिर से तुम्हें मधु का उपदेश दिया।"
tadetadṛṣiḥ paśyannavocat ātharvaṇāyāśvinau dadhīce'śvyaṃ śiraḥ pratyairayatam | sa vāṃ madhu pra vocadṛtāyan tvāṣṭraṃ yaddasrāvapikakṣyaṃ vāmiti
इसे देखकर ऋषि ने कहा: "हे अश्विनीकुमारो, तुमने अथर्वा के पुत्र दधीचि पर घोड़े का सिर लगाया। अपने वचन के पक्के उन्होंने तुम्हें त्वष्टा का मधु बताया, और हे अद्भुतकर्मा, उसका गूढ़ रहस्य भी।"
इसे देखकर ऋषि ने कहा: "उसने दो पैरों वाले शरीर बनाए, उसने चार पैरों वाले शरीर बनाए। पहले पक्षी बनकर वह पुरुष रूप में उनमें प्रविष्ट हुआ।" यह पुरुष सब शरीर रूपी पुरों में निवास करता है। ऐसा कुछ नहीं जो उससे ढका न हो, ऐसा कुछ नहीं जो उससे भरा न हो।
tadetadṛṣiḥ paśyannavocat rūpaṃrūpaṃ pratirūpo babhūva tadasya rūpaṃ praticakṣaṇāya | indro māyābhiḥ pururūpa īyate yuktā hyasya harayaḥ śatā daśeti | ayaṃ vai harayo'yaṃ vai daśa ca sahasraṇi bahūni cānantāni ca | tadetadbrahmāpūrvamanaparamanantaramabāhyam | ayamātmā brahma sarvānubhūḥ | ityanuśāsanam
इसे देखकर ऋषि ने कहा: "वह हर रूप का प्रतिरूप बना, और वह रूप उसे प्रकट करने के लिए है। इन्द्र अपनी माया शक्तियों से अनेक रूपों में विचरते हैं; उनके रथ में दस सौ घोड़े जुते हैं।" वही घोड़े हैं; वही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त हैं। यह ब्रह्म न पहले वाला है न बाद वाला, न भीतर वाला न बाहर वाला। यह आत्मा ही ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला। यही उपदेश है।
अब गुरु परंपरा। पौतिमाष्य ने गौपवन से पाया, गौपवन ने पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कौशिक और गौतम से, और गौतम ने...
...आग्निवेश्य से। आग्निवेश्य ने शाण्डिल्य और आनभिम्लात से पाया, आनभिम्लात ने आनभिम्लात से, और उन्होंने गौतम से। गौतम ने सैतव और प्राचीनयोग्य से पाया, उन्होंने पाराशर्य से, पाराशर्य ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने भारद्वाज और गौतम से, गौतम ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने वैजवापायन से, वैजवापायन ने कौशिकायनि से, और कौशिकायनि ने...