यज्ञीय अश्व का सिर उषा है, नेत्र सूर्य, प्राण वायु। आरम्भ में यहाँ कुछ नहीं था, केवल मृत्यु, अर्थात् भूख, जिसने लोकों को रचा। देवता और असुर उद्गीथ के लिए होड़ करते हैं; केवल प्राण को पाप नहीं बेध पाता, और प्रार्थना दी गई है: असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय। आरम्भ में केवल आत्मा था; उसने कहा अहम्, डरा, फिर अकेलापन अनुभव किया, दो हुआ, और उससे सब प्राणियों के जोड़े हुए। केवल ब्रह्म था, और उसने स्वयं को जाना: अहं ब्रह्मास्मि। जो यह जानता है, वह सब हो जाता है; देवता भी उसे रोक नहीं सकते। फिर बल से भी श्रेष्ठ धर्म प्रकट होता है।
ॐ। उषा यज्ञीय अश्व का सिर है, सूर्य उसकी आँख, वायु उसका प्राण और सब मनुष्यों में स्थित वैश्वानर अग्नि उसका खुला मुख है। संवत्सर उस अश्व का शरीर है। द्युलोक उसकी पीठ, अन्तरिक्ष उदर और पृथ्वी उसके पैरों के बीच का भाग है। दिशाएँ उसकी बगलें, उपदिशाएँ पसलियाँ, ऋतुएँ अंग, मास और पक्ष जोड़, दिन-रात पैर, नक्षत्र हड्डियाँ और बादल मांस हैं। बालू उसके पेट का अधपचा अन्न, नदियाँ नाड़ियाँ, पर्वत यकृत और फेफड़े, ओषधियाँ और वनस्पतियाँ रोम हैं। उगता सूर्य उसका अगला भाग और डूबता सूर्य पिछला भाग है। वह जम्हाई लेता है तो बिजली चमकती है, शरीर झटकता है तो मेघ गरजता है, मूत्र करता है तो वर्षा होती है। वाणी ही उसकी हिनहिनाहट है।
दिन अश्व के आगे महिमा नामक स्वर्ण यज्ञपात्र के रूप में प्रकट हुआ, उसका उद्गम पूर्वी समुद्र है। रात्रि उसके पीछे महिमा नामक रजत पात्र के रूप में प्रकट हुई, उसका उद्गम पश्चिमी समुद्र है। ये दोनों महिमा पात्र अश्व के दोनों ओर स्थित हुए। ‘हय’ बनकर उसने देवताओं को ढोया, ‘वाजी’ बनकर गन्धर्वों को, ‘अर्वा’ बनकर असुरों को और ‘अश्व’ बनकर मनुष्यों को। समुद्र ही उसका बन्धु है और समुद्र ही उसकी योनि।
naiveha kiṃ canāgra āsīt | mṛtyunaivedamāvṛtamāsīdaśanāyayā | aśanāyā hi mṛtyuḥ | tanmano'kurutātmanvī syāmiti | so'rcannacarat | tasyārcata āpo'jāyanta | arcate vai me kamabhūditi | tadevārkyasyārkatvam | kaṃ ha vā asmai bhavati ya evametadarkyasyārkatvaṃ veda
आरम्भ में यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्यु से, भूख से ढका हुआ था, क्योंकि भूख ही मृत्यु है। उसने मन में संकल्प किया, ‘मैं शरीरधारी हो जाऊँ।’ वह अर्चना करता हुआ विचरने लगा। उसके अर्चना करते समय जल उत्पन्न हुआ। उसने कहा, ‘अर्चना करते हुए मुझे ‘क’ अर्थात् सुख मिला।’ यही अग्नि के ‘अर्क’ कहलाने का कारण है। जो अर्क के अर्कत्व का यह रहस्य जानता है, उसे सुख प्राप्त होता है।
जल ही अर्क है। जल पर जो झाग था, वह जमकर ठोस हो गया और वही पृथ्वी बना। उस पर उसने श्रम किया। श्रम और तप से तपे हुए उस प्रजापति से तेज और रस निकलकर अग्नि के रूप में प्रकट हुआ।
स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधाविहितः । तस्य प्राची दिक्शिरोऽसौ चासौ चेर्मौ । अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ । दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः । स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितः । यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान्
sa tredhātmānaṃ vyakurutādityaṃ tṛtīyaṃ vāyuṃ tṛtīyam | sa eṣa prāṇastredhāvihitaḥ | tasya prācī dikśiro'sau cāsau cermau | athāsya pratīcī dikpucchamasau cāsau ca sakthyau | dakṣiṇā codīcī ca pārśve | dyauḥ pṛṣṭhamantarikṣamudaramiyamuraḥ | sa eṣo'psu pratiṣṭhitaḥ | yatra kva caiti tadeva pratitiṣṭhatyevaṃ vidvān
उसने अपने को तीन भागों में बाँटा: एक भाग अग्नि, एक भाग आदित्य और एक भाग वायु। इस प्रकार यह प्राण तीन रूपों में स्थित है। पूर्व दिशा उसका सिर है और ईशान तथा आग्नेय कोण उसकी भुजाएँ। पश्चिम दिशा उसकी पूँछ है और वायव्य तथा नैर्ऋत्य कोण उसकी जंघाएँ। दक्षिण और उत्तर उसकी बगलें हैं, द्युलोक पीठ, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथ्वी वक्ष। वह जल में प्रतिष्ठित है। जो यह जानता है, वह जहाँ भी जाता है वहीं प्रतिष्ठा पाता है।
सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति । स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनाया मृत्युः । तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस । तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान्त्संवत्सरः । तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात् । स भाणकरोत् । सैव वागभवत्
so'kāmayata dvitīyo ma ātmā jāyeteti | sa manasā vācaṃ mithunaṃ samabhavadaśanāyā mṛtyuḥ | tadyadreta āsītsa saṃvatsaro'bhavat | na ha purā tataḥ saṃvatsara āsa | tametāvantaṃ kālamabibharyāvāntsaṃvatsaraḥ | tametāvataḥ kālasya parastādasṛjata | taṃ jātamabhivyādadāt | sa bhāṇakarot | saiva vāgabhavat
उसने कामना की, ‘मेरा दूसरा स्वरूप उत्पन्न हो।’ तब भूख रूपी मृत्यु ने मन के द्वारा वाणी से मिथुन किया। जो बीज था, वह संवत्सर बना; उससे पहले संवत्सर नहीं था। उसने उसे एक संवत्सर जितने समय तक भीतर धारण किया और उस काल के बाद उसे उत्पन्न किया। जन्म लेते ही उसने उसे खाने के लिए मुँह खोला। तब बालक ने ‘भाण्’ शब्द किया, वही वाणी बन गई।
स ऐक्षत यदि वा इममभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति । स तया वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि यज्ञान् प्रजां पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् । सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद
sa aikṣata yadi vā imamabhimaṃsye kanīyo'nnaṃ kariṣya iti | sa tayā vācā tenātmanedaṃ sarvamasṛjata yadidaṃ kiñca ṛco yajūṃṣi sāmāni chandāṃsi yajñān prajāṃ paśūn | sa yadyadevāsṛjata tattadattumadhriyata | sarvaṃ vā attīti tadaditeradititvam | sarvasyāttā bhavati sarvamasyānnaṃ bhavati ya evametadaditeradititvaṃ veda
उसने सोचा, ‘यदि मैं इसे मार डालूँ तो मेरे लिए अन्न कम हो जाएगा।’ तब उसने उसी वाणी और उसी आत्मा से यह सब रचा जो कुछ भी है: ऋचाएँ, यजुष्, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु। जो-जो उसने रचा, उसे वह खाने लगा। वह सब कुछ खाता है, इसीलिए उसका नाम अदिति है। जो अदिति के अदितित्व को जानता है, वह सबका भोक्ता होता है और सब उसका अन्न बन जाता है।
so'kāmayata bhūyasā yajñena bhūyo yajeyeti | so'śrāmyat | sa tapo'tapyata | tasya śrāntasya taptasya yaśo vīryamudakrāmat | prāṇā vai yaśo vīryam | tatprāṇeṣūtkrānteṣu śarīraṃ śvayitumadhriyata | tasya śarīra eva mana āsīt
उसने कामना की, ‘मैं और बड़े यज्ञ से फिर यजन करूँ।’ उसने श्रम किया और तप किया। श्रम और तप से तपे उस प्रजापति से यश और वीर्य निकल गए। प्राण ही यश और वीर्य हैं। प्राणों के निकल जाने पर उसका शरीर फूलने लगा, फिर भी उसका मन उसी शरीर में बना रहा।
so'kāmayata medhyaṃ ma idaṃ syādātmanvyanena syāmiti | tato'śvaḥ samabhavat | yadaśvattanmedhyamabhūditi tadevāśvamedhasyāśvamedhatvam | eṣa ha vā aśvamedhaṃ veda ya enamevaṃ veda | tamanavarudhyaivāmanyata | taṃ saṃvatsarasya parastādātmana ālabhata | paśūn devatābhyaḥ pratyauhat | tasmātsarvadevatyaṃ prokṣitaṃ prājāpatyamālabhante | eṣa vā aśvamedho ya eṣa tapati | tasya saṃvatsara ātmā | ayamagnirarkaḥ | tasyeme lokā ātmānaḥ | tāvetāvarkāśvamedhau | so punarekaiva devatā bhavati mṛtyureva | apa punarmṛtyuṃ jayati | nainaṃ mṛtyurāpnoti | mṛtyurasyātmā bhavati | sarvamāyureti | etāsāṃ devatānāmeko bhavati
उसने कामना की, ‘मेरा यह शरीर यज्ञ के योग्य हो, इसके द्वारा मैं आत्मवान् बनूँ।’ वह फूल गया था, इसलिए अश्व बना और यज्ञ योग्य अर्थात् मेध्य हुआ। यही अश्वमेध का अश्वमेधत्व है। जो इसे ऐसा जानता है, वही अश्वमेध को जानता है। उसने अश्व को बिना रोके छोड़ दिया और एक वर्ष बाद उसे अपने लिए अर्पित किया, अन्य पशु देवताओं को सौंप दिए। इसीलिए जल से प्रोक्षित, सब देवताओं के निमित्त अश्व को प्रजापति का मानकर अर्पित करते हैं। जो तपता है, वह सूर्य ही अश्वमेध है, संवत्सर उसका शरीर है। यह अग्नि अर्क है, ये लोक उसका शरीर हैं। अर्क और अश्वमेध फिर एक ही देवता हैं, मृत्यु। जो यह जानता है, वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है, मृत्यु उसे पकड़ नहीं पाती, मृत्यु उसकी आत्मा बन जाती है, वह पूर्ण आयु पाता है और इन देवताओं में एक हो जाता है।
(उद्गीथब्राह्मणम् । वैराजब्राह्मणं वा ।) द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ततः कानीयसा एव देवा ज्यायसा असुराः । त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त । ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति
(udgīthabrāhmaṇam | vairājabrāhmaṇaṃ vā |) dvayā ha prājāpatyā devāścāsurāśca tataḥ kānīyasā eva devā jyāyasā asurāḥ | ta eṣu lokeṣvaspardhanta | te ha devā ūcurhantāsurān yajña udgīthenātyayāmeti
प्रजापति की सन्तान दो प्रकार की थी, देवता और असुर। देवता छोटे और संख्या में कम थे, असुर बड़े और अधिक। वे इन लोकों के लिए आपस में होड़ करने लगे। देवताओं ने कहा, ‘आओ, यज्ञ में उद्गीथ के द्वारा असुरों को पराजित करें।’
ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं वदति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति । स एव स पाप्मा
te ha vācamūcustvaṃ na udgāyeti | tatheti tebhyo vāgudagāyat | yo vāci bhogastaṃ devebhya āgāyat | yatkalyāṇaṃ vadati tadātmane | te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti | tamabhidrutya pāpmanāvidhyan | sa yaḥ sa pāpmā yadevedamapratirūpaṃ vadati | sa eva sa pāpmā
उन्होंने वाणी से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ वाणी ने ‘ठीक है’ कहकर उनके लिए उद्गान किया। वाणी में जो भोग है, उसे उसने देवताओं के लिए गाया और जो कल्याणमय बोलना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता के द्वारा देवता हमें पराजित कर देंगे। उन्होंने उस पर टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित बोला जाता है, वही वह पाप है।
अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यः प्राण उदगायत् । यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति । स एव स पाप्मा
atha ha prāṇamūcustvaṃ na udgāyeti | tatheti tebhyaḥ prāṇa udagāyat | yaḥ prāṇe bhogastaṃ devebhya āgāyat | yatkalyāṇaṃ jighrati tadātmane | te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti | tamabhidrutya pāpmanāvidhyan | sa yaḥ sa pāpmā yadevedamapratirūpaṃ jighrati | sa eva sa pāpmā
फिर उन्होंने घ्राण रूपी प्राण से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। घ्राण में जो भोग है, उसे उसने देवताओं के लिए गाया और जो शुभ सूँघना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित सूँघा जाता है, वही वह पाप है।
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति । स एव स पाप्मा
atha ha cakṣurūcustvaṃ na udgāyeti | tatheti tebhyaścakṣurudagāyat | yaścakṣuṣi bhogastaṃ devebhya āgāyat | yatkalyāṇaṃ paśyati tadātmane | te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti | tamabhidrutya pāpmanāvidhyan | sa yaḥ sa pāpmā yadevedamapratirūpaṃ paśyati | sa eva sa pāpmā
फिर उन्होंने नेत्र से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। नेत्र में जो भोग है, उसे देवताओं के लिए गाया और जो शुभ देखना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित देखा जाता है, वही वह पाप है।
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुदगायत् । यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा । यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति । स एव स पाप्मा
atha ha śrotramūcustvaṃ na udgāyeti | tatheti tebhyaḥ śrotramudagāyat | yaḥ śrotre bhogastaṃ devebhya āgāyat | yatkalyāṇaṃ śṛṇoti tadātmane | te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti | tamabhidrutya pāpmanāvidhyan | sa yaḥ sa pāpmā | yadevedamapratirūpaṃ śṛṇoti | sa eva sa pāpmā
फिर उन्होंने श्रोत्र से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। श्रोत्र में जो भोग है, उसे देवताओं के लिए गाया और जो शुभ सुनना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित सुना जाता है, वही वह पाप है।
अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो मन उदगायत् । यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं संकल्पयति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा । यदेवेदमप्रतिरूपं संकल्पयति । स एव स पाप्मा । एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन् । एवमेनाः पाप्मनाविध्यन्
atha ha mana ūcustvaṃ na udgāyeti | tatheti tebhyo mana udagāyat | yo manasi bhogastaṃ devebhya āgāyat | yatkalyāṇaṃ saṃkalpayati tadātmane | te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti | tamabhidrutya pāpmanāvidhyan | sa yaḥ sa pāpmā | yadevedamapratirūpaṃ saṃkalpayati | sa eva sa pāpmā | evamu khalvetā devatāḥ pāpmabhirupāsṛjan | evamenāḥ pāpmanāvidhyan
फिर उन्होंने मन से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। मन में जो भोग है, उसे देवताओं के लिए गाया और जो शुभ संकल्प है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित संकल्प किया जाता है, वही वह पाप है। इस प्रकार असुरों ने इन देवताओं को पापों से छुआ और पाप से बींध दिया।
अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविव्यत्सन् । स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विष्वञ्चो विनेशुः । ततो देवा अभवन्, परासुरा । भवत्यात्मना, परास्य द्विषन् भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद
atha hemamāsanyaṃ prāṇamūcustvaṃ na udgāyeti | tatheti tebhya eṣa prāṇa udagāyat | te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti | tamabhidrutya pāpmanāvivyatsan | sa yathāśmānamṛtvā loṣṭo vidhvaṃsetaivaṃ haiva vidhvaṃsamānā viṣvañco vineśuḥ | tato devā abhavan, parāsurā | bhavatyātmanā, parāsya dviṣan bhrātṛvyo bhavati ya evaṃ veda
फिर उन्होंने मुख में स्थित इस प्राण से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उनके लिए उद्गान किया। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे। वे उसे पाप से बींधने के लिए टूट पड़े, पर जैसे ढेला पत्थर से टकराकर बिखर जाता है, वैसे ही वे बिखरकर चारों ओर नष्ट हो गए। तब देवता विजयी हुए और असुर हार गए। जो यह जानता है, वह स्वयं उन्नत होता है और उससे द्वेष करने वाला शत्रु पराजित होता है।
ते होचुः क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेति । अयमास्येऽन्तरिति । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः
te hocuḥ kva nu so'bhūdyo na itthamasakteti | ayamāsye'ntariti | so'yāsya āṅgiraso'ṅgānāṃ hi rasaḥ
देवताओं ने कहा, ‘वह कहाँ था जिसने हमारा ऐसा साथ दिया?’ फिर उन्होंने जाना, ‘यह मुख के भीतर है।’ इसलिए वह अयास्य आङ्गिरस कहलाता है, क्योंकि वह अंगों का रस है।
इस देवता ने उन देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को हटाकर वहाँ पहुँचा दिया जहाँ दिशाओं का अन्त होता है, और वहीं उनके पापों को रख दिया। इसलिए मनुष्य उस सीमा के लोगों के पास न जाए और न उस अन्त तक जाए, कहीं उस पाप रूपी मृत्यु से उसका सामना न हो जाए।
अथ मनोऽत्यवहत् । तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत् । सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति । एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद
atha mano'tyavahat | tadyadā mṛtyumatyamucyata sa candramā abhavat | so'sau candraḥ pareṇa mṛtyumatikrānto bhāti | evaṃ ha vā enameṣā devatā mṛtyumativahati ya evaṃ veda
फिर उसने मन को पार पहुँचाया। जब मन मृत्यु से छूट गया, तब वह चन्द्रमा बन गया। वही चन्द्रमा मृत्यु के पार जाकर प्रकाशित होता है। जो यह जानता है, उसे भी यह देवता इसी प्रकार मृत्यु के पार ले जाता है।
ते देवा अब्रुवन् । एतावद्वा इदं सर्वं यदन्नम् । तदात्मन आगासीः । अनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति । ते वै माभिसंविशतेति । तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति । एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुरएता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद । य उ हैवंविदं स्वेषु प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवति । अथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति
te devā abruvan | etāvadvā idaṃ sarvaṃ yadannam | tadātmana āgāsīḥ | anu no'sminnanna ābhajasveti | te vai mābhisaṃviśateti | tatheti taṃ samantaṃ pariṇyaviśanta | tasmādyadanenānnamatti tenaitāstṛpyanti | evaṃ ha vā enaṃ svā abhisaṃviśanti bhartā svānāṃ śreṣṭhaḥ puraetā bhavatyannādo'dhipatirya evaṃ veda | ya u haivaṃvidaṃ sveṣu pratirbubhūṣati na haivālaṃ bhāryebhyo bhavati | atha ya evaitamanubhavati yo vaitamanu bhāryān bubhūrṣati sa haivālaṃ bhāryebhyo bhavati
देवताओं ने कहा, ‘जितना यह सब है, वह अन्न ही है, और उसे तुमने अपने लिए गा लिया। इस अन्न में हमें भी भागी बनाओ।’ उसने कहा, ‘तो तुम सब चारों ओर से मुझमें प्रवेश करो।’ वे ‘ठीक है’ कहकर चारों ओर से उसमें प्रविष्ट हो गए। इसलिए प्राण के द्वारा जो अन्न खाया जाता है, उससे ये इन्द्रियाँ भी तृप्त होती हैं। इसी प्रकार जो यह जानता है, उसके स्वजन उसके चारों ओर आ बसते हैं; वह उनका भरण करने वाला, श्रेष्ठ, अगुआ, अन्न का भोक्ता और स्वामी होता है। स्वजनों में जो ऐसे ज्ञानी का विरोध करता है, वह अपने आश्रितों का भरण करने में समर्थ नहीं होता। पर जो उसका अनुसरण करता है, वह अपने आश्रितों का भरण करने में समर्थ होता है।
सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः । प्राणो वा अङ्गानां रसः । प्राणो हि वा अङ्गानां रसः । तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यति । एष हि वा अङ्गानां रसः
so'yāsya āṅgiraso'ṅgānāṃ hi rasaḥ | prāṇo vā aṅgānāṃ rasaḥ | prāṇo hi vā aṅgānāṃ rasaḥ | tasmādyasmātkasmāccāṅgātprāṇa utkrāmati tadeva tacchuṣyati | eṣa hi vā aṅgānāṃ rasaḥ
यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अंगों का रस है। प्राण ही अंगों का रस है। इसीलिए जिस किसी अंग से प्राण निकल जाता है, वही अंग सूख जाता है। निश्चय ही यह अंगों का रस है।
eṣa u eva sāma | vāgvai sāmaiṣa sā cāmaśceti tatsāmnaḥ sāmatvam | yadveva samaḥ pluṣiṇā samo maśakena samo nāgena sama ebhistribhirlokaiḥ samo'nena sarveṇa tasmādveva sāma | aśnute sāmnaḥ sāyujyaṃ salokatām | ya evametatsāma veda
यही साम भी है। वाणी ‘सा’ है और यह प्राण ‘अम’, दोनों मिलकर साम हैं, यही साम का सामत्व है। अथवा यह सम है, इसलिए साम है: यह मच्छर के समान है, मशक के समान है, हाथी के समान है, इन तीनों लोकों के समान है और इस सम्पूर्ण जगत् के समान है। जो साम को ऐसा जानता है, वह साम का सायुज्य और सालोक्य पाता है।
तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाच । अयं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति । वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति
taddhāpi brahmadattaścaikitāneyo rājānaṃ bhakṣayannuvāca | ayaṃ tyasya rājā mūrdhānaṃ vipātayatādyadito'yāsya āṅgiraso'nyenodagāyaditi | vācā ca hyeva sa prāṇena codagāyaditi
इसी विषय में ब्रह्मदत्त चैकितानेय ने सोमपान करते हुए कहा था, ‘यदि अयास्य आङ्गिरस ने इसके अतिरिक्त किसी और से उद्गान किया हो, तो यह राजा सोम मेरा सिर गिरा दे।’ क्योंकि उन्होंने वाणी और प्राण से ही उद्गान किया था।
tasya haitasya sāmno yaḥ svaṃ veda bhavati hāsya svam | tasya vai svara eva svam | tasmādārtvijyaṃ kariṣyan vāci svaramiccheta | tayā vācā svarasampannayārtvijyaṃ kuryāt | tasmādyajñe svaravantaṃ didṛkṣanta eva | atho yasya svaṃ bhavati | bhavati hāsya svaṃ ya evametatsāmnaḥ svaṃ veda
जो इस साम के ‘स्व’ अर्थात् धन को जानता है, उसे धन प्राप्त होता है। स्वर ही उसका धन है। इसलिए जो ऋत्विज् का कर्म करने वाला हो, वह अपनी वाणी में स्वर की कामना करे और स्वर से सम्पन्न वाणी से ऋत्विज् कर्म करे। इसीलिए यज्ञ में लोग स्वरवान् ऋत्विज् को ही देखना चाहते हैं, जैसे धनवान् को। जो साम के इस धन को ऐसा जानता है, उसे धन प्राप्त होता है।
तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति । तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा । वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयते । अन्न इत्यु हैक आहुः
tasya haitasya sāmno yaḥ pratiṣṭhāṃ veda prati ha tiṣṭhati | tasya vai vāgeva pratiṣṭhā | vāci hi khalveṣa etatprāṇaḥ pratiṣṭhito gīyate | anna ityu haika āhuḥ
जो इस साम की प्रतिष्ठा को जानता है, वह प्रतिष्ठित होता है। वाणी ही उसकी प्रतिष्ठा है, क्योंकि वाणी में प्रतिष्ठित होकर ही यह प्राण गाया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि अन्न ही इसकी प्रतिष्ठा है।
अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः । स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति । स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेत् । असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमयेति । स यदाहासतो मा सद्गमयेति । मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह । तमसो मा ज्योतिर्गमयेति । मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह । मृत्योर्मामृतं गमयेति । नात्र तिरोहितमिवास्ति । अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् । तस्मादु तेषु वरं वृणीत । यं कामं कामयेत्तम् । स एष एवंविदुद्गातात्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति । तद्धैतल्लोकजिदेव । न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद
athātaḥ pavamānānāmevābhyārohaḥ | sa vai khalu prastotā sāma prastauti | sa yatra prastuyāttadetāni japet | asato mā sadgamaya, tamaso mā jyotirgamaya, mṛtyormāmṛtaṃ gamayeti | sa yadāhāsato mā sadgamayeti | mṛtyurvā asatsadamṛtaṃ mṛtyormāmṛtaṃ gamayāmṛtaṃ mā kurvityevaitadāha | tamaso mā jyotirgamayeti | mṛtyurvai tamo jyotiramṛtaṃ mṛtyormāmṛtaṃ gamayāmṛtaṃ mā kurvityevaitadāha | mṛtyormāmṛtaṃ gamayeti | nātra tirohitamivāsti | atha yānītarāṇi stotrāṇi teṣvātmane'nnādyamāgāyet | tasmādu teṣu varaṃ vṛṇīta | yaṃ kāmaṃ kāmayettam | sa eṣa evaṃvidudgātātmane vā yajamānāya vā yaṃ kāmaṃ kāmayate tamāgāyati | taddhaitallokajideva | na haivālokyatāyā āśāsti ya evametatsāma veda
अब पवमान स्तोत्रों का अभ्यारोह कहा जाता है। प्रस्तोता साम का आरम्भ करता है, तब यजमान यह जप करे: ‘असत्य से मुझे सत्य की ओर ले चलो, अन्धकार से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो।’ ‘असतो मा सद्गमय’ में असत् मृत्यु है और सत् अमृत; अर्थ है, मुझे अमर करो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ में तम मृत्यु है और ज्योति अमृत; अर्थ फिर वही है। ‘मृत्योर्मामृतं गमय’ में कुछ छिपा नहीं है। शेष स्तोत्रों में उद्गाता अपने लिए अन्न गाए और जो चाहे वह वर माँगे। ऐसा ज्ञानी उद्गाता अपने लिए या यजमान के लिए जो कामना करे, उसे गाकर पा लेता है। यह ज्ञान लोकों को जीतने वाला है; जो साम को ऐसा जानता है, उसे लोक न मिलने की आशंका नहीं रहती।
(puruṣavidhabrāhmaṇam /ātmabrāhmaṇam /sṛṣṭibrāhmaṇam ) ātmaivedamagra āsītpuruṣavidhaḥ | so'nuvīkṣya nānyadātmano'paśyat | so'hamasmītyagre vyāharat | tato'haṃnāmābhavat | tasmādapyetarhyāmantrito'hamayamityevāgra uktvāthānyannāma prabrūte yadasya bhavati | sa yatpūrvo'smātsarvasmātsarvān pāpmana auṣattasmātpuruṣaḥ | oṣati ha vai sa taṃ yo'smātpūrvo bubhūṣati ya evaṃ veda
आरम्भ में यह जगत् पुरुष के आकार वाला आत्मा ही था। उसने चारों ओर देखा तो अपने सिवा कुछ नहीं देखा। उसने सबसे पहले कहा, ‘मैं हूँ’, इसी से उसका नाम ‘अहम्’ हुआ। इसीलिए आज भी पुकारे जाने पर मनुष्य पहले ‘यह मैं हूँ’ कहता है और फिर अपना दूसरा नाम बताता है। इस सबसे पहले उसने सब पापों को जला डाला, इसलिए वह पुरुष कहलाया। जो यह जानता है, वह उसे जला डालता है जो उससे आगे होना चाहता है।
वह डर गया, इसीलिए अकेला व्यक्ति डरता है। फिर उसने विचार किया, ‘जब मेरे सिवा कुछ है ही नहीं, तो मैं किससे डरूँ?’ तभी उसका भय चला गया। वह किससे डरता? भय तो दूसरे से ही होता है।
स वै नैव रेमे । तस्मादेकाकी न रमते । स द्वितीयमैच्छत् । स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ । स इममेवात्मानं द्वेधापातयत् । ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम् । तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यः । तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव । तां समभवत् । ततो मनुष्या अजायन्त
sa vai naiva reme | tasmādekākī na ramate | sa dvitīyamaicchat | sa haitāvānāsa yathā strīpumāṃsau sampariṣvaktau | sa imamevātmānaṃ dvedhāpātayat | tataḥ patiśca patnī cābhavatām | tasmādidamardhabṛgalamiva sva iti ha smāha yājñavalkyaḥ | tasmādayamākāśaḥ striyā pūryata eva | tāṃ samabhavat | tato manuṣyā ajāyanta
उसे आनन्द नहीं मिला, इसीलिए अकेला व्यक्ति प्रसन्न नहीं रहता। उसने दूसरे की इच्छा की। वह उतना बड़ा था जितने आलिंगन में बँधे स्त्री और पुरुष होते हैं। उसने अपने इसी स्वरूप को दो भागों में बाँट दिया, उससे पति और पत्नी हुए। इसीलिए याज्ञवल्क्य कहा करते थे कि अकेला व्यक्ति दाल के आधे दाने के समान है। इसी से यह रिक्त स्थान पत्नी से भरता है। वह उससे संयुक्त हुआ और उससे मनुष्य उत्पन्न हुए।
उसने विचार किया, ‘मुझे अपने से ही उत्पन्न करके यह मुझसे कैसे संयुक्त होता है? मैं छिप जाऊँ।’ वह गाय बनी तो वह बैल बना; वह उससे संयुक्त हुआ और गौएँ उत्पन्न हुईं। वह घोड़ी बनी तो वह घोड़ा, वह गधी बनी तो वह गधा; वह उससे संयुक्त हुआ और एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। वह बकरी बनी तो वह बकरा, वह भेड़ बनी तो वह मेढ़ा; वह उससे संयुक्त हुआ और बकरियाँ तथा भेड़ें उत्पन्न हुईं। इसी प्रकार चींटियों तक जो भी जोड़े हैं, उन सबको उसने रचा।
फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया और मुख रूपी योनि से तथा हाथों से अग्नि को उत्पन्न किया। इसीलिए ये दोनों भीतर से रोमरहित हैं। लोग जो कहते हैं, ‘इस देवता का यजन करो, उस देवता का यजन करो’, वह सब उसी की रचना है, क्योंकि वही सब देवता है। फिर जो कुछ गीला है, उसे उसने वीर्य से रचा, वही सोम है। यह सब इतना ही है, अन्न और अन्न का भोक्ता। सोम अन्न है और अग्नि भोक्ता। यह ब्रह्मा की अतिसृष्टि है, क्योंकि उसने अपने से श्रेष्ठ देवताओं को रचा और मर्त्य होकर भी अमर देवताओं को रचा। जो यह जानता है, वह इस अतिसृष्टि में स्थान पाता है।
तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् । तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामायमिदंरूप इति । तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियत असौ नामायमिदंरूप इति । स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये । तं न पश्यन्ति । अकृत्स्नो हि सः प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः । तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव । स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद । अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति । आत्मेत्येवोपासीत । अत्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति । तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद
taddhedaṃ tarhyavyākṛtamāsīt | tannāmarūpābhyāmeva vyākriyatāsau nāmāyamidaṃrūpa iti | tadidamapyetarhi nāmarūpābhyāmeva vyākriyata asau nāmāyamidaṃrūpa iti | sa eṣa iha praviṣṭa ā nakhāgrebhyo yathā kṣuraḥ kṣuradhāne'vahitaḥ syādviśvambharo vā viśvambharakulāye | taṃ na paśyanti | akṛtsno hi saḥ prāṇanneva prāṇo nāma bhavati | vadan vākpaśyaṃścakṣuḥ śṛṇvañchrotraṃ manvāno manaḥ | tānyasyaitāni karmanāmānyeva | sa yo'ta ekaikamupāste na sa veda | akṛtsno hyeṣo'ta ekaikena bhavati | ātmetyevopāsīta | atra hyete sarva ekaṃ bhavanti | tadetatpadanīyamasya sarvasya yadayamātmā | anena hyetatsarvaṃ veda | yathā ha vai padenānuvindedevaṃ kīrtiṃ ślokaṃ vindate ya evaṃ veda
उस समय यह जगत् अव्यक्त था। वह नाम और रूप से ही व्यक्त हुआ, कि इसका यह नाम है, यह रूप है। आज भी यह नाम और रूप से ही व्यक्त होता है। वह आत्मा यहाँ नखों के अग्रभाग तक इस प्रकार प्रविष्ट है, जैसे उस्तरा अपनी म्यान में या अग्नि अपने आधार में रखी हो। लोग उसे नहीं देखते, क्योंकि अलग-अलग रूपों में वह अपूर्ण है। साँस लेते हुए वह प्राण कहलाता है, बोलते हुए वाणी, देखते हुए नेत्र, सुनते हुए श्रोत्र, मनन करते हुए मन। ये सब उसके कर्मों के नाम मात्र हैं। जो इनमें से एक-एक की उपासना करता है, वह नहीं जानता, क्योंकि एक-एक में वह अपूर्ण है। आत्मा रूप से ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इसमें ये सब एक हो जाते हैं। यह आत्मा ही इस सबका पदचिह्न है, क्योंकि इसी से यह सब जाना जाता है, जैसे खोए पशु को पदचिह्नों से खोज लेते हैं। जो यह जानता है, वह कीर्ति और यश पाता है।
तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा । स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात्प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यात् । आत्मानमेव प्रियमुपासीत । स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति
tadetatpreyaḥ putrātpreyo vittātpreyo'nyasmātsarvasmādantarataraṃ yadayamātmā | sa yo'nyamātmanaḥ priyaṃ bruvāṇaṃ brūyātpriyaṃ rotsyatītīśvaro ha tathaiva syāt | ātmānameva priyamupāsīta | sa ya ātmānameva priyamupāste na hāsya priyaṃ pramāyukaṃ bhavati
यह आत्मा पुत्र से अधिक प्रिय है, धन से अधिक प्रिय है, अन्य सब कुछ से अधिक प्रिय है, क्योंकि यह सबसे भीतर है। यदि कोई आत्मा के अतिरिक्त किसी और को प्रिय कहे और दूसरा उससे कहे कि तेरा प्रिय नष्ट हो जाएगा, तो ऐसा हो भी सकता है। इसलिए आत्मा की ही प्रिय रूप में उपासना करे। जो आत्मा की ही प्रिय रूप में उपासना करता है, उसका प्रिय नष्ट नहीं होता।
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् । तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत् । तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् । तथर्षीनाम् । तथा मनुष्याणाम् । तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति । तस्य ह न देवाश्चनाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति । अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद । यथा पशुरेवं स देवानाम् । यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्ज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्ति । एकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु । तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः
brahma vā idamagra āsīt | tadātmānamevāvet | ahaṃ brahmāsmīti | tasmāttatsarvamabhavat | tadyo yo devānāṃ pratyabudhyata sa eva tadabhavat | tatharṣīnām | tathā manuṣyāṇām | taddhaitatpaśyannṛṣirvāmadevaḥ pratipede'haṃ manurabhavaṃ sūryaśceti | tadidamapyetarhi ya evaṃ vedāhaṃ brahmāsmīti sa idaṃ sarvaṃ bhavati | tasya ha na devāścanābhūtyā īśate | ātmā hyeṣāṃ sa bhavati | atha yo'nyāṃ devatāmupāste'nyo'sāvanyo'hamasmīti na sa veda | yathā paśurevaṃ sa devānām | yathā ha vai bahavaḥ paśavo manuṣyaṃ bhuñjyurevamekaikaḥ puruṣo devān bhunakti | ekasminneva paśāvādīyamāne'priyaṃ bhavati kimu bahuṣu | tasmādeṣāṃ tanna priyaṃ yadetanmanuṣyā vidyuḥ
आरम्भ में यह ब्रह्म ही था। उसने अपने को ही जाना, ‘मैं ब्रह्म हूँ’। इसी से वह सर्व हो गया। देवताओं में जिसने भी यह जाना, वह वही हो गया; ऋषियों और मनुष्यों में भी ऐसा ही हुआ। इसे देखते हुए ऋषि वामदेव ने अनुभव किया, ‘मैं मनु हुआ और मैं ही सूर्य हुआ।’ आज भी जो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ जानता है, वह यह सब हो जाता है; देवता भी उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि वह उनकी आत्मा बन जाता है। पर जो किसी अन्य देवता की उपासना यह सोचकर करता है कि वह अलग है और मैं अलग हूँ, वह नहीं जानता। वह देवताओं के लिए पशु के समान है। जैसे बहुत से पशु मनुष्य का पालन करते हैं, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य देवताओं का पालन करता है। एक पशु के छिन जाने पर भी अप्रिय लगता है, बहुतों के छिनने पर तो कहना ही क्या। इसलिए देवताओं को यह प्रिय नहीं कि मनुष्य इसे जानें।
आरम्भ में यह एक ब्रह्म ही था। एक होने से वह विकसित नहीं हुआ। उसने श्रेष्ठ रूप क्षत्र को उत्पन्न किया, अर्थात् देवताओं में जो शासक हैं: इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु और ईशान। इसलिए क्षत्र से बढ़कर कुछ नहीं, और राजसूय में ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रिय का सम्मान करता है, क्षत्र में ही वह यश स्थापित करता है। फिर भी ब्रह्म ही क्षत्र की योनि है। इसलिए राजा चाहे परम पद पा ले, अन्त में अपनी योनि ब्रह्म का ही आश्रय लेता है। जो उसकी हिंसा करता है, वह अपनी ही योनि पर प्रहार करता है और श्रेष्ठ की हिंसा करने वाले के समान अधिक पापी होता है।
sa naiva vyabhavat | tacchreyo rūpamatyasṛjata dharmam | tadetatkṣatrasya kṣatraṃ yaddharmaḥ | tasmāddharmātparaṃ nāsti | atho abalīyān balīyāṃsamāśaṃsate dharmeṇa | yathā rājñaivam | yo vai sa dharmaḥ satyaṃ vai tat | tasmātsatyaṃ vadantamāhurdharmaṃ vadatīti | dharmaṃ vā vadantaṃ satyaṃ vadatīti | etaddhyevaitadubhayaṃ bhavati
फिर भी वह विकसित नहीं हुआ। उसने और भी श्रेष्ठ रूप धर्म को उत्पन्न किया। धर्म क्षत्र का भी क्षत्र है, इसलिए धर्म से बढ़कर कुछ नहीं। धर्म के बल से दुर्बल भी बलवान् को जीतने की आशा रखता है, जैसे राजा के सहारे। जो धर्म है, वही सत्य है। इसलिए सत्य बोलने वाले के विषय में कहते हैं कि यह धर्म बोलता है, और धर्म बोलने वाले के विषय में कि यह सत्य बोलता है। ये दोनों एक ही हैं।
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्रः । तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु, क्षत्रियेण क्षत्रियः, वैश्येन वैश्यः, शूद्रेण शूद्रः । तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येषु । एताभ्यां हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतम् । यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एव । आत्मानमेव लोकमुपासीत । स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते । अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते
tadetadbrahma kṣatraṃ viṭśūdraḥ | tadagninaiva deveṣu brahmābhavadbrāhmaṇo manuṣyeṣu, kṣatriyeṇa kṣatriyaḥ, vaiśyena vaiśyaḥ, śūdreṇa śūdraḥ | tasmādagnāveva deveṣu lokamicchante brāhmaṇe manuṣyeṣu | etābhyāṃ hi rūpābhyāṃ brahmābhavat | atha yo ha vā asmāllokātsvaṃ lokamadṛṣṭvā praiti sa enamavidito na bhunakti yathā vedo vānanūkto'nyadvā karmākṛtam | yadi ha vā apyanevaṃvinmahatpuṇyaṃ karma karoti taddhāsyāntataḥ kṣīyata eva | ātmānameva lokamupāsīta | sa ya ātmānameva lokamupāste na hāsya karma kṣīyate | asmāddhyevātmano yadyatkāmayate tattatsṛjate
इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। देवताओं में ब्रह्म अग्नि के रूप में ब्राह्मण हुआ और मनुष्यों में ब्राह्मण के रूप में; क्षत्रिय से क्षत्रिय, वैश्य से वैश्य और शूद्र से शूद्र हुआ। इसलिए लोग देवताओं में अग्नि में और मनुष्यों में ब्राह्मण में लोक की कामना करते हैं, क्योंकि इन्हीं दो रूपों में ब्रह्म प्रकट हुआ। पर जो अपने लोक, आत्मा, को देखे बिना इस लोक से चला जाता है, उसे वह अज्ञात रहकर फल नहीं देता, जैसे बिना पढ़ा वेद या बिना किया कर्म। जो यह नहीं जानता, वह चाहे महान् पुण्य कर्म करे, वह अन्त में क्षीण हो ही जाता है। इसलिए आत्मा की ही लोक रूप में उपासना करे। जो ऐसा करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि इसी आत्मा से वह जो चाहता है, रच लेता है।
atho ayaṃ vā ātmā sarveṣāṃ bhūtānāṃ lokaḥ | sa yajjuhoti yadyajate tena devānāṃ lokaḥ | atha yadanubrūte tena ṛṣīṇām | atha yatpitṛbhyo nipṛṇāti yatprajāmicchate tena pitṝṇām | atha yanmanuṣyān vāsayate yadebhyo'śanaṃ dadāti tena manuṣyāṇām | atha yatpaśubhyastṛṇodakaṃ vindati tena paśūnām | yadasya gṛheṣu śvāpadā vayāṃsyā pipīlikābhya upajīvanti tena teṣāṃ lokaḥ | yathā ha vai svāya lokāyāriṣṭimicchet | evaṃ haivaṃvide sarvadā sarvāṇi bhūtānyariṣṭimicchanti | tadvā etadviditaṃ mīmāṃsitam
यह आत्मा सब प्राणियों का लोक है। वह जो हवन और यजन करता है, उससे देवताओं का लोक होता है; जो वेद का पाठ करता है, उससे ऋषियों का; जो पितरों को अर्पण करता है और सन्तान की कामना करता है, उससे पितरों का; जो मनुष्यों को आश्रय और भोजन देता है, उससे मनुष्यों का; जो पशुओं के लिए घास और जल जुटाता है, उससे पशुओं का; और उसके घर में जो वन्य जीव, पक्षी और चींटियों तक के प्राणी जीते हैं, उनका भी वह लोक है। जैसे मनुष्य अपने लोक का कुशल चाहता है, वैसे ही सब प्राणी ऐसा जानने वाले का सदा कुशल चाहते हैं। यह जाना और विचारा हुआ है।
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव । सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेय । अथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति । एतावान् वै कामः । नेच्छंश्चनातो भूयो विन्देत् । तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति । स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते । तस्यो कृत्स्नता । मन एवास्यात्मा । वाग्जाया । प्राणः प्रजा । चक्षुर्मानुषं वित्तम् । चक्षुषा हि तद्विन्दते । श्रोत्रं दैवम् । श्रोत्रेण हि तच्छृणोति । आत्मैवास्य कर्म । आत्मना हि कर्म करोति । स एष पाङ्क्तो यज्ञः । पाङ्क्तः पशुः । पाङ्क्तः पुरुषः । पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च । तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद
ātmaivedamagra āsīdeka eva | so'kāmayata jāyā me syādatha prajāyeya | atha vittaṃ me syādatha karma kurvīyeti | etāvān vai kāmaḥ | necchaṃścanāto bhūyo vindet | tasmādapyetarhyekākī kāmayate jāyā me syādatha prajāyeyātha vittaṃ me syādatha karma kurvīyeti | sa yāvadapyeteṣāmekaikaṃ na prāpnotyakṛtsna eva tāvanmanyate | tasyo kṛtsnatā | mana evāsyātmā | vāgjāyā | prāṇaḥ prajā | cakṣurmānuṣaṃ vittam | cakṣuṣā hi tadvindate | śrotraṃ daivam | śrotreṇa hi tacchṛṇoti | ātmaivāsya karma | ātmanā hi karma karoti | sa eṣa pāṅkto yajñaḥ | pāṅktaḥ paśuḥ | pāṅktaḥ puruṣaḥ | pāṅktamidaṃ sarvaṃ yadidaṃ kiñca | tadidaṃ sarvamāpnoti ya evaṃ veda
आरम्भ में यह एक आत्मा ही था। उसने कामना की, ‘मेरी पत्नी हो, जिससे सन्तान हो; मेरे पास धन हो, जिससे मैं कर्म करूँ।’ कामना इतनी ही है; चाहकर भी इससे अधिक नहीं मिलता। इसीलिए आज भी अकेला व्यक्ति पत्नी, सन्तान, धन और कर्म की कामना करता है, और जब तक इनमें से एक-एक न मिल जाए, अपने को अपूर्ण मानता है। उसकी पूर्णता यह है: मन उसकी आत्मा है, वाणी पत्नी, प्राण सन्तान, नेत्र मानुष धन, क्योंकि नेत्र से ही वह उसे पाता है, श्रोत्र दैव धन, क्योंकि श्रोत्र से ही वह उसे सुनता है, और शरीर ही उसका कर्म, क्योंकि शरीर से ही वह कर्म करता है। इसलिए यज्ञ पाँच भागों वाला है, पशु पाँच भागों वाला है, पुरुष पाँच भागों वाला है, और जो कुछ है, वह सब पाँच भागों वाला है। जो यह जानता है, वह यह सब पा लेता है।
(सप्तान्नब्राह्मणं वा संवर्गविद्याब्राह्मणम्) यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् । तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । कस्मात्तानि न क्षीयन्ते अद्यमानानि सर्वदा । यो वै तामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन । स देवानपिगच्छति स ऊऋजमुपजीवति । इति श्लोकाः
(saptānnabrāhmaṇaṃ vā saṃvargavidyābrāhmaṇam) yatsaptānnāni medhayā tapasājanayatpitā | ekamasya sādhāraṇaṃ dve devānabhājayat | trīṇyātmane'kuruta paśubhya ekaṃ prāyacchat | tasmin sarvaṃ pratiṣṭhitaṃ yacca prāṇiti yacca na | kasmāttāni na kṣīyante adyamānāni sarvadā | yo vai tāmakṣitiṃ veda so'nnamatti pratīkena | sa devānapigacchati sa ūṛjamupajīvati | iti ślokāḥ
ये श्लोक हैं: ‘पिता प्रजापति ने मेधा और तप से जो सात अन्न उत्पन्न किए, उनमें एक सबके लिए साधारण रखा, दो देवताओं को बाँटे, तीन अपने लिए रखे और एक पशुओं को दिया। उसी में सब प्रतिष्ठित है, जो साँस लेता है और जो नहीं लेता। सदा खाए जाने पर भी वे क्षीण क्यों नहीं होते? जो उस अक्षय भाव को जानता है, वह मुख से अन्न खाता है। वह देवताओं को प्राप्त होता है और ऊर्जा पर जीता है।’
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पितेति । मेधया हि तपसाजनयत्पितैकमस्य साधारणमिति । इदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते । स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते । मिश्रं ह्येतत् । द्वे देवानभाजयदिति । हुतं च प्रहुतं च । तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वति । अथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति । तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् । पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति । तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति । तस्मात्कुमारं जातं घृतं वैवाग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वानुधापयन्ति । अथ वत्सं जातमाहुस्तृणादिति । तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति । पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति । न तथा विद्यात् । यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् । सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति । कस्मात्तानि न क्षीयन्ते अद्यमानानि सर्वदेति । पुरुषो वा अक्षितिः । स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते । यो वैतामक्षितिं वेदेति । पुरुषो वा अक्षितिः । स हीदमन्नं धियाधिया जनयते कर्मभिः । यद्धैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह । सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति । मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत् । स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा
yatsaptānnāni medhayā tapasājanayatpiteti | medhayā hi tapasājanayatpitaikamasya sādhāraṇamiti | idamevāsya tatsādhāraṇamannaṃ yadidamadyate | sa ya etadupāste na sa pāpmano vyāvartate | miśraṃ hyetat | dve devānabhājayaditi | hutaṃ ca prahutaṃ ca | tasmāddevebhyo juhvati ca pra ca juhvati | atho āhurdarśapūrṇamāsāviti | tasmānneṣṭiyājukaḥ syāt | paśubhya ekaṃ prāyacchaditi | tatpayaḥ | payo hyevāgre manuṣyāśca paśavaścopajīvanti | tasmātkumāraṃ jātaṃ ghṛtaṃ vaivāgre pratilehayanti stanaṃ vānudhāpayanti | atha vatsaṃ jātamāhustṛṇāditi | tasmin sarvaṃ pratiṣṭhitaṃ yacca prāṇiti yacca neti | payasi hīdaṃ sarvaṃ pratiṣṭhitaṃ yacca prāṇiti yacca na | tadyadidamāhuḥ saṃvatsaraṃ payasā juhvadapa punarmṛtyuṃ jayatīti | na tathā vidyāt | yadahareva juhoti tadahaḥ punarmṛtyumapajayatyevaṃ vidvān | sarvaṃ hi devebhyo'nnādyaṃ prayacchati | kasmāttāni na kṣīyante adyamānāni sarvadeti | puruṣo vā akṣitiḥ | sa hīdamannaṃ punaḥ punarjanayate | yo vaitāmakṣitiṃ vedeti | puruṣo vā akṣitiḥ | sa hīdamannaṃ dhiyādhiyā janayate karmabhiḥ | yaddhaitanna kuryātkṣīyeta ha | so'nnamatti pratīkeneti | mukhaṃ pratīkaṃ mukhenetyetat | sa devānapigacchati sa ūrjamupajīvatīti praśaṃsā
पिता ने मेधा और तप से सात अन्न उत्पन्न किए। ‘एक सबके लिए साधारण रखा’, यह वह अन्न है जो सब खाते हैं। जो केवल इसकी उपासना करता है, वह पाप से नहीं छूटता, क्योंकि यह मिश्रित है। ‘दो देवताओं को बाँटे’, ये हुत और प्रहुत हैं, इसलिए लोग देवताओं के लिए हवन भी करते हैं और भेंट भी; कुछ इन्हें दर्श और पूर्णमास कहते हैं, इसलिए केवल फल के लिए इष्टि न करे। ‘एक पशुओं को दिया’, वह दूध है, क्योंकि मनुष्य और पशु पहले दूध पर ही जीते हैं। इसीलिए नवजात शिशु को पहले घी चटाते या स्तन पिलाते हैं, और नवजात बछड़े को ‘अतृणाद’ कहते हैं। ‘उसी में सब प्रतिष्ठित है’, क्योंकि सब दूध में प्रतिष्ठित है। लोग कहते हैं कि वर्ष भर दूध से हवन करके पुनर्मृत्यु जीती जाती है, पर ऐसा न माने; ज्ञानी जिस दिन हवन करता है, उसी दिन पुनर्मृत्यु को जीत लेता है। ‘वे क्षीण क्यों नहीं होते?’ क्योंकि पुरुष अक्षय है, वह बुद्धि और कर्म से इस अन्न को बार-बार उत्पन्न करता है। ‘वह मुख से अन्न खाता है’ और ‘ऊर्जा पर जीता है’, यह प्रशंसा है।
trīṇyātmane'kuruteti mano vācaṃ prāṇaṃ tānyātmane'kuruta | anyatramanā abhūvaṃ nādarśamanyatramanā abhūvaṃ nāśrauṣamiti manasā hyeva paśyati manasā śṛṇoti | kāmaḥ saṃkalpo vicikitsā śraddhāśraddhā dhṛtiradhṛtirhrīrdhīrbhīrityetatsarvaṃ mana eva | tasmādapi pṛṣṭhata upaspṛṣṭo manasā vijānāti | yaḥ kaśca śabdo vāgeva sā | eṣā hyantaṃ āyattaiṣā hi na | prāṇo'pāno vyāna udānaḥ samāno'na ityetatsarvaṃ prāṇa eva | etanmayo vā ayamātmā | vāṅmayo manomayaḥ prāṇamayaḥ
‘तीन अपने लिए रखे’, ये मन, वाणी और प्राण हैं। लोग कहते हैं, ‘मेरा मन कहीं और था, मैंने नहीं देखा; मेरा मन कहीं और था, मैंने नहीं सुना’, क्योंकि मन से ही देखा और मन से ही सुना जाता है। काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, बुद्धि और भय, यह सब मन ही है। इसीलिए पीछे से छूने पर भी मन से ही जान लेते हैं। जो भी शब्द है, वह वाणी है, क्योंकि वह वस्तु का बोध कराती है पर स्वयं किसी और से प्रकाशित नहीं होती। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन, यह सब प्राण ही है। यह आत्मा इन्हीं से बना है, वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय।
athaitasya manaso dyauḥ śarīram | jyotīrūpamasāvādityaḥ | tadyāvadeva manastāvatī dyaustāvānasāvādityaḥ | tau mithunaṃ samaitām | tataḥ prāṇo'jāyata | sa indraḥ | sa eṣo'sapatnaḥ | dvitīyo vai sapatnaḥ | nāsya sapatno bhavati ya evaṃ veda
द्युलोक इस मन का शरीर है और वह सूर्य उसका ज्योतिर्मय रूप है। जितना मन है, उतना ही द्युलोक है और उतना ही वह सूर्य। ये दोनों संयुक्त हुए, उनसे प्राण उत्पन्न हुआ। वही इन्द्र है, और वह शत्रुरहित है, क्योंकि दूसरा ही शत्रु होता है। जो यह जानता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता।
अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरम् । ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः । तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रः । त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः । स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तं स लोकं जयति । अथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्तं स लोकं जयति
athaitasya prāṇasyāpaḥ śarīram | jyotīrūpamasau candraḥ | tadyāvāneva prāṇastāvatya āpastāvānasau candraḥ | ta ete sarva eva samāḥ sarve'nantāḥ | sa yo haitānantavata upāste'ntavantaṃ sa lokaṃ jayati | atha yo haitānanantānupāste'nantaṃ sa lokaṃ jayati
जल इस प्राण का शरीर है और वह चन्द्रमा उसका ज्योतिर्मय रूप है। जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा। ये सब समान हैं और सब अनन्त हैं। जो इन्हें सीमित मानकर उपासना करता है, वह सीमित लोक जीतता है; जो इन्हें अनन्त मानकर उपासना करता है, वह अनन्त लोक जीतता है।
स एष संवत्सरः प्रजापतिष्षोडशकलः । तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला । ध्रुवैवास्य षोडशी कला । स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते । सोऽमावास्यां रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते । तस्मादेतां रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै
sa eṣa saṃvatsaraḥ prajāpatiṣṣoḍaśakalaḥ | tasya rātraya eva pañcadaśa kalā | dhruvaivāsya ṣoḍaśī kalā | sa rātribhirevā ca pūryate'pa ca kṣīyate | so'māvāsyāṃ rātrimetayā ṣoḍaśyā kalayā sarvamidaṃ prāṇabhṛdanupraviśya tataḥ prātarjāyate | tasmādetāṃ rātriṃ prāṇabhṛtaḥ prāṇaṃ na vicchindyādapi kṛkalāsasyaitasyā eva devatāyā apacityai
यह संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओं वाला है। रात्रियाँ उसकी पन्द्रह कलाएँ हैं और सोलहवीं कला ध्रुव है। रात्रियों से ही वह बढ़ता और घटता है। अमावस्या की रात वह इस सोलहवीं कला से सब प्राणधारियों में प्रवेश करता है और वहाँ से प्रातः फिर जन्म लेता है। इसलिए उस रात इस देवता के सम्मान में किसी प्राणी का, गिरगिट तक का, प्राण न ले।
यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषः । तस्य वित्तमेव पञ्चदश कलाः । आत्मैवास्य षोडशी कला । स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते । तदेतन्नभ्यं यदयमात्मा । प्रधिर्वित्तम् । तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनागादित्येवाहुः
yo vai sa saṃvatsaraḥ prajāpatiḥ ṣoḍaśakalo'yameva sa yo'yamevaṃvitpuruṣaḥ | tasya vittameva pañcadaśa kalāḥ | ātmaivāsya ṣoḍaśī kalā | sa vittenaivā ca pūryate'pa ca kṣīyate | tadetannabhyaṃ yadayamātmā | pradhirvittam | tasmādyadyapi sarvajyāniṃ jīyata ātmanā cejjīvati pradhināgādityevāhuḥ
जो सोलह कलाओं वाला संवत्सर प्रजापति है, वही यह पुरुष है जो ऐसा जानता है। धन उसकी पन्द्रह कलाएँ हैं और आत्मा सोलहवीं कला। वह धन से ही बढ़ता और घटता है। आत्मा पहिए की नाभि है और धन उसकी परिधि। इसलिए यदि किसी का सब कुछ चला जाए पर वह स्वयं जीवित रहे, तो लोग कहते हैं कि इसकी केवल परिधि गई है।
तीन ही लोक हैं: मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक। यह मनुष्यलोक केवल पुत्र से जीता जाता है, किसी अन्य कर्म से नहीं; पितृलोक कर्म से और देवलोक विद्या से। देवलोक सब लोकों में श्रेष्ठ है, इसीलिए विद्या की प्रशंसा की जाती है।
अथातः सम्प्रत्तिः । यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति । स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति । यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता । ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकता । एतावद्वा इदं सर्वम् । एतन्मा सर्वं सन्नयमितो भुनजदिति । तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुः । तस्मादेनमनुशासति । स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति । स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णया कृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम । स पुत्रेणैवास्मिल्लोके प्रतितिष्ठति । अथैनमेते देवाः प्राणा अमृता आविशन्ति
athātaḥ samprattiḥ | yadā praiṣyanmanyate'tha putramāha tvaṃ brahma tvaṃ yajñastvaṃ loka iti | sa putraḥ pratyāhāhaṃ brahmāhaṃ yajño'haṃ loka iti | yadvai kiñcānūktaṃ tasya sarvasya brahmetyekatā | ye vai ke ca yajñāsteṣāṃ sarveṣāṃ yajña ityekatā | ye vai ke ca lokāsteṣāṃ sarveṣāṃ loka ityekatā | etāvadvā idaṃ sarvam | etanmā sarvaṃ sannayamito bhunajaditi | tasmātputramanuśiṣṭaṃ lokyamāhuḥ | tasmādenamanuśāsati | sa yadaivaṃvidasmāllokātpraityathaibhireva prāṇaiḥ saha putramāviśati | sa yadyanena kiñcidakṣṇayā kṛtaṃ bhavati tasmādenaṃ sarvasmātputro muñcati tasmātputro nāma | sa putreṇaivāsmilloke pratitiṣṭhati | athainamete devāḥ prāṇā amṛtā āviśanti
अब सम्प्रत्ति कही जाती है। जब पिता समझता है कि वह जाने वाला है, तब पुत्र से कहता है, ‘तुम ब्रह्म हो, तुम यज्ञ हो, तुम लोक हो।’ पुत्र उत्तर देता है, ‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।’ जो कुछ पढ़ा गया है, वह सब ‘ब्रह्म’ शब्द में एक है; सब यज्ञ ‘यज्ञ’ शब्द में एक हैं; सब लोक ‘लोक’ शब्द में एक हैं। यह सब इतना ही है। पिता सोचता है, ‘यह सब होकर यह मेरा यहाँ से पालन करेगा।’ इसलिए शिक्षित पुत्र को लोक दिलाने वाला कहते हैं, और इसीलिए उसे शिक्षा देते हैं। ऐसा जानने वाला पिता जब इस लोक से जाता है, तो इन्हीं प्राणों के साथ पुत्र में प्रवेश करता है। उससे जो कुछ भूल हुई हो, पुत्र उससे उसे मुक्त करता है, इसीलिए वह पुत्र कहलाता है। पुत्र के द्वारा वह इस लोक में प्रतिष्ठित रहता है, और ये दिव्य अमर प्राण उसमें प्रवेश करते हैं।
अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति । स वै दैवः प्राणो यः संचरंश्चासंचरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति । स एष एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति । यथैषा देवतैवं सः । यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति । यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति । पुण्यमेवामुं गच्छति । न ह वै देवान् पापं गच्छति
adbhyaścainaṃ candramasaśca daivaḥ prāṇa āviśati | sa vai daivaḥ prāṇo yaḥ saṃcaraṃścāsaṃcaraṃśca na vyathate'tho na riṣyati | sa eṣa evaṃvitsarveṣāṃ bhūtānāmātmā bhavati | yathaiṣā devataivaṃ saḥ | yathaitāṃ devatāṃ sarvāṇi bhūtānyavantyevaṃ haivaṃvidaṃ sarvāṇi bhūtānyavanti | yadu kiñcemāḥ prajāḥ śocantyamaivāsāṃ tadbhavati | puṇyamevāmuṃ gacchati | na ha vai devān pāpaṃ gacchati
जल और चन्द्रमा से दिव्य प्राण उसमें प्रवेश करता है। दिव्य प्राण वह है जो चलते हुए या स्थिर रहते हुए न व्यथित होता है, न नष्ट होता है। ऐसा जानने वाला सब प्राणियों का आत्मा हो जाता है। जैसा यह देवता है, वैसा ही वह होता है। जैसे सब प्राणी इस देवता की रक्षा और सम्मान करते हैं, वैसे ही ऐसा जानने वाले का करते हैं। ये प्रजाएँ जो भी शोक करती हैं, वह उन्हीं के साथ रहता है; उसके पास केवल पुण्य जाता है, क्योंकि देवताओं तक पाप नहीं पहुँचता।
athāto vratamīmāṃsā | prajāpatirha karmāṇi sasṛje | tāni sṛṣṭānyanyo'nyenāspardhanta | vadiṣyāmyevāhamiti vāgdadhre | drakṣyāmyahamiti cakṣuḥ | śroṣyāmyahamiti śrotram | evamanyāni karmāṇi yathākarmam | tāni mṛtyuḥ śramo bhūtvopayeme | tānyāpnot | tānyāptvā mṛtyuravārundha | tasmācchrāmyatyeva vāk | śrāmyati cakṣuḥ | śrāmyati śrotram | athemameva nāpnotyo'yaṃ madhyamaḥ prāṇaḥ | tāni jñātuṃ dadhrire | ayaṃ vai naḥ śreṣṭho yaḥ saṃcaraṃścāsaṃcaraṃśca na vyathate'tho na riṣyati | hantāsyaiva sarve rūpaṃ bhavāmeti | ta etasyaiva sarve rūpamabhavan | tasmādeta etenākhyāyante prāṇā iti | tena ha vāva tatkulamācakṣate yasmin kule bhavati ya evaṃ veda | ya u haivaṃvidā spardhate'nuśuṣyati | anuśuṣya haivāntato mriyata ityadhyātmam
अब व्रतों का विचार। प्रजापति ने इन्द्रियों के कर्मों को रचा। रचे जाने पर वे आपस में होड़ करने लगे। वाणी ने व्रत लिया, ‘मैं बोलूँगी’; नेत्र ने, ‘मैं देखूँगा’; श्रोत्र ने, ‘मैं सुनूँगा’; इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों ने अपने-अपने कर्म के अनुसार। मृत्यु ने थकान बनकर उन्हें पकड़ लिया, उन्हें व्याप लिया और रोक दिया। इसीलिए वाणी थकती है, नेत्र थकता है, श्रोत्र थकता है। पर इस मध्यम प्राण को मृत्यु नहीं पकड़ पाई। उन्होंने इसे जानने का निश्चय किया और कहा, ‘यही हममें श्रेष्ठ है, जो चलते हुए या स्थिर रहते हुए न व्यथित होता है, न नष्ट होता है। आओ, हम सब इसी का रूप बन जाएँ।’ वे सब इसी का रूप बन गए, इसीलिए वे इसी नाम से प्राण कहलाते हैं। जो यह जानता है, जिस कुल में वह होता है, वह कुल उसी के नाम से जाना जाता है। जो ऐसे ज्ञानी से होड़ करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्त में मर जाता है। यह अध्यात्म है।
अथाधिदेवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे । तप्स्याम्यहमित्यादित्यः । भास्याम्यहमिति चन्द्रमाः । एवमन्या देवता यथादेवतम् । स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुः । म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः । सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः
अब अधिदैवत। अग्नि ने व्रत लिया, ‘मैं जलूँगा’; आदित्य ने, ‘मैं तपूँगा’; चन्द्रमा ने, ‘मैं प्रकाशित होऊँगा’; इसी प्रकार अन्य देवताओं ने अपने-अपने स्वभाव के अनुसार। जैसे इन्द्रियों में मध्यम प्राण है, वैसे ही इन देवताओं में वायु है। अन्य देवता अस्त होते हैं, वायु नहीं। वायु वह देवता है जो कभी अस्त नहीं होता।
इस विषय में यह श्लोक है: ‘जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ अस्त होता है।’ यह प्राण से ही उदय होता है और प्राण में ही अस्त होता है। ‘देवताओं ने उसे अपना धर्म बनाया, वही आज है और वही कल।’ जो व्रत उन्होंने तब धारण किया, वही आज भी करते हैं। इसलिए एक ही व्रत का पालन करे, प्राण लेना और अपान करना, कि पाप रूपी मृत्यु मुझे न पकड़े। यदि इसका पालन करे तो इसे पूर्ण करने की इच्छा रखे। इससे वह इस देवता का सायुज्य और सालोक्य पाता है।
यह जगत् तीन ही है: नाम, रूप और कर्म। नामों का उक्थ अर्थात् उद्गम वाणी है, क्योंकि इसी से सब नाम उठते हैं। यही उनका साम है, क्योंकि यह सब नामों में समान है। यही उनका ब्रह्म है, क्योंकि यह सब नामों को धारण करती है।
रूपों का उक्थ नेत्र है, क्योंकि इसी से सब रूप उठते हैं। यही उनका साम है, क्योंकि यह सब रूपों में समान है। यही उनका ब्रह्म है, क्योंकि यह सब रूपों को धारण करता है।
कर्मों का उक्थ शरीर है, क्योंकि इसी से सब कर्म उठते हैं। यही उनका साम है, क्योंकि यह सब कर्मों में समान है। यही उनका ब्रह्म है, क्योंकि यह सब कर्मों को धारण करता है। ये तीनों मिलकर एक हैं, यह आत्मा; और आत्मा एक होकर ये तीन है। यह अमृत सत्य से ढका है। प्राण अमृत है, नाम और रूप सत्य हैं। इन दोनों से यह प्राण ढका हुआ है।