बृहदारण्यकोपनिषद्

अध्याय 1: विराट् अश्व और अहं ब्रह्मास्मि

81 श्लोक · 1 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

विराट् अश्व और अहं ब्रह्मास्मि

यज्ञीय अश्व का सिर उषा है, नेत्र सूर्य, प्राण वायु। आरम्भ में यहाँ कुछ नहीं था, केवल मृत्यु, अर्थात् भूख, जिसने लोकों को रचा। देवता और असुर उद्गीथ के लिए होड़ करते हैं; केवल प्राण को पाप नहीं बेध पाता, और प्रार्थना दी गई है: असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय। आरम्भ में केवल आत्मा था; उसने कहा अहम्, डरा, फिर अकेलापन अनुभव किया, दो हुआ, और उससे सब प्राणियों के जोड़े हुए। केवल ब्रह्म था, और उसने स्वयं को जाना: अहं ब्रह्मास्मि। जो यह जानता है, वह सब हो जाता है; देवता भी उसे रोक नहीं सकते। फिर बल से भी श्रेष्ठ धर्म प्रकट होता है।

प्रथमोऽध्यायः
द्वितीयोऽध्यायः
तृतीयोऽध्यायः
चतुर्थोऽध्यायः
पञ्चमोऽध्यायः
षष्ठोऽध्यायः
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prefix=बृहदारण्यक उपनिषद्
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searchbuttonlabel=बृहदारण्यक उपनिषद्ः शोधः
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

prathamo'dhyāyaḥ
dvitīyo'dhyāyaḥ
tṛtīyo'dhyāyaḥ
caturtho'dhyāyaḥ
pañcamo'dhyāyaḥ
ṣaṣṭho'dhyāyaḥ
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prefix=bṛhadāraṇyaka upaniṣad
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searchbuttonlabel=bṛhadāraṇyaka upaniṣadḥ śodhaḥ
oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
1.1.1

अथ प्रथमोऽध्यायः ।
प्रथमं ब्राह्मणम् ।
उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः ।
सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य ।
द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मांसानि ।
ऊवध्यं सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमानि ।
उद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धः ।
यद्विजृम्भते तद्विद्योतते ।
यद्विधूनुते तत्स्तनयति ।
यन्मेहति तद्वर्षति ।
वागेवास्य वाक् (शतपथब्राह्मणम् १०.६.४.१ )

atha prathamo'dhyāyaḥ |
prathamaṃ brāhmaṇam |
uṣā vā aśvasya medhyasya śiraḥ |
sūryaścakṣurvātaḥ prāṇo vyāttamagnirvaiśvānaraḥ saṃvatsara ātmāśvasya medhyasya |
dyauḥ pṛṣṭhamantarikṣamudaraṃ pṛthivī pājasyaṃ diśaḥ pārśve avāntaradiśaḥ parśava ṛtavo'ṅgāni māsāścārdhamāsāśca parvāṇyahorātrāṇi pratiṣṭhā nakṣatrāṇyasthīni nabho māṃsāni |
ūvadhyaṃ sikatāḥ sindhavo gudā yakṛcca klomānaśca parvatā oṣadhayaśca vanaspatayaśca lomāni |
udyan pūrvārdho nimlocañjaghanārdhaḥ |
yadvijṛmbhate tadvidyotate |
yadvidhūnute tatstanayati |
yanmehati tadvarṣati |
vāgevāsya vāk (śatapathabrāhmaṇam 10.6.4.1 )

ॐ। उषा यज्ञीय अश्व का सिर है, सूर्य उसकी आँख, वायु उसका प्राण और सब मनुष्यों में स्थित वैश्वानर अग्नि उसका खुला मुख है। संवत्सर उस अश्व का शरीर है। द्युलोक उसकी पीठ, अन्तरिक्ष उदर और पृथ्वी उसके पैरों के बीच का भाग है। दिशाएँ उसकी बगलें, उपदिशाएँ पसलियाँ, ऋतुएँ अंग, मास और पक्ष जोड़, दिन-रात पैर, नक्षत्र हड्डियाँ और बादल मांस हैं। बालू उसके पेट का अधपचा अन्न, नदियाँ नाड़ियाँ, पर्वत यकृत और फेफड़े, ओषधियाँ और वनस्पतियाँ रोम हैं। उगता सूर्य उसका अगला भाग और डूबता सूर्य पिछला भाग है। वह जम्हाई लेता है तो बिजली चमकती है, शरीर झटकता है तो मेघ गरजता है, मूत्र करता है तो वर्षा होती है। वाणी ही उसकी हिनहिनाहट है।

1.1.2

अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत ।
तस्य पूर्वे समुद्रे योनिः ।
रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत ।
तस्यापरे समुद्रे योनिर् ।
एतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः ।
हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वासुरानश्वो मनुष्यान् ।
समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः

aharvā aśvaṃ purastānmahimānvajāyata |
tasya pūrve samudre yoniḥ |
rātrirenaṃ paścānmahimānvajāyata |
tasyāpare samudre yonir |
etau vā aśvaṃ mahimānāvabhitaḥ sambabhūvatuḥ |
hayo bhūtvā devānavahadvājī gandharvānarvāsurānaśvo manuṣyān |
samudra evāsya bandhuḥ samudro yoniḥ

दिन अश्व के आगे महिमा नामक स्वर्ण यज्ञपात्र के रूप में प्रकट हुआ, उसका उद्गम पूर्वी समुद्र है। रात्रि उसके पीछे महिमा नामक रजत पात्र के रूप में प्रकट हुई, उसका उद्गम पश्चिमी समुद्र है। ये दोनों महिमा पात्र अश्व के दोनों ओर स्थित हुए। ‘हय’ बनकर उसने देवताओं को ढोया, ‘वाजी’ बनकर गन्धर्वों को, ‘अर्वा’ बनकर असुरों को और ‘अश्व’ बनकर मनुष्यों को। समुद्र ही उसका बन्धु है और समुद्र ही उसकी योनि।

1.2.1

नैवेह किं चनाग्र आसीत् ।
मृत्युनैवेदमावृतमासीदशनायया ।
अशनाया हि मृत्युः ।
तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति ।
सोऽर्चन्नचरत् ।
तस्यार्चत आपोऽजायन्त ।
अर्चते वै मे कमभूदिति ।
तदेवार्क्यस्यार्कत्वम् ।
कं ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्क्यस्यार्कत्वं वेद

naiveha kiṃ canāgra āsīt |
mṛtyunaivedamāvṛtamāsīdaśanāyayā |
aśanāyā hi mṛtyuḥ |
tanmano'kurutātmanvī syāmiti |
so'rcannacarat |
tasyārcata āpo'jāyanta |
arcate vai me kamabhūditi |
tadevārkyasyārkatvam |
kaṃ ha vā asmai bhavati ya evametadarkyasyārkatvaṃ veda

आरम्भ में यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्यु से, भूख से ढका हुआ था, क्योंकि भूख ही मृत्यु है। उसने मन में संकल्प किया, ‘मैं शरीरधारी हो जाऊँ।’ वह अर्चना करता हुआ विचरने लगा। उसके अर्चना करते समय जल उत्पन्न हुआ। उसने कहा, ‘अर्चना करते हुए मुझे ‘क’ अर्थात् सुख मिला।’ यही अग्नि के ‘अर्क’ कहलाने का कारण है। जो अर्क के अर्कत्व का यह रहस्य जानता है, उसे सुख प्राप्त होता है।

1.2.2

आपो वा अर्कः ।
तद्यदपां शर आसीत्तत्समहन्यत ।
सा पृथिव्यभवत् ।
तस्यामश्राम्यत् ।
तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः

āpo vā arkaḥ |
tadyadapāṃ śara āsīttatsamahanyata |
sā pṛthivyabhavat |
tasyāmaśrāmyat |
tasya śrāntasya taptasya tejoraso niravartatāgniḥ

जल ही अर्क है। जल पर जो झाग था, वह जमकर ठोस हो गया और वही पृथ्वी बना। उस पर उसने श्रम किया। श्रम और तप से तपे हुए उस प्रजापति से तेज और रस निकलकर अग्नि के रूप में प्रकट हुआ।

1.2.3

स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् ।
स एष प्राणस्त्रेधाविहितः ।
तस्य प्राची दिक्शिरोऽसौ चासौ चेर्मौ ।
अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ ।
दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे ।
द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः ।
स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितः ।
यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान्

sa tredhātmānaṃ vyakurutādityaṃ tṛtīyaṃ vāyuṃ tṛtīyam |
sa eṣa prāṇastredhāvihitaḥ |
tasya prācī dikśiro'sau cāsau cermau |
athāsya pratīcī dikpucchamasau cāsau ca sakthyau |
dakṣiṇā codīcī ca pārśve |
dyauḥ pṛṣṭhamantarikṣamudaramiyamuraḥ |
sa eṣo'psu pratiṣṭhitaḥ |
yatra kva caiti tadeva pratitiṣṭhatyevaṃ vidvān

उसने अपने को तीन भागों में बाँटा: एक भाग अग्नि, एक भाग आदित्य और एक भाग वायु। इस प्रकार यह प्राण तीन रूपों में स्थित है। पूर्व दिशा उसका सिर है और ईशान तथा आग्नेय कोण उसकी भुजाएँ। पश्चिम दिशा उसकी पूँछ है और वायव्य तथा नैर्ऋत्य कोण उसकी जंघाएँ। दक्षिण और उत्तर उसकी बगलें हैं, द्युलोक पीठ, अन्तरिक्ष उदर और यह पृथ्वी वक्ष। वह जल में प्रतिष्ठित है। जो यह जानता है, वह जहाँ भी जाता है वहीं प्रतिष्ठा पाता है।

1.2.4

सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति ।
स मनसा वाचं मिथुनं समभवदशनाया मृत्युः ।
तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत् ।
न ह पुरा ततः संवत्सर आस ।
तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान्त्संवत्सरः ।
तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत ।
तं जातमभिव्याददात् ।
स भाणकरोत् ।
सैव वागभवत्

so'kāmayata dvitīyo ma ātmā jāyeteti |
sa manasā vācaṃ mithunaṃ samabhavadaśanāyā mṛtyuḥ |
tadyadreta āsītsa saṃvatsaro'bhavat |
na ha purā tataḥ saṃvatsara āsa |
tametāvantaṃ kālamabibharyāvāntsaṃvatsaraḥ |
tametāvataḥ kālasya parastādasṛjata |
taṃ jātamabhivyādadāt |
sa bhāṇakarot |
saiva vāgabhavat

उसने कामना की, ‘मेरा दूसरा स्वरूप उत्पन्न हो।’ तब भूख रूपी मृत्यु ने मन के द्वारा वाणी से मिथुन किया। जो बीज था, वह संवत्सर बना; उससे पहले संवत्सर नहीं था। उसने उसे एक संवत्सर जितने समय तक भीतर धारण किया और उस काल के बाद उसे उत्पन्न किया। जन्म लेते ही उसने उसे खाने के लिए मुँह खोला। तब बालक ने ‘भाण्’ शब्द किया, वही वाणी बन गई।

1.2.5

स ऐक्षत यदि वा इममभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति ।
स तया वाचा तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांसि यज्ञान् प्रजां पशून् ।
स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत ।
सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् ।
सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद

sa aikṣata yadi vā imamabhimaṃsye kanīyo'nnaṃ kariṣya iti |
sa tayā vācā tenātmanedaṃ sarvamasṛjata yadidaṃ kiñca ṛco yajūṃṣi sāmāni chandāṃsi yajñān prajāṃ paśūn |
sa yadyadevāsṛjata tattadattumadhriyata |
sarvaṃ vā attīti tadaditeradititvam |
sarvasyāttā bhavati sarvamasyānnaṃ bhavati ya evametadaditeradititvaṃ veda

उसने सोचा, ‘यदि मैं इसे मार डालूँ तो मेरे लिए अन्न कम हो जाएगा।’ तब उसने उसी वाणी और उसी आत्मा से यह सब रचा जो कुछ भी है: ऋचाएँ, यजुष्, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु। जो-जो उसने रचा, उसे वह खाने लगा। वह सब कुछ खाता है, इसीलिए उसका नाम अदिति है। जो अदिति के अदितित्व को जानता है, वह सबका भोक्ता होता है और सब उसका अन्न बन जाता है।

1.2.6

सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति ।
सोऽश्राम्यत् ।
स तपोऽतप्यत ।
तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् ।
प्राणा वै यशो वीर्यम् ।
तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत ।
तस्य शरीर एव मन आसीत्

so'kāmayata bhūyasā yajñena bhūyo yajeyeti |
so'śrāmyat |
sa tapo'tapyata |
tasya śrāntasya taptasya yaśo vīryamudakrāmat |
prāṇā vai yaśo vīryam |
tatprāṇeṣūtkrānteṣu śarīraṃ śvayitumadhriyata |
tasya śarīra eva mana āsīt

उसने कामना की, ‘मैं और बड़े यज्ञ से फिर यजन करूँ।’ उसने श्रम किया और तप किया। श्रम और तप से तपे उस प्रजापति से यश और वीर्य निकल गए। प्राण ही यश और वीर्य हैं। प्राणों के निकल जाने पर उसका शरीर फूलने लगा, फिर भी उसका मन उसी शरीर में बना रहा।

1.2.7

सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति ।
ततोऽश्वः समभवत् ।
यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् ।
एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ।
तमनवरुध्यैवामन्यत ।
तं संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत ।
पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् ।
तस्मात्सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते ।
एष वा अश्वमेधो य एष तपति ।
तस्य संवत्सर आत्मा ।
अयमग्निरर्कः ।
तस्येमे लोका आत्मानः ।
तावेतावर्काश्वमेधौ ।
सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव ।
अप पुनर्मृत्युं जयति ।
नैनं मृत्युराप्नोति ।
मृत्युरस्यात्मा भवति ।
सर्वमायुरेति ।
एतासां देवतानामेको भवति

so'kāmayata medhyaṃ ma idaṃ syādātmanvyanena syāmiti |
tato'śvaḥ samabhavat |
yadaśvattanmedhyamabhūditi tadevāśvamedhasyāśvamedhatvam |
eṣa ha vā aśvamedhaṃ veda ya enamevaṃ veda |
tamanavarudhyaivāmanyata |
taṃ saṃvatsarasya parastādātmana ālabhata |
paśūn devatābhyaḥ pratyauhat |
tasmātsarvadevatyaṃ prokṣitaṃ prājāpatyamālabhante |
eṣa vā aśvamedho ya eṣa tapati |
tasya saṃvatsara ātmā |
ayamagnirarkaḥ |
tasyeme lokā ātmānaḥ |
tāvetāvarkāśvamedhau |
so punarekaiva devatā bhavati mṛtyureva |
apa punarmṛtyuṃ jayati |
nainaṃ mṛtyurāpnoti |
mṛtyurasyātmā bhavati |
sarvamāyureti |
etāsāṃ devatānāmeko bhavati

उसने कामना की, ‘मेरा यह शरीर यज्ञ के योग्य हो, इसके द्वारा मैं आत्मवान् बनूँ।’ वह फूल गया था, इसलिए अश्व बना और यज्ञ योग्य अर्थात् मेध्य हुआ। यही अश्वमेध का अश्वमेधत्व है। जो इसे ऐसा जानता है, वही अश्वमेध को जानता है। उसने अश्व को बिना रोके छोड़ दिया और एक वर्ष बाद उसे अपने लिए अर्पित किया, अन्य पशु देवताओं को सौंप दिए। इसीलिए जल से प्रोक्षित, सब देवताओं के निमित्त अश्व को प्रजापति का मानकर अर्पित करते हैं। जो तपता है, वह सूर्य ही अश्वमेध है, संवत्सर उसका शरीर है। यह अग्नि अर्क है, ये लोक उसका शरीर हैं। अर्क और अश्वमेध फिर एक ही देवता हैं, मृत्यु। जो यह जानता है, वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है, मृत्यु उसे पकड़ नहीं पाती, मृत्यु उसकी आत्मा बन जाती है, वह पूर्ण आयु पाता है और इन देवताओं में एक हो जाता है।

1.3.1

(उद्गीथब्राह्मणम् । वैराजब्राह्मणं वा ।)
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ततः कानीयसा एव देवा ज्यायसा असुराः ।
त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ।
ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति

(udgīthabrāhmaṇam | vairājabrāhmaṇaṃ vā |)
dvayā ha prājāpatyā devāścāsurāśca tataḥ kānīyasā eva devā jyāyasā asurāḥ |
ta eṣu lokeṣvaspardhanta |
te ha devā ūcurhantāsurān yajña udgīthenātyayāmeti

प्रजापति की सन्तान दो प्रकार की थी, देवता और असुर। देवता छोटे और संख्या में कम थे, असुर बड़े और अधिक। वे इन लोकों के लिए आपस में होड़ करने लगे। देवताओं ने कहा, ‘आओ, यज्ञ में उद्गीथ के द्वारा असुरों को पराजित करें।’

1.3.2

ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति ।
तथेति तेभ्यो वागुदगायत् ।
यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् ।
यत्कल्याणं वदति तदात्मने ।
तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् ।
स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति ।
स एव स पाप्मा

te ha vācamūcustvaṃ na udgāyeti |
tatheti tebhyo vāgudagāyat |
yo vāci bhogastaṃ devebhya āgāyat |
yatkalyāṇaṃ vadati tadātmane |
te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti |
tamabhidrutya pāpmanāvidhyan |
sa yaḥ sa pāpmā yadevedamapratirūpaṃ vadati |
sa eva sa pāpmā

उन्होंने वाणी से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ वाणी ने ‘ठीक है’ कहकर उनके लिए उद्गान किया। वाणी में जो भोग है, उसे उसने देवताओं के लिए गाया और जो कल्याणमय बोलना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता के द्वारा देवता हमें पराजित कर देंगे। उन्होंने उस पर टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित बोला जाता है, वही वह पाप है।

1.3.3

अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति ।
तथेति तेभ्यः प्राण उदगायत् ।
यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् ।
यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने ।
तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् ।
स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति ।
स एव स पाप्मा

atha ha prāṇamūcustvaṃ na udgāyeti |
tatheti tebhyaḥ prāṇa udagāyat |
yaḥ prāṇe bhogastaṃ devebhya āgāyat |
yatkalyāṇaṃ jighrati tadātmane |
te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti |
tamabhidrutya pāpmanāvidhyan |
sa yaḥ sa pāpmā yadevedamapratirūpaṃ jighrati |
sa eva sa pāpmā

फिर उन्होंने घ्राण रूपी प्राण से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। घ्राण में जो भोग है, उसे उसने देवताओं के लिए गाया और जो शुभ सूँघना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित सूँघा जाता है, वही वह पाप है।

1.3.4

अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति ।
तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् ।
यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् ।
यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने ।
तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् ।
स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति ।
स एव स पाप्मा

atha ha cakṣurūcustvaṃ na udgāyeti |
tatheti tebhyaścakṣurudagāyat |
yaścakṣuṣi bhogastaṃ devebhya āgāyat |
yatkalyāṇaṃ paśyati tadātmane |
te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti |
tamabhidrutya pāpmanāvidhyan |
sa yaḥ sa pāpmā yadevedamapratirūpaṃ paśyati |
sa eva sa pāpmā

फिर उन्होंने नेत्र से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। नेत्र में जो भोग है, उसे देवताओं के लिए गाया और जो शुभ देखना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित देखा जाता है, वही वह पाप है।

1.3.5

अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति ।
तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुदगायत् ।
यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् ।
यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने ।
तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् ।
स यः स पाप्मा ।
यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति ।
स एव स पाप्मा

atha ha śrotramūcustvaṃ na udgāyeti |
tatheti tebhyaḥ śrotramudagāyat |
yaḥ śrotre bhogastaṃ devebhya āgāyat |
yatkalyāṇaṃ śṛṇoti tadātmane |
te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti |
tamabhidrutya pāpmanāvidhyan |
sa yaḥ sa pāpmā |
yadevedamapratirūpaṃ śṛṇoti |
sa eva sa pāpmā

फिर उन्होंने श्रोत्र से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। श्रोत्र में जो भोग है, उसे देवताओं के लिए गाया और जो शुभ सुनना है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित सुना जाता है, वही वह पाप है।

1.3.6

अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति ।
तथेति तेभ्यो मन उदगायत् ।
यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् ।
यत्कल्याणं संकल्पयति तदात्मने ।
तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् ।
स यः स पाप्मा ।
यदेवेदमप्रतिरूपं संकल्पयति ।
स एव स पाप्मा ।
एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन् ।
एवमेनाः पाप्मनाविध्यन्

atha ha mana ūcustvaṃ na udgāyeti |
tatheti tebhyo mana udagāyat |
yo manasi bhogastaṃ devebhya āgāyat |
yatkalyāṇaṃ saṃkalpayati tadātmane |
te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti |
tamabhidrutya pāpmanāvidhyan |
sa yaḥ sa pāpmā |
yadevedamapratirūpaṃ saṃkalpayati |
sa eva sa pāpmā |
evamu khalvetā devatāḥ pāpmabhirupāsṛjan |
evamenāḥ pāpmanāvidhyan

फिर उन्होंने मन से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उद्गान किया। मन में जो भोग है, उसे देवताओं के लिए गाया और जो शुभ संकल्प है, उसे अपने लिए रखा। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे, और टूटकर उसे पाप से बींध दिया। जो अनुचित संकल्प किया जाता है, वही वह पाप है। इस प्रकार असुरों ने इन देवताओं को पापों से छुआ और पाप से बींध दिया।

1.3.7

अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति ।
तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ।
तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मनाविव्यत्सन् ।
स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैवं हैव विध्वंसमाना विष्वञ्चो विनेशुः ।
ततो देवा अभवन्, परासुरा ।
भवत्यात्मना, परास्य द्विषन् भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद

atha hemamāsanyaṃ prāṇamūcustvaṃ na udgāyeti |
tatheti tebhya eṣa prāṇa udagāyat |
te'viduranena vai na udgātrātyeṣyantīti |
tamabhidrutya pāpmanāvivyatsan |
sa yathāśmānamṛtvā loṣṭo vidhvaṃsetaivaṃ haiva vidhvaṃsamānā viṣvañco vineśuḥ |
tato devā abhavan, parāsurā |
bhavatyātmanā, parāsya dviṣan bhrātṛvyo bhavati ya evaṃ veda

फिर उन्होंने मुख में स्थित इस प्राण से कहा, ‘तुम हमारे लिए उद्गान करो।’ उसने ‘ठीक है’ कहकर उनके लिए उद्गान किया। असुरों ने जाना कि इस उद्गाता से देवता हमें जीत लेंगे। वे उसे पाप से बींधने के लिए टूट पड़े, पर जैसे ढेला पत्थर से टकराकर बिखर जाता है, वैसे ही वे बिखरकर चारों ओर नष्ट हो गए। तब देवता विजयी हुए और असुर हार गए। जो यह जानता है, वह स्वयं उन्नत होता है और उससे द्वेष करने वाला शत्रु पराजित होता है।

1.3.8

ते होचुः क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेति ।
अयमास्येऽन्तरिति ।
सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः

te hocuḥ kva nu so'bhūdyo na itthamasakteti |
ayamāsye'ntariti |
so'yāsya āṅgiraso'ṅgānāṃ hi rasaḥ

देवताओं ने कहा, ‘वह कहाँ था जिसने हमारा ऐसा साथ दिया?’ फिर उन्होंने जाना, ‘यह मुख के भीतर है।’ इसलिए वह अयास्य आङ्गिरस कहलाता है, क्योंकि वह अंगों का रस है।

1.3.9

सा वा एषा देवता दूर्नाम ।
दूरं ह्यस्या मृत्युर् ।
दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद

sā vā eṣā devatā dūrnāma |
dūraṃ hyasyā mṛtyur |
dūraṃ ha vā asmānmṛtyurbhavati ya evaṃ veda

यह देवता ‘दूर्’ नाम वाला है, क्योंकि मृत्यु इससे दूर रहती है। जो यह जानता है, उससे भी मृत्यु दूर रहती है।

1.3.10

सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयां चकार ।
तदासां पाप्मनो विन्यदधात् ।
तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति

sā vā eṣā devataitāsāṃ devatānāṃ pāpmānaṃ mṛtyumapahatya yatrāsāṃ diśāmantastadgamayāṃ cakāra |
tadāsāṃ pāpmano vinyadadhāt |
tasmānna janamiyānnāntamiyānnetpāpmānaṃ mṛtyumanvavāyānīti

इस देवता ने उन देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को हटाकर वहाँ पहुँचा दिया जहाँ दिशाओं का अन्त होता है, और वहीं उनके पापों को रख दिया। इसलिए मनुष्य उस सीमा के लोगों के पास न जाए और न उस अन्त तक जाए, कहीं उस पाप रूपी मृत्यु से उसका सामना न हो जाए।

1.3.11

सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैना मृत्युमत्यवहत्

sā vā eṣā devataitāsāṃ devatānāṃ pāpmānaṃ mṛtyumapahatyāthainā mṛtyumatyavahat

उन देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को दूर करके इस देवता ने फिर उन्हें मृत्यु के पार पहुँचा दिया।

1.3.12

सा वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् ।
सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् ।
सोऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते

sā vai vācameva prathamāmatyavahat |
sā yadā mṛtyumatyamucyata so'gnirabhavat |
so'yamagniḥ pareṇa mṛtyumatikrānto dīpyate

सबसे पहले उसने वाणी को पार पहुँचाया। जब वाणी मृत्यु से छूट गई, तब वह अग्नि बन गई। वही अग्नि मृत्यु के पार जाकर प्रज्वलित होती है।

1.3.13

अथ प्राणमत्यवहत् ।
स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत् ।
सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते

atha prāṇamatyavahat |
sa yadā mṛtyumatyamucyata sa vāyurabhavat |
so'yaṃ vāyuḥ pareṇa mṛtyumatikrāntaḥ pavate

फिर उसने घ्राण रूपी प्राण को पार पहुँचाया। जब वह मृत्यु से छूट गया, तब वह वायु बन गया। वही वायु मृत्यु के पार जाकर बहता है।

1.3.14

अथ चक्षुरत्यवहत् ।
तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत् ।
सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तस्तपति

atha cakṣuratyavahat |
tadyadā mṛtyumatyamucyata sa ādityo'bhavat |
so'sāvādityaḥ pareṇa mṛtyumatikrāntastapati

फिर उसने नेत्र को पार पहुँचाया। जब नेत्र मृत्यु से छूट गया, तब वह आदित्य बन गया। वही सूर्य मृत्यु के पार जाकर तपता है।

1.3.15

अथ श्रोत्रमत्यवहत् ।
तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवन् ।
ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः

atha śrotramatyavahat |
tadyadā mṛtyumatyamucyata tā diśo'bhavan |
tā imā diśaḥ pareṇa mṛtyumatikrāntāḥ

फिर उसने श्रोत्र को पार पहुँचाया। जब श्रोत्र मृत्यु से छूट गया, तब वह दिशाएँ बन गया। ये दिशाएँ मृत्यु के पार हैं।

1.3.16

अथ मनोऽत्यवहत् ।
तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत् ।
सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भाति ।
एवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद

atha mano'tyavahat |
tadyadā mṛtyumatyamucyata sa candramā abhavat |
so'sau candraḥ pareṇa mṛtyumatikrānto bhāti |
evaṃ ha vā enameṣā devatā mṛtyumativahati ya evaṃ veda

फिर उसने मन को पार पहुँचाया। जब मन मृत्यु से छूट गया, तब वह चन्द्रमा बन गया। वही चन्द्रमा मृत्यु के पार जाकर प्रकाशित होता है। जो यह जानता है, उसे भी यह देवता इसी प्रकार मृत्यु के पार ले जाता है।

1.3.17

अथात्मनेऽन्नाद्यमागायत् ।
यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यते ।
इह प्रतितिष्ठति

athātmane'nnādyamāgāyat |
yaddhi kiñcānnamadyate'nenaiva tadadyate |
iha pratitiṣṭhati

फिर प्राण ने अपने लिए अन्न का उद्गान किया, क्योंकि जो भी अन्न खाया जाता है, वह इसी के द्वारा खाया जाता है, और इसी में वह प्रतिष्ठित रहता है।

1.3.18

ते देवा अब्रुवन् ।
एतावद्वा इदं सर्वं यदन्नम् ।
तदात्मन आगासीः ।
अनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ।
ते वै माभिसंविशतेति ।
तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त ।
तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्ति ।
एवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुरएता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद ।
य उ हैवंविदं स्वेषु प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवति ।
अथ य एवैतमनुभवति यो वैतमनु भार्यान् बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति

te devā abruvan |
etāvadvā idaṃ sarvaṃ yadannam |
tadātmana āgāsīḥ |
anu no'sminnanna ābhajasveti |
te vai mābhisaṃviśateti |
tatheti taṃ samantaṃ pariṇyaviśanta |
tasmādyadanenānnamatti tenaitāstṛpyanti |
evaṃ ha vā enaṃ svā abhisaṃviśanti bhartā svānāṃ śreṣṭhaḥ puraetā bhavatyannādo'dhipatirya evaṃ veda |
ya u haivaṃvidaṃ sveṣu pratirbubhūṣati na haivālaṃ bhāryebhyo bhavati |
atha ya evaitamanubhavati yo vaitamanu bhāryān bubhūrṣati sa haivālaṃ bhāryebhyo bhavati

देवताओं ने कहा, ‘जितना यह सब है, वह अन्न ही है, और उसे तुमने अपने लिए गा लिया। इस अन्न में हमें भी भागी बनाओ।’ उसने कहा, ‘तो तुम सब चारों ओर से मुझमें प्रवेश करो।’ वे ‘ठीक है’ कहकर चारों ओर से उसमें प्रविष्ट हो गए। इसलिए प्राण के द्वारा जो अन्न खाया जाता है, उससे ये इन्द्रियाँ भी तृप्त होती हैं। इसी प्रकार जो यह जानता है, उसके स्वजन उसके चारों ओर आ बसते हैं; वह उनका भरण करने वाला, श्रेष्ठ, अगुआ, अन्न का भोक्ता और स्वामी होता है। स्वजनों में जो ऐसे ज्ञानी का विरोध करता है, वह अपने आश्रितों का भरण करने में समर्थ नहीं होता। पर जो उसका अनुसरण करता है, वह अपने आश्रितों का भरण करने में समर्थ होता है।

1.3.19

सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ।
प्राणो वा अङ्गानां रसः ।
प्राणो हि वा अङ्गानां रसः ।
तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यति ।
एष हि वा अङ्गानां रसः

so'yāsya āṅgiraso'ṅgānāṃ hi rasaḥ |
prāṇo vā aṅgānāṃ rasaḥ |
prāṇo hi vā aṅgānāṃ rasaḥ |
tasmādyasmātkasmāccāṅgātprāṇa utkrāmati tadeva tacchuṣyati |
eṣa hi vā aṅgānāṃ rasaḥ

यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अंगों का रस है। प्राण ही अंगों का रस है। इसीलिए जिस किसी अंग से प्राण निकल जाता है, वही अंग सूख जाता है। निश्चय ही यह अंगों का रस है।

1.3.20

एष उ एव बृहस्पतिः ।
वाग्वै बृहती ।
तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः

eṣa u eva bṛhaspatiḥ |
vāgvai bṛhatī |
tasyā eṣa patistasmādu bṛhaspatiḥ

यही बृहस्पति भी है। वाणी बृहती है और यह उसका पति है, इसलिए यह बृहस्पति है।

1.3.21

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः ।
वाग्वै ब्रह्म ।
तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः

eṣa u eva brahmaṇaspatiḥ |
vāgvai brahma |
tasyā eṣa patistasmādu brahmaṇaspatiḥ

यही ब्रह्मणस्पति भी है। वाणी ब्रह्म अर्थात् वेद है और यह उसका पति है, इसलिए यह ब्रह्मणस्पति है।

1.3.22

एष उ एव साम ।
वाग्वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् ।
यद्वेव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव साम ।
अश्नुते साम्नः सायुज्यं सलोकताम् ।
य एवमेतत्साम वेद

eṣa u eva sāma |
vāgvai sāmaiṣa sā cāmaśceti tatsāmnaḥ sāmatvam |
yadveva samaḥ pluṣiṇā samo maśakena samo nāgena sama ebhistribhirlokaiḥ samo'nena sarveṇa tasmādveva sāma |
aśnute sāmnaḥ sāyujyaṃ salokatām |
ya evametatsāma veda

यही साम भी है। वाणी ‘सा’ है और यह प्राण ‘अम’, दोनों मिलकर साम हैं, यही साम का सामत्व है। अथवा यह सम है, इसलिए साम है: यह मच्छर के समान है, मशक के समान है, हाथी के समान है, इन तीनों लोकों के समान है और इस सम्पूर्ण जगत् के समान है। जो साम को ऐसा जानता है, वह साम का सायुज्य और सालोक्य पाता है।

1.3.23

एष उ वा उद्गीथः ।
प्राणो वा उत्प्राणेन हीदं सर्वमुत्तब्धम् ।
वागेव गीथा ।
उच्च गीथा चेति ।
स उद्गीथः

eṣa u vā udgīthaḥ |
prāṇo vā utprāṇena hīdaṃ sarvamuttabdham |
vāgeva gīthā |
ucca gīthā ceti |
sa udgīthaḥ

यही उद्गीथ भी है। प्राण ही ‘उत्’ है, क्योंकि प्राण से ही यह सब ऊपर थमा हुआ है। वाणी ही ‘गीथा’ है। ‘उत्’ और ‘गीथा’ मिलकर उद्गीथ है।

1.3.24

तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाच ।
अयं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति ।
वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति

taddhāpi brahmadattaścaikitāneyo rājānaṃ bhakṣayannuvāca |
ayaṃ tyasya rājā mūrdhānaṃ vipātayatādyadito'yāsya āṅgiraso'nyenodagāyaditi |
vācā ca hyeva sa prāṇena codagāyaditi

इसी विषय में ब्रह्मदत्त चैकितानेय ने सोमपान करते हुए कहा था, ‘यदि अयास्य आङ्गिरस ने इसके अतिरिक्त किसी और से उद्गान किया हो, तो यह राजा सोम मेरा सिर गिरा दे।’ क्योंकि उन्होंने वाणी और प्राण से ही उद्गान किया था।

1.3.25

तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वम् ।
तस्य वै स्वर एव स्वम् ।
तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत ।
तया वाचा स्वरसम्पन्नयार्त्विज्यं कुर्यात् ।
तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव ।
अथो यस्य स्वं भवति ।
भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद

tasya haitasya sāmno yaḥ svaṃ veda bhavati hāsya svam |
tasya vai svara eva svam |
tasmādārtvijyaṃ kariṣyan vāci svaramiccheta |
tayā vācā svarasampannayārtvijyaṃ kuryāt |
tasmādyajñe svaravantaṃ didṛkṣanta eva |
atho yasya svaṃ bhavati |
bhavati hāsya svaṃ ya evametatsāmnaḥ svaṃ veda

जो इस साम के ‘स्व’ अर्थात् धन को जानता है, उसे धन प्राप्त होता है। स्वर ही उसका धन है। इसलिए जो ऋत्विज् का कर्म करने वाला हो, वह अपनी वाणी में स्वर की कामना करे और स्वर से सम्पन्न वाणी से ऋत्विज् कर्म करे। इसीलिए यज्ञ में लोग स्वरवान् ऋत्विज् को ही देखना चाहते हैं, जैसे धनवान् को। जो साम के इस धन को ऐसा जानता है, उसे धन प्राप्त होता है।

1.3.26

तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णम् ।
तस्य वै स्वर एव सुवर्णम् ।
भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद

tasya haitasya sāmno yaḥ suvarṇaṃ veda bhavati hāsya suvarṇam |
tasya vai svara eva suvarṇam |
bhavati hāsya suvarṇaṃ ya evametatsāmnaḥ suvarṇaṃ veda

जो इस साम के सुवर्ण को जानता है, उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। स्वर ही उसका सुवर्ण है। जो साम के इस सुवर्ण को ऐसा जानता है, उसे सुवर्ण प्राप्त होता है।

1.3.27

तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति ।
तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा ।
वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयते ।
अन्न इत्यु हैक आहुः

tasya haitasya sāmno yaḥ pratiṣṭhāṃ veda prati ha tiṣṭhati |
tasya vai vāgeva pratiṣṭhā |
vāci hi khalveṣa etatprāṇaḥ pratiṣṭhito gīyate |
anna ityu haika āhuḥ

जो इस साम की प्रतिष्ठा को जानता है, वह प्रतिष्ठित होता है। वाणी ही उसकी प्रतिष्ठा है, क्योंकि वाणी में प्रतिष्ठित होकर ही यह प्राण गाया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि अन्न ही इसकी प्रतिष्ठा है।

1.3.28

अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः ।
स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति ।
स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेत् ।
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमयेति ।
स यदाहासतो मा सद्गमयेति ।
मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह ।
तमसो मा ज्योतिर्गमयेति ।
मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह ।
मृत्योर्मामृतं गमयेति ।
नात्र तिरोहितमिवास्ति ।
अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् ।
तस्मादु तेषु वरं वृणीत ।
यं कामं कामयेत्तम् ।
स एष एवंविदुद्गातात्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति ।
तद्धैतल्लोकजिदेव ।
न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद

athātaḥ pavamānānāmevābhyārohaḥ |
sa vai khalu prastotā sāma prastauti |
sa yatra prastuyāttadetāni japet |
asato mā sadgamaya, tamaso mā jyotirgamaya, mṛtyormāmṛtaṃ gamayeti |
sa yadāhāsato mā sadgamayeti |
mṛtyurvā asatsadamṛtaṃ mṛtyormāmṛtaṃ gamayāmṛtaṃ mā kurvityevaitadāha |
tamaso mā jyotirgamayeti |
mṛtyurvai tamo jyotiramṛtaṃ mṛtyormāmṛtaṃ gamayāmṛtaṃ mā kurvityevaitadāha |
mṛtyormāmṛtaṃ gamayeti |
nātra tirohitamivāsti |
atha yānītarāṇi stotrāṇi teṣvātmane'nnādyamāgāyet |
tasmādu teṣu varaṃ vṛṇīta |
yaṃ kāmaṃ kāmayettam |
sa eṣa evaṃvidudgātātmane vā yajamānāya vā yaṃ kāmaṃ kāmayate tamāgāyati |
taddhaitallokajideva |
na haivālokyatāyā āśāsti ya evametatsāma veda

अब पवमान स्तोत्रों का अभ्यारोह कहा जाता है। प्रस्तोता साम का आरम्भ करता है, तब यजमान यह जप करे: ‘असत्य से मुझे सत्य की ओर ले चलो, अन्धकार से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो।’ ‘असतो मा सद्गमय’ में असत् मृत्यु है और सत् अमृत; अर्थ है, मुझे अमर करो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ में तम मृत्यु है और ज्योति अमृत; अर्थ फिर वही है। ‘मृत्योर्मामृतं गमय’ में कुछ छिपा नहीं है। शेष स्तोत्रों में उद्गाता अपने लिए अन्न गाए और जो चाहे वह वर माँगे। ऐसा ज्ञानी उद्गाता अपने लिए या यजमान के लिए जो कामना करे, उसे गाकर पा लेता है। यह ज्ञान लोकों को जीतने वाला है; जो साम को ऐसा जानता है, उसे लोक न मिलने की आशंका नहीं रहती।

1.4.1

(पुरुषविधब्राह्मणम् /आत्मब्राह्मणम् /सृष्टिब्राह्मणम् )
आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः ।
सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् ।
सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् ।
ततोऽहंनामाभवत् ।
तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति ।
स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान् पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुषः ।
ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद

(puruṣavidhabrāhmaṇam /ātmabrāhmaṇam /sṛṣṭibrāhmaṇam )
ātmaivedamagra āsītpuruṣavidhaḥ |
so'nuvīkṣya nānyadātmano'paśyat |
so'hamasmītyagre vyāharat |
tato'haṃnāmābhavat |
tasmādapyetarhyāmantrito'hamayamityevāgra uktvāthānyannāma prabrūte yadasya bhavati |
sa yatpūrvo'smātsarvasmātsarvān pāpmana auṣattasmātpuruṣaḥ |
oṣati ha vai sa taṃ yo'smātpūrvo bubhūṣati ya evaṃ veda

आरम्भ में यह जगत् पुरुष के आकार वाला आत्मा ही था। उसने चारों ओर देखा तो अपने सिवा कुछ नहीं देखा। उसने सबसे पहले कहा, ‘मैं हूँ’, इसी से उसका नाम ‘अहम्’ हुआ। इसीलिए आज भी पुकारे जाने पर मनुष्य पहले ‘यह मैं हूँ’ कहता है और फिर अपना दूसरा नाम बताता है। इस सबसे पहले उसने सब पापों को जला डाला, इसलिए वह पुरुष कहलाया। जो यह जानता है, वह उसे जला डालता है जो उससे आगे होना चाहता है।

1.4.2

सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति ।
स हायमीक्षां चक्रे, यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति ।
तत एवास्य भयं वीयाय ।
कस्माद्ध्यभेष्यत् ।
द्वितीयाद्वै भयं भवति

so'bibhettasmādekākī bibheti |
sa hāyamīkṣāṃ cakre, yanmadanyannāsti kasmānnu bibhemīti |
tata evāsya bhayaṃ vīyāya |
kasmāddhyabheṣyat |
dvitīyādvai bhayaṃ bhavati

वह डर गया, इसीलिए अकेला व्यक्ति डरता है। फिर उसने विचार किया, ‘जब मेरे सिवा कुछ है ही नहीं, तो मैं किससे डरूँ?’ तभी उसका भय चला गया। वह किससे डरता? भय तो दूसरे से ही होता है।

1.4.3

स वै नैव रेमे ।
तस्मादेकाकी न रमते ।
स द्वितीयमैच्छत् ।
स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ सम्परिष्वक्तौ ।
स इममेवात्मानं द्वेधापातयत् ।
ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम् ।
तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यः ।
तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ।
तां समभवत् ।
ततो मनुष्या अजायन्त

sa vai naiva reme |
tasmādekākī na ramate |
sa dvitīyamaicchat |
sa haitāvānāsa yathā strīpumāṃsau sampariṣvaktau |
sa imamevātmānaṃ dvedhāpātayat |
tataḥ patiśca patnī cābhavatām |
tasmādidamardhabṛgalamiva sva iti ha smāha yājñavalkyaḥ |
tasmādayamākāśaḥ striyā pūryata eva |
tāṃ samabhavat |
tato manuṣyā ajāyanta

उसे आनन्द नहीं मिला, इसीलिए अकेला व्यक्ति प्रसन्न नहीं रहता। उसने दूसरे की इच्छा की। वह उतना बड़ा था जितने आलिंगन में बँधे स्त्री और पुरुष होते हैं। उसने अपने इसी स्वरूप को दो भागों में बाँट दिया, उससे पति और पत्नी हुए। इसीलिए याज्ञवल्क्य कहा करते थे कि अकेला व्यक्ति दाल के आधे दाने के समान है। इसी से यह रिक्त स्थान पत्नी से भरता है। वह उससे संयुक्त हुआ और उससे मनुष्य उत्पन्न हुए।

1.4.4

सो हेयमीक्षां चक्रे कथं नु मात्मन एव जनयित्वा सम्भवति ।
हन्त तिरोऽसानीति ।
सा गौरभवद्वृषभ इतरः ।
तां समेवाभवत् ।
ततो गावोऽजायन्त ।
वडवेतराभवदश्ववृष इतरः ।
गर्दभीतरा गर्दभ इतरः ।
तां समेवाभवत् ।
तत एकशफमजायत ।
अजेतराभवद्बस्त इतरः ।
अविरितरा मेष इतरः ।
तां समेवाभवत् ।
ततोऽजावयो ऽजायन्त ।
एवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत

so heyamīkṣāṃ cakre kathaṃ nu mātmana eva janayitvā sambhavati |
hanta tiro'sānīti |
sā gaurabhavadvṛṣabha itaraḥ |
tāṃ samevābhavat |
tato gāvo'jāyanta |
vaḍavetarābhavadaśvavṛṣa itaraḥ |
gardabhītarā gardabha itaraḥ |
tāṃ samevābhavat |
tata ekaśaphamajāyata |
ajetarābhavadbasta itaraḥ |
aviritarā meṣa itaraḥ |
tāṃ samevābhavat |
tato'jāvayo 'jāyanta |
evameva yadidaṃ kiñca mithunamā pipīlikābhyastatsarvamasṛjata

उसने विचार किया, ‘मुझे अपने से ही उत्पन्न करके यह मुझसे कैसे संयुक्त होता है? मैं छिप जाऊँ।’ वह गाय बनी तो वह बैल बना; वह उससे संयुक्त हुआ और गौएँ उत्पन्न हुईं। वह घोड़ी बनी तो वह घोड़ा, वह गधी बनी तो वह गधा; वह उससे संयुक्त हुआ और एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। वह बकरी बनी तो वह बकरा, वह भेड़ बनी तो वह मेढ़ा; वह उससे संयुक्त हुआ और बकरियाँ तथा भेड़ें उत्पन्न हुईं। इसी प्रकार चींटियों तक जो भी जोड़े हैं, उन सबको उसने रचा।

1.4.5

सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहं हीदं सर्वमसृक्षीति ।
ततः सृष्टिरभवत् ।
सृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद

so'vedahaṃ vāva sṛṣṭirasmyahaṃ hīdaṃ sarvamasṛkṣīti |
tataḥ sṛṣṭirabhavat |
sṛṣṭyāṃ hāsyaitasyāṃ bhavati ya evaṃ veda

उसने जाना, ‘मैं ही यह सृष्टि हूँ, क्योंकि यह सब मैंने ही रचा है।’ इस प्रकार वह सृष्टि हुआ। जो यह जानता है, वह उसकी इस सृष्टि में स्थान पाता है।

1.4.6

अथेत्यभ्यमन्थत् ।
स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत ।
तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतः ।
अलोमका हि योनिरन्तरतः ।
तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिः ।
एष उ ह्येव सर्वे देवाः ।
अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत ।
तदु सोम ।
एतावद्वा इदं सर्वमन्नं चैवान्नादश्च ।
सोम एवान्नमग्निरन्नादः ।
सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिः ।
यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिर् ।
अतिसृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद

athetyabhyamanthat |
sa mukhācca yonerhastābhyāṃ cāgnimasṛjata |
tasmādetadubhayamalomakamantarataḥ |
alomakā hi yonirantarataḥ |
tadyadidamāhuramuṃ yajāmuṃ yajetyekaikaṃ devametasyaiva sā visṛṣṭiḥ |
eṣa u hyeva sarve devāḥ |
atha yatkiñcedamārdraṃ tadretaso'sṛjata |
tadu soma |
etāvadvā idaṃ sarvamannaṃ caivānnādaśca |
soma evānnamagnirannādaḥ |
saiṣā brahmaṇo'tisṛṣṭiḥ |
yacchreyaso devānasṛjatātha yanmartyaḥ sannamṛtānasṛjata tasmādatisṛṣṭir |
atisṛṣṭyāṃ hāsyaitasyāṃ bhavati ya evaṃ veda

फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया और मुख रूपी योनि से तथा हाथों से अग्नि को उत्पन्न किया। इसीलिए ये दोनों भीतर से रोमरहित हैं। लोग जो कहते हैं, ‘इस देवता का यजन करो, उस देवता का यजन करो’, वह सब उसी की रचना है, क्योंकि वही सब देवता है। फिर जो कुछ गीला है, उसे उसने वीर्य से रचा, वही सोम है। यह सब इतना ही है, अन्न और अन्न का भोक्ता। सोम अन्न है और अग्नि भोक्ता। यह ब्रह्मा की अतिसृष्टि है, क्योंकि उसने अपने से श्रेष्ठ देवताओं को रचा और मर्त्य होकर भी अमर देवताओं को रचा। जो यह जानता है, वह इस अतिसृष्टि में स्थान पाता है।

1.4.7

तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् ।
तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामायमिदंरूप इति ।
तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियत असौ नामायमिदंरूप इति ।
स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये ।
तं न पश्यन्ति ।
अकृत्स्नो हि सः प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति ।
वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः ।
तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव ।
स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद ।
अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति ।
आत्मेत्येवोपासीत ।
अत्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति ।
तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा ।
अनेन ह्येतत्सर्वं वेद ।
यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद

taddhedaṃ tarhyavyākṛtamāsīt |
tannāmarūpābhyāmeva vyākriyatāsau nāmāyamidaṃrūpa iti |
tadidamapyetarhi nāmarūpābhyāmeva vyākriyata asau nāmāyamidaṃrūpa iti |
sa eṣa iha praviṣṭa ā nakhāgrebhyo yathā kṣuraḥ kṣuradhāne'vahitaḥ syādviśvambharo vā viśvambharakulāye |
taṃ na paśyanti |
akṛtsno hi saḥ prāṇanneva prāṇo nāma bhavati |
vadan vākpaśyaṃścakṣuḥ śṛṇvañchrotraṃ manvāno manaḥ |
tānyasyaitāni karmanāmānyeva |
sa yo'ta ekaikamupāste na sa veda |
akṛtsno hyeṣo'ta ekaikena bhavati |
ātmetyevopāsīta |
atra hyete sarva ekaṃ bhavanti |
tadetatpadanīyamasya sarvasya yadayamātmā |
anena hyetatsarvaṃ veda |
yathā ha vai padenānuvindedevaṃ kīrtiṃ ślokaṃ vindate ya evaṃ veda

उस समय यह जगत् अव्यक्त था। वह नाम और रूप से ही व्यक्त हुआ, कि इसका यह नाम है, यह रूप है। आज भी यह नाम और रूप से ही व्यक्त होता है। वह आत्मा यहाँ नखों के अग्रभाग तक इस प्रकार प्रविष्ट है, जैसे उस्तरा अपनी म्यान में या अग्नि अपने आधार में रखी हो। लोग उसे नहीं देखते, क्योंकि अलग-अलग रूपों में वह अपूर्ण है। साँस लेते हुए वह प्राण कहलाता है, बोलते हुए वाणी, देखते हुए नेत्र, सुनते हुए श्रोत्र, मनन करते हुए मन। ये सब उसके कर्मों के नाम मात्र हैं। जो इनमें से एक-एक की उपासना करता है, वह नहीं जानता, क्योंकि एक-एक में वह अपूर्ण है। आत्मा रूप से ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इसमें ये सब एक हो जाते हैं। यह आत्मा ही इस सबका पदचिह्न है, क्योंकि इसी से यह सब जाना जाता है, जैसे खोए पशु को पदचिह्नों से खोज लेते हैं। जो यह जानता है, वह कीर्ति और यश पाता है।

1.4.8

तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा ।
स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात्प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यात् ।
आत्मानमेव प्रियमुपासीत ।
स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति

tadetatpreyaḥ putrātpreyo vittātpreyo'nyasmātsarvasmādantarataraṃ yadayamātmā |
sa yo'nyamātmanaḥ priyaṃ bruvāṇaṃ brūyātpriyaṃ rotsyatītīśvaro ha tathaiva syāt |
ātmānameva priyamupāsīta |
sa ya ātmānameva priyamupāste na hāsya priyaṃ pramāyukaṃ bhavati

यह आत्मा पुत्र से अधिक प्रिय है, धन से अधिक प्रिय है, अन्य सब कुछ से अधिक प्रिय है, क्योंकि यह सबसे भीतर है। यदि कोई आत्मा के अतिरिक्त किसी और को प्रिय कहे और दूसरा उससे कहे कि तेरा प्रिय नष्ट हो जाएगा, तो ऐसा हो भी सकता है। इसलिए आत्मा की ही प्रिय रूप में उपासना करे। जो आत्मा की ही प्रिय रूप में उपासना करता है, उसका प्रिय नष्ट नहीं होता।

1.4.9

तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ।
किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवदिति

tadāhuryadbrahmavidyayā sarvaṃ bhaviṣyanto manuṣyā manyante |
kimu tadbrahmāvedyasmāttatsarvamabhavaditi

लोग पूछते हैं: मनुष्य मानते हैं कि ब्रह्मविद्या से वे सर्व हो जाएँगे, तो उस ब्रह्म ने ऐसा क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया?

1.4.10

ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् ।
तदात्मानमेवावेत् ।
अहं ब्रह्मास्मीति ।
तस्मात्तत्सर्वमभवत् ।
तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् ।
तथर्षीनाम् ।
तथा मनुष्याणाम् ।
तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति ।
तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति ।
तस्य ह न देवाश्चनाभूत्या ईशते ।
आत्मा ह्येषां स भवति ।
अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद ।
यथा पशुरेवं स देवानाम् ।
यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्ज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्ति ।
एकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु ।
तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः

brahma vā idamagra āsīt |
tadātmānamevāvet |
ahaṃ brahmāsmīti |
tasmāttatsarvamabhavat |
tadyo yo devānāṃ pratyabudhyata sa eva tadabhavat |
tatharṣīnām |
tathā manuṣyāṇām |
taddhaitatpaśyannṛṣirvāmadevaḥ pratipede'haṃ manurabhavaṃ sūryaśceti |
tadidamapyetarhi ya evaṃ vedāhaṃ brahmāsmīti sa idaṃ sarvaṃ bhavati |
tasya ha na devāścanābhūtyā īśate |
ātmā hyeṣāṃ sa bhavati |
atha yo'nyāṃ devatāmupāste'nyo'sāvanyo'hamasmīti na sa veda |
yathā paśurevaṃ sa devānām |
yathā ha vai bahavaḥ paśavo manuṣyaṃ bhuñjyurevamekaikaḥ puruṣo devān bhunakti |
ekasminneva paśāvādīyamāne'priyaṃ bhavati kimu bahuṣu |
tasmādeṣāṃ tanna priyaṃ yadetanmanuṣyā vidyuḥ

आरम्भ में यह ब्रह्म ही था। उसने अपने को ही जाना, ‘मैं ब्रह्म हूँ’। इसी से वह सर्व हो गया। देवताओं में जिसने भी यह जाना, वह वही हो गया; ऋषियों और मनुष्यों में भी ऐसा ही हुआ। इसे देखते हुए ऋषि वामदेव ने अनुभव किया, ‘मैं मनु हुआ और मैं ही सूर्य हुआ।’ आज भी जो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ जानता है, वह यह सब हो जाता है; देवता भी उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि वह उनकी आत्मा बन जाता है। पर जो किसी अन्य देवता की उपासना यह सोचकर करता है कि वह अलग है और मैं अलग हूँ, वह नहीं जानता। वह देवताओं के लिए पशु के समान है। जैसे बहुत से पशु मनुष्य का पालन करते हैं, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य देवताओं का पालन करता है। एक पशु के छिन जाने पर भी अप्रिय लगता है, बहुतों के छिनने पर तो कहना ही क्या। इसलिए देवताओं को यह प्रिय नहीं कि मनुष्य इसे जानें।

1.4.11

ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव ।
तदेकं सन्न व्यभवत् ।
तच्छ्रेयो रूपमत्यसृजत क्षत्रं, यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति ।
तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति ।
तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियं अधस्तादुपास्ते राजसूये ।
क्षत्र एव तद्यशो दधाति ।
सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म ।
तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिम् ।
य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति ।
स पापीयान् भवति यथा श्रेयांसं हिंसित्वा

brahma vā idamagra āsīdekameva |
tadekaṃ sanna vyabhavat |
tacchreyo rūpamatyasṛjata kṣatraṃ, yānyetāni devatrā kṣatrāṇīndro varuṇaḥ somo rudraḥ parjanyo yamo mṛtyurīśāna iti |
tasmātkṣatrātparaṃ nāsti |
tasmādbrāhmaṇaḥ kṣatriyaṃ adhastādupāste rājasūye |
kṣatra eva tadyaśo dadhāti |
saiṣā kṣatrasya yoniryadbrahma |
tasmādyadyapi rājā paramatāṃ gacchati brahmaivāntata upaniśrayati svāṃ yonim |
ya u enaṃ hinasti svāṃ sa yonimṛcchati |
sa pāpīyān bhavati yathā śreyāṃsaṃ hiṃsitvā

आरम्भ में यह एक ब्रह्म ही था। एक होने से वह विकसित नहीं हुआ। उसने श्रेष्ठ रूप क्षत्र को उत्पन्न किया, अर्थात् देवताओं में जो शासक हैं: इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु और ईशान। इसलिए क्षत्र से बढ़कर कुछ नहीं, और राजसूय में ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रिय का सम्मान करता है, क्षत्र में ही वह यश स्थापित करता है। फिर भी ब्रह्म ही क्षत्र की योनि है। इसलिए राजा चाहे परम पद पा ले, अन्त में अपनी योनि ब्रह्म का ही आश्रय लेता है। जो उसकी हिंसा करता है, वह अपनी ही योनि पर प्रहार करता है और श्रेष्ठ की हिंसा करने वाले के समान अधिक पापी होता है।

1.4.12

स नैव व्यभवत् ।
स विशमसृजत ।
यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वे देवा मरुत इति

sa naiva vyabhavat |
sa viśamasṛjata |
yānyetāni devajātāni gaṇaśa ākhyāyante vasavo rudrā ādityā viśve devā maruta iti

फिर भी वह विकसित नहीं हुआ। उसने विश् को उत्पन्न किया, अर्थात् देवताओं के वे वर्ग जो समूहों में गिने जाते हैं: वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत्।

1.4.13

स नैव व्यभवत् ।
स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणम् ।
इयं वै पूषा ।
इयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च

sa naiva vyabhavat |
sa śaudraṃ varṇamasṛjata pūṣaṇam |
iyaṃ vai pūṣā |
iyaṃ hīdaṃ sarvaṃ puṣyati yadidaṃ kiñca

फिर भी वह विकसित नहीं हुआ। उसने शूद्र वर्ण पूषा को उत्पन्न किया। यह पृथ्वी ही पूषा है, क्योंकि जो कुछ है, उस सबका यही पोषण करती है।

1.4.14

स नैव व्यभवत् ।
तच्छ्रेयो रूपमत्यसृजत धर्मम् ।
तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मः ।
तस्माद्धर्मात्परं नास्ति ।
अथो अबलीयान् बलीयांसमाशंसते धर्मेण ।
यथा राज्ञैवम् ।
यो वै स धर्मः सत्यं वै तत् ।
तस्मात्सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति ।
धर्मं वा वदन्तं सत्यं वदतीति ।
एतद्ध्येवैतदुभयं भवति

sa naiva vyabhavat |
tacchreyo rūpamatyasṛjata dharmam |
tadetatkṣatrasya kṣatraṃ yaddharmaḥ |
tasmāddharmātparaṃ nāsti |
atho abalīyān balīyāṃsamāśaṃsate dharmeṇa |
yathā rājñaivam |
yo vai sa dharmaḥ satyaṃ vai tat |
tasmātsatyaṃ vadantamāhurdharmaṃ vadatīti |
dharmaṃ vā vadantaṃ satyaṃ vadatīti |
etaddhyevaitadubhayaṃ bhavati

फिर भी वह विकसित नहीं हुआ। उसने और भी श्रेष्ठ रूप धर्म को उत्पन्न किया। धर्म क्षत्र का भी क्षत्र है, इसलिए धर्म से बढ़कर कुछ नहीं। धर्म के बल से दुर्बल भी बलवान् को जीतने की आशा रखता है, जैसे राजा के सहारे। जो धर्म है, वही सत्य है। इसलिए सत्य बोलने वाले के विषय में कहते हैं कि यह धर्म बोलता है, और धर्म बोलने वाले के विषय में कि यह सत्य बोलता है। ये दोनों एक ही हैं।

1.4.15

तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्रः ।
तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु, क्षत्रियेण क्षत्रियः, वैश्येन वैश्यः, शूद्रेण शूद्रः ।
तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येषु ।
एताभ्यां हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् ।
अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतम् ।
यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एव ।
आत्मानमेव लोकमुपासीत ।
स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते ।
अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते

tadetadbrahma kṣatraṃ viṭśūdraḥ |
tadagninaiva deveṣu brahmābhavadbrāhmaṇo manuṣyeṣu, kṣatriyeṇa kṣatriyaḥ, vaiśyena vaiśyaḥ, śūdreṇa śūdraḥ |
tasmādagnāveva deveṣu lokamicchante brāhmaṇe manuṣyeṣu |
etābhyāṃ hi rūpābhyāṃ brahmābhavat |
atha yo ha vā asmāllokātsvaṃ lokamadṛṣṭvā praiti sa enamavidito na bhunakti yathā vedo vānanūkto'nyadvā karmākṛtam |
yadi ha vā apyanevaṃvinmahatpuṇyaṃ karma karoti taddhāsyāntataḥ kṣīyata eva |
ātmānameva lokamupāsīta |
sa ya ātmānameva lokamupāste na hāsya karma kṣīyate |
asmāddhyevātmano yadyatkāmayate tattatsṛjate

इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। देवताओं में ब्रह्म अग्नि के रूप में ब्राह्मण हुआ और मनुष्यों में ब्राह्मण के रूप में; क्षत्रिय से क्षत्रिय, वैश्य से वैश्य और शूद्र से शूद्र हुआ। इसलिए लोग देवताओं में अग्नि में और मनुष्यों में ब्राह्मण में लोक की कामना करते हैं, क्योंकि इन्हीं दो रूपों में ब्रह्म प्रकट हुआ। पर जो अपने लोक, आत्मा, को देखे बिना इस लोक से चला जाता है, उसे वह अज्ञात रहकर फल नहीं देता, जैसे बिना पढ़ा वेद या बिना किया कर्म। जो यह नहीं जानता, वह चाहे महान् पुण्य कर्म करे, वह अन्त में क्षीण हो ही जाता है। इसलिए आत्मा की ही लोक रूप में उपासना करे। जो ऐसा करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि इसी आत्मा से वह जो चाहता है, रच लेता है।

1.4.16

अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः ।
स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकः ।
अथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणाम् ।
अथ यत्पितृभ्यो निपृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणाम् ।
अथ यन्मनुष्यान् वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणाम् ।
अथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनाम् ।
यदस्य गृहेषु श्वापदा वयांस्या पिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोकः ।
यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेत् ।
एवं हैवंविदे सर्वदा सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति ।
तद्वा एतद्विदितं मीमांसितम्

atho ayaṃ vā ātmā sarveṣāṃ bhūtānāṃ lokaḥ |
sa yajjuhoti yadyajate tena devānāṃ lokaḥ |
atha yadanubrūte tena ṛṣīṇām |
atha yatpitṛbhyo nipṛṇāti yatprajāmicchate tena pitṝṇām |
atha yanmanuṣyān vāsayate yadebhyo'śanaṃ dadāti tena manuṣyāṇām |
atha yatpaśubhyastṛṇodakaṃ vindati tena paśūnām |
yadasya gṛheṣu śvāpadā vayāṃsyā pipīlikābhya upajīvanti tena teṣāṃ lokaḥ |
yathā ha vai svāya lokāyāriṣṭimicchet |
evaṃ haivaṃvide sarvadā sarvāṇi bhūtānyariṣṭimicchanti |
tadvā etadviditaṃ mīmāṃsitam

यह आत्मा सब प्राणियों का लोक है। वह जो हवन और यजन करता है, उससे देवताओं का लोक होता है; जो वेद का पाठ करता है, उससे ऋषियों का; जो पितरों को अर्पण करता है और सन्तान की कामना करता है, उससे पितरों का; जो मनुष्यों को आश्रय और भोजन देता है, उससे मनुष्यों का; जो पशुओं के लिए घास और जल जुटाता है, उससे पशुओं का; और उसके घर में जो वन्य जीव, पक्षी और चींटियों तक के प्राणी जीते हैं, उनका भी वह लोक है। जैसे मनुष्य अपने लोक का कुशल चाहता है, वैसे ही सब प्राणी ऐसा जानने वाले का सदा कुशल चाहते हैं। यह जाना और विचारा हुआ है।

1.4.17

आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव ।
सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेय ।
अथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति ।
एतावान् वै कामः ।
नेच्छंश्चनातो भूयो विन्देत् ।
तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति ।
स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते ।
तस्यो कृत्स्नता ।
मन एवास्यात्मा ।
वाग्जाया ।
प्राणः प्रजा ।
चक्षुर्मानुषं वित्तम् ।
चक्षुषा हि तद्विन्दते ।
श्रोत्रं दैवम् ।
श्रोत्रेण हि तच्छृणोति ।
आत्मैवास्य कर्म ।
आत्मना हि कर्म करोति ।
स एष पाङ्क्तो यज्ञः ।
पाङ्क्तः पशुः ।
पाङ्क्तः पुरुषः ।
पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च ।
तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद

ātmaivedamagra āsīdeka eva |
so'kāmayata jāyā me syādatha prajāyeya |
atha vittaṃ me syādatha karma kurvīyeti |
etāvān vai kāmaḥ |
necchaṃścanāto bhūyo vindet |
tasmādapyetarhyekākī kāmayate jāyā me syādatha prajāyeyātha vittaṃ me syādatha karma kurvīyeti |
sa yāvadapyeteṣāmekaikaṃ na prāpnotyakṛtsna eva tāvanmanyate |
tasyo kṛtsnatā |
mana evāsyātmā |
vāgjāyā |
prāṇaḥ prajā |
cakṣurmānuṣaṃ vittam |
cakṣuṣā hi tadvindate |
śrotraṃ daivam |
śrotreṇa hi tacchṛṇoti |
ātmaivāsya karma |
ātmanā hi karma karoti |
sa eṣa pāṅkto yajñaḥ |
pāṅktaḥ paśuḥ |
pāṅktaḥ puruṣaḥ |
pāṅktamidaṃ sarvaṃ yadidaṃ kiñca |
tadidaṃ sarvamāpnoti ya evaṃ veda

आरम्भ में यह एक आत्मा ही था। उसने कामना की, ‘मेरी पत्नी हो, जिससे सन्तान हो; मेरे पास धन हो, जिससे मैं कर्म करूँ।’ कामना इतनी ही है; चाहकर भी इससे अधिक नहीं मिलता। इसीलिए आज भी अकेला व्यक्ति पत्नी, सन्तान, धन और कर्म की कामना करता है, और जब तक इनमें से एक-एक न मिल जाए, अपने को अपूर्ण मानता है। उसकी पूर्णता यह है: मन उसकी आत्मा है, वाणी पत्नी, प्राण सन्तान, नेत्र मानुष धन, क्योंकि नेत्र से ही वह उसे पाता है, श्रोत्र दैव धन, क्योंकि श्रोत्र से ही वह उसे सुनता है, और शरीर ही उसका कर्म, क्योंकि शरीर से ही वह कर्म करता है। इसलिए यज्ञ पाँच भागों वाला है, पशु पाँच भागों वाला है, पुरुष पाँच भागों वाला है, और जो कुछ है, वह सब पाँच भागों वाला है। जो यह जानता है, वह यह सब पा लेता है।

1.5.1

(सप्तान्नब्राह्मणं वा संवर्गविद्याब्राह्मणम्)
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता ।
एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् ।
त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् ।
तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न ।
कस्मात्तानि न क्षीयन्ते अद्यमानानि सर्वदा ।
यो वै तामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन ।
स देवानपिगच्छति स ऊऋजमुपजीवति ।
इति श्लोकाः

(saptānnabrāhmaṇaṃ vā saṃvargavidyābrāhmaṇam)
yatsaptānnāni medhayā tapasājanayatpitā |
ekamasya sādhāraṇaṃ dve devānabhājayat |
trīṇyātmane'kuruta paśubhya ekaṃ prāyacchat |
tasmin sarvaṃ pratiṣṭhitaṃ yacca prāṇiti yacca na |
kasmāttāni na kṣīyante adyamānāni sarvadā |
yo vai tāmakṣitiṃ veda so'nnamatti pratīkena |
sa devānapigacchati sa ūṛjamupajīvati |
iti ślokāḥ

ये श्लोक हैं: ‘पिता प्रजापति ने मेधा और तप से जो सात अन्न उत्पन्न किए, उनमें एक सबके लिए साधारण रखा, दो देवताओं को बाँटे, तीन अपने लिए रखे और एक पशुओं को दिया। उसी में सब प्रतिष्ठित है, जो साँस लेता है और जो नहीं लेता। सदा खाए जाने पर भी वे क्षीण क्यों नहीं होते? जो उस अक्षय भाव को जानता है, वह मुख से अन्न खाता है। वह देवताओं को प्राप्त होता है और ऊर्जा पर जीता है।’

1.5.2

यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पितेति ।
मेधया हि तपसाजनयत्पितैकमस्य साधारणमिति ।
इदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते ।
स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते ।
मिश्रं ह्येतत् ।
द्वे देवानभाजयदिति ।
हुतं च प्रहुतं च ।
तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वति ।
अथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति ।
तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् ।
पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति ।
तत्पयः ।
पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति ।
तस्मात्कुमारं जातं घृतं वैवाग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वानुधापयन्ति ।
अथ वत्सं जातमाहुस्तृणादिति ।
तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति ।
पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न ।
तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति ।
न तथा विद्यात् ।
यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् ।
सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति ।
कस्मात्तानि न क्षीयन्ते अद्यमानानि सर्वदेति ।
पुरुषो वा अक्षितिः ।
स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते ।
यो वैतामक्षितिं वेदेति ।
पुरुषो वा अक्षितिः ।
स हीदमन्नं धियाधिया जनयते कर्मभिः ।
यद्धैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह ।
सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति ।
मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत् ।
स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा

yatsaptānnāni medhayā tapasājanayatpiteti |
medhayā hi tapasājanayatpitaikamasya sādhāraṇamiti |
idamevāsya tatsādhāraṇamannaṃ yadidamadyate |
sa ya etadupāste na sa pāpmano vyāvartate |
miśraṃ hyetat |
dve devānabhājayaditi |
hutaṃ ca prahutaṃ ca |
tasmāddevebhyo juhvati ca pra ca juhvati |
atho āhurdarśapūrṇamāsāviti |
tasmānneṣṭiyājukaḥ syāt |
paśubhya ekaṃ prāyacchaditi |
tatpayaḥ |
payo hyevāgre manuṣyāśca paśavaścopajīvanti |
tasmātkumāraṃ jātaṃ ghṛtaṃ vaivāgre pratilehayanti stanaṃ vānudhāpayanti |
atha vatsaṃ jātamāhustṛṇāditi |
tasmin sarvaṃ pratiṣṭhitaṃ yacca prāṇiti yacca neti |
payasi hīdaṃ sarvaṃ pratiṣṭhitaṃ yacca prāṇiti yacca na |
tadyadidamāhuḥ saṃvatsaraṃ payasā juhvadapa punarmṛtyuṃ jayatīti |
na tathā vidyāt |
yadahareva juhoti tadahaḥ punarmṛtyumapajayatyevaṃ vidvān |
sarvaṃ hi devebhyo'nnādyaṃ prayacchati |
kasmāttāni na kṣīyante adyamānāni sarvadeti |
puruṣo vā akṣitiḥ |
sa hīdamannaṃ punaḥ punarjanayate |
yo vaitāmakṣitiṃ vedeti |
puruṣo vā akṣitiḥ |
sa hīdamannaṃ dhiyādhiyā janayate karmabhiḥ |
yaddhaitanna kuryātkṣīyeta ha |
so'nnamatti pratīkeneti |
mukhaṃ pratīkaṃ mukhenetyetat |
sa devānapigacchati sa ūrjamupajīvatīti praśaṃsā

पिता ने मेधा और तप से सात अन्न उत्पन्न किए। ‘एक सबके लिए साधारण रखा’, यह वह अन्न है जो सब खाते हैं। जो केवल इसकी उपासना करता है, वह पाप से नहीं छूटता, क्योंकि यह मिश्रित है। ‘दो देवताओं को बाँटे’, ये हुत और प्रहुत हैं, इसलिए लोग देवताओं के लिए हवन भी करते हैं और भेंट भी; कुछ इन्हें दर्श और पूर्णमास कहते हैं, इसलिए केवल फल के लिए इष्टि न करे। ‘एक पशुओं को दिया’, वह दूध है, क्योंकि मनुष्य और पशु पहले दूध पर ही जीते हैं। इसीलिए नवजात शिशु को पहले घी चटाते या स्तन पिलाते हैं, और नवजात बछड़े को ‘अतृणाद’ कहते हैं। ‘उसी में सब प्रतिष्ठित है’, क्योंकि सब दूध में प्रतिष्ठित है। लोग कहते हैं कि वर्ष भर दूध से हवन करके पुनर्मृत्यु जीती जाती है, पर ऐसा न माने; ज्ञानी जिस दिन हवन करता है, उसी दिन पुनर्मृत्यु को जीत लेता है। ‘वे क्षीण क्यों नहीं होते?’ क्योंकि पुरुष अक्षय है, वह बुद्धि और कर्म से इस अन्न को बार-बार उत्पन्न करता है। ‘वह मुख से अन्न खाता है’ और ‘ऊर्जा पर जीता है’, यह प्रशंसा है।

1.5.3

त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति
मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुत ।
अन्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति ।
कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव ।
तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति ।
यः कश्च शब्दो वागेव सा ।
एषा ह्यन्तं आयत्तैषा हि न ।
प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एव ।
एतन्मयो वा अयमात्मा ।
वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः

trīṇyātmane'kuruteti
mano vācaṃ prāṇaṃ tānyātmane'kuruta |
anyatramanā abhūvaṃ nādarśamanyatramanā abhūvaṃ nāśrauṣamiti manasā hyeva paśyati manasā śṛṇoti |
kāmaḥ saṃkalpo vicikitsā śraddhāśraddhā dhṛtiradhṛtirhrīrdhīrbhīrityetatsarvaṃ mana eva |
tasmādapi pṛṣṭhata upaspṛṣṭo manasā vijānāti |
yaḥ kaśca śabdo vāgeva sā |
eṣā hyantaṃ āyattaiṣā hi na |
prāṇo'pāno vyāna udānaḥ samāno'na ityetatsarvaṃ prāṇa eva |
etanmayo vā ayamātmā |
vāṅmayo manomayaḥ prāṇamayaḥ

‘तीन अपने लिए रखे’, ये मन, वाणी और प्राण हैं। लोग कहते हैं, ‘मेरा मन कहीं और था, मैंने नहीं देखा; मेरा मन कहीं और था, मैंने नहीं सुना’, क्योंकि मन से ही देखा और मन से ही सुना जाता है। काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, बुद्धि और भय, यह सब मन ही है। इसीलिए पीछे से छूने पर भी मन से ही जान लेते हैं। जो भी शब्द है, वह वाणी है, क्योंकि वह वस्तु का बोध कराती है पर स्वयं किसी और से प्रकाशित नहीं होती। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन, यह सब प्राण ही है। यह आत्मा इन्हीं से बना है, वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय।

1.5.4

त्रयो लोका एत एव ।
वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः

trayo lokā eta eva |
vāgevāyaṃ loko mano'ntarikṣalokaḥ prāṇo'sau lokaḥ

ये ही तीन लोक हैं। वाणी यह लोक है, मन अन्तरिक्ष लोक है और प्राण वह द्युलोक है।

1.5.5

त्रयो वेदा एत एव ।
वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः

trayo vedā eta eva |
vāgevargvedo mano yajurvedaḥ prāṇaḥ sāmavedaḥ

ये ही तीन वेद हैं। वाणी ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है।

1.5.6

देवा पितरो मनुष्या एत एव ।
वागेव देवा मनः पितरः, प्राणो मानुष्याः

devā pitaro manuṣyā eta eva |
vāgeva devā manaḥ pitaraḥ, prāṇo mānuṣyāḥ

ये ही देवता, पितर और मनुष्य हैं। वाणी देवता है, मन पितर हैं और प्राण मनुष्य हैं।

1.5.7

पिता माता प्रजैत एव ।
मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा

pitā mātā prajaita eva |
mana eva pitā vāṅmātā prāṇaḥ prajā

ये ही पिता, माता और सन्तान हैं। मन पिता है, वाणी माता है और प्राण सन्तान है।

1.5.8

विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव ।
यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपम् ।
वाग्घि विज्ञाता ।
वागेनं तद्भूत्वावति

vijñātaṃ vijijñāsyamavijñātameta eva |
yatkiñca vijñātaṃ vācastadrūpam |
vāgghi vijñātā |
vāgenaṃ tadbhūtvāvati

ये ही ज्ञात, जिज्ञास्य और अज्ञात हैं। जो कुछ ज्ञात है, वह वाणी का रूप है, क्योंकि वाणी ज्ञात है। वाणी वही बनकर ऐसा जानने वाले की रक्षा करती है।

1.5.9

यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपम् ।
मनो हि विजिज्ञास्यम् ।
मन एनं तद्भूत्वावति

yatkiñca vijijñāsyaṃ manasastadrūpam |
mano hi vijijñāsyam |
mana enaṃ tadbhūtvāvati

जो कुछ जानने योग्य है, वह मन का रूप है, क्योंकि मन जिज्ञास्य है। मन वही बनकर उसकी रक्षा करता है।

1.5.10

यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपम् ।
प्राणो ह्यविज्ञातः ।
प्राण एनं तद्भूत्वावति

yatkiñcāvijñātaṃ prāṇasya tadrūpam |
prāṇo hyavijñātaḥ |
prāṇa enaṃ tadbhūtvāvati

जो कुछ अज्ञात है, वह प्राण का रूप है, क्योंकि प्राण अज्ञात है। प्राण वही बनकर उसकी रक्षा करता है।

1.5.11

तस्यै वाचः पृथिवी शरीरम् ।
ज्योतीरूपमयमग्निः ।
तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः

tasyai vācaḥ pṛthivī śarīram |
jyotīrūpamayamagniḥ |
tadyāvatyeva vāktāvatī pṛthivī tāvānayamagniḥ

पृथ्वी उस वाणी का शरीर है और यह अग्नि उसका ज्योतिर्मय रूप है। जितनी वाणी है, उतनी ही पृथ्वी है और उतनी ही यह अग्नि।

1.5.12

अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरम् ।
ज्योतीरूपमसावादित्यः ।
तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यः ।
तौ मिथुनं समैताम् ।
ततः प्राणोऽजायत ।
स इन्द्रः ।
स एषोऽसपत्नः ।
द्वितीयो वै सपत्नः ।
नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद

athaitasya manaso dyauḥ śarīram |
jyotīrūpamasāvādityaḥ |
tadyāvadeva manastāvatī dyaustāvānasāvādityaḥ |
tau mithunaṃ samaitām |
tataḥ prāṇo'jāyata |
sa indraḥ |
sa eṣo'sapatnaḥ |
dvitīyo vai sapatnaḥ |
nāsya sapatno bhavati ya evaṃ veda

द्युलोक इस मन का शरीर है और वह सूर्य उसका ज्योतिर्मय रूप है। जितना मन है, उतना ही द्युलोक है और उतना ही वह सूर्य। ये दोनों संयुक्त हुए, उनसे प्राण उत्पन्न हुआ। वही इन्द्र है, और वह शत्रुरहित है, क्योंकि दूसरा ही शत्रु होता है। जो यह जानता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता।

1.5.13

अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरम् ।
ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः ।
तद्यावानेव प्राणस्तावत्य आपस्तावानसौ चन्द्रः ।
त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः ।
स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तं स लोकं जयति ।
अथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्तं स लोकं जयति

athaitasya prāṇasyāpaḥ śarīram |
jyotīrūpamasau candraḥ |
tadyāvāneva prāṇastāvatya āpastāvānasau candraḥ |
ta ete sarva eva samāḥ sarve'nantāḥ |
sa yo haitānantavata upāste'ntavantaṃ sa lokaṃ jayati |
atha yo haitānanantānupāste'nantaṃ sa lokaṃ jayati

जल इस प्राण का शरीर है और वह चन्द्रमा उसका ज्योतिर्मय रूप है। जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा। ये सब समान हैं और सब अनन्त हैं। जो इन्हें सीमित मानकर उपासना करता है, वह सीमित लोक जीतता है; जो इन्हें अनन्त मानकर उपासना करता है, वह अनन्त लोक जीतता है।

1.5.14

स एष संवत्सरः प्रजापतिष्षोडशकलः ।
तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला ।
ध्रुवैवास्य षोडशी कला ।
स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते ।
सोऽमावास्यां रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते ।
तस्मादेतां रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै

sa eṣa saṃvatsaraḥ prajāpatiṣṣoḍaśakalaḥ |
tasya rātraya eva pañcadaśa kalā |
dhruvaivāsya ṣoḍaśī kalā |
sa rātribhirevā ca pūryate'pa ca kṣīyate |
so'māvāsyāṃ rātrimetayā ṣoḍaśyā kalayā sarvamidaṃ prāṇabhṛdanupraviśya tataḥ prātarjāyate |
tasmādetāṃ rātriṃ prāṇabhṛtaḥ prāṇaṃ na vicchindyādapi kṛkalāsasyaitasyā eva devatāyā apacityai

यह संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओं वाला है। रात्रियाँ उसकी पन्द्रह कलाएँ हैं और सोलहवीं कला ध्रुव है। रात्रियों से ही वह बढ़ता और घटता है। अमावस्या की रात वह इस सोलहवीं कला से सब प्राणधारियों में प्रवेश करता है और वहाँ से प्रातः फिर जन्म लेता है। इसलिए उस रात इस देवता के सम्मान में किसी प्राणी का, गिरगिट तक का, प्राण न ले।

1.5.15

यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषः ।
तस्य वित्तमेव पञ्चदश कलाः ।
आत्मैवास्य षोडशी कला ।
स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते ।
तदेतन्नभ्यं यदयमात्मा ।
प्रधिर्वित्तम् ।
तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनागादित्येवाहुः

yo vai sa saṃvatsaraḥ prajāpatiḥ ṣoḍaśakalo'yameva sa yo'yamevaṃvitpuruṣaḥ |
tasya vittameva pañcadaśa kalāḥ |
ātmaivāsya ṣoḍaśī kalā |
sa vittenaivā ca pūryate'pa ca kṣīyate |
tadetannabhyaṃ yadayamātmā |
pradhirvittam |
tasmādyadyapi sarvajyāniṃ jīyata ātmanā cejjīvati pradhināgādityevāhuḥ

जो सोलह कलाओं वाला संवत्सर प्रजापति है, वही यह पुरुष है जो ऐसा जानता है। धन उसकी पन्द्रह कलाएँ हैं और आत्मा सोलहवीं कला। वह धन से ही बढ़ता और घटता है। आत्मा पहिए की नाभि है और धन उसकी परिधि। इसलिए यदि किसी का सब कुछ चला जाए पर वह स्वयं जीवित रहे, तो लोग कहते हैं कि इसकी केवल परिधि गई है।

1.5.16

अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति ।
सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा ।
कर्मणा पितृलोकः ।
विद्यया देवलोकः ।
देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठः ।
तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति

atha trayo vāva lokā manuṣyalokaḥ pitṛloko devaloka iti |
so'yaṃ manuṣyalokaḥ putreṇaiva jayyo nānyena karmaṇā |
karmaṇā pitṛlokaḥ |
vidyayā devalokaḥ |
devaloko vai lokānāṃ śreṣṭhaḥ |
tasmādvidyāṃ praśaṃsanti

तीन ही लोक हैं: मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक। यह मनुष्यलोक केवल पुत्र से जीता जाता है, किसी अन्य कर्म से नहीं; पितृलोक कर्म से और देवलोक विद्या से। देवलोक सब लोकों में श्रेष्ठ है, इसीलिए विद्या की प्रशंसा की जाती है।

1.5.17

अथातः सम्प्रत्तिः ।
यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति ।
स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति ।
यद्वै किञ्चानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता ।
ये वै के च यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ।
ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकता ।
एतावद्वा इदं सर्वम् ।
एतन्मा सर्वं सन्नयमितो भुनजदिति ।
तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुः ।
तस्मादेनमनुशासति ।
स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति ।
स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णया कृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम ।
स पुत्रेणैवास्मिल्लोके प्रतितिष्ठति ।
अथैनमेते देवाः प्राणा अमृता आविशन्ति

athātaḥ samprattiḥ |
yadā praiṣyanmanyate'tha putramāha tvaṃ brahma tvaṃ yajñastvaṃ loka iti |
sa putraḥ pratyāhāhaṃ brahmāhaṃ yajño'haṃ loka iti |
yadvai kiñcānūktaṃ tasya sarvasya brahmetyekatā |
ye vai ke ca yajñāsteṣāṃ sarveṣāṃ yajña ityekatā |
ye vai ke ca lokāsteṣāṃ sarveṣāṃ loka ityekatā |
etāvadvā idaṃ sarvam |
etanmā sarvaṃ sannayamito bhunajaditi |
tasmātputramanuśiṣṭaṃ lokyamāhuḥ |
tasmādenamanuśāsati |
sa yadaivaṃvidasmāllokātpraityathaibhireva prāṇaiḥ saha putramāviśati |
sa yadyanena kiñcidakṣṇayā kṛtaṃ bhavati tasmādenaṃ sarvasmātputro muñcati tasmātputro nāma |
sa putreṇaivāsmilloke pratitiṣṭhati |
athainamete devāḥ prāṇā amṛtā āviśanti

अब सम्प्रत्ति कही जाती है। जब पिता समझता है कि वह जाने वाला है, तब पुत्र से कहता है, ‘तुम ब्रह्म हो, तुम यज्ञ हो, तुम लोक हो।’ पुत्र उत्तर देता है, ‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।’ जो कुछ पढ़ा गया है, वह सब ‘ब्रह्म’ शब्द में एक है; सब यज्ञ ‘यज्ञ’ शब्द में एक हैं; सब लोक ‘लोक’ शब्द में एक हैं। यह सब इतना ही है। पिता सोचता है, ‘यह सब होकर यह मेरा यहाँ से पालन करेगा।’ इसलिए शिक्षित पुत्र को लोक दिलाने वाला कहते हैं, और इसीलिए उसे शिक्षा देते हैं। ऐसा जानने वाला पिता जब इस लोक से जाता है, तो इन्हीं प्राणों के साथ पुत्र में प्रवेश करता है। उससे जो कुछ भूल हुई हो, पुत्र उससे उसे मुक्त करता है, इसीलिए वह पुत्र कहलाता है। पुत्र के द्वारा वह इस लोक में प्रतिष्ठित रहता है, और ये दिव्य अमर प्राण उसमें प्रवेश करते हैं।

1.5.18

पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति ।
सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति

pṛthivyai cainamagneśca daivī vāgāviśati |
sā vai daivī vāgyayā yadyadeva vadati tattadbhavati

पृथ्वी और अग्नि से दिव्य वाणी उसमें प्रवेश करती है। दिव्य वाणी वह है जिससे वह जो कुछ कहता है, वही हो जाता है।

1.5.19

दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति ।
तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति

divaścainamādityācca daivaṃ mana āviśati |
tadvai daivaṃ mano yenānandyeva bhavatyatho na śocati

द्युलोक और आदित्य से दिव्य मन उसमें प्रवेश करता है। दिव्य मन वह है जिससे वह सदा आनन्दित रहता है और कभी शोक नहीं करता।

1.5.20

अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति ।
स वै दैवः प्राणो यः संचरंश्चासंचरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति ।
स एष एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति ।
यथैषा देवतैवं सः ।
यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति ।
यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति ।
पुण्यमेवामुं गच्छति ।
न ह वै देवान् पापं गच्छति

adbhyaścainaṃ candramasaśca daivaḥ prāṇa āviśati |
sa vai daivaḥ prāṇo yaḥ saṃcaraṃścāsaṃcaraṃśca na vyathate'tho na riṣyati |
sa eṣa evaṃvitsarveṣāṃ bhūtānāmātmā bhavati |
yathaiṣā devataivaṃ saḥ |
yathaitāṃ devatāṃ sarvāṇi bhūtānyavantyevaṃ haivaṃvidaṃ sarvāṇi bhūtānyavanti |
yadu kiñcemāḥ prajāḥ śocantyamaivāsāṃ tadbhavati |
puṇyamevāmuṃ gacchati |
na ha vai devān pāpaṃ gacchati

जल और चन्द्रमा से दिव्य प्राण उसमें प्रवेश करता है। दिव्य प्राण वह है जो चलते हुए या स्थिर रहते हुए न व्यथित होता है, न नष्ट होता है। ऐसा जानने वाला सब प्राणियों का आत्मा हो जाता है। जैसा यह देवता है, वैसा ही वह होता है। जैसे सब प्राणी इस देवता की रक्षा और सम्मान करते हैं, वैसे ही ऐसा जानने वाले का करते हैं। ये प्रजाएँ जो भी शोक करती हैं, वह उन्हीं के साथ रहता है; उसके पास केवल पुण्य जाता है, क्योंकि देवताओं तक पाप नहीं पहुँचता।

1.5.21

अथातो व्रतमीमांसा ।
प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे ।
तानि सृष्टान्यन्योऽन्येनास्पर्धन्त ।
वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दध्रे ।
द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः ।
श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम् ।
एवमन्यानि कर्माणि यथाकर्मम् ।
तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे ।
तान्याप्नोत् ।
तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध ।
तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् ।
श्राम्यति चक्षुः ।
श्राम्यति श्रोत्रम् ।
अथेममेव नाप्नोत्योऽयं मध्यमः प्राणः ।
तानि ज्ञातुं दध्रिरे ।
अयं वै नः श्रेष्ठो यः संचरंश्चासंचरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति ।
हन्तास्यैव सर्वे रूपं भवामेति ।
त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन् ।
तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति ।
तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन् कुले भवति य एवं वेद ।
य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यति ।
अनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम्

athāto vratamīmāṃsā |
prajāpatirha karmāṇi sasṛje |
tāni sṛṣṭānyanyo'nyenāspardhanta |
vadiṣyāmyevāhamiti vāgdadhre |
drakṣyāmyahamiti cakṣuḥ |
śroṣyāmyahamiti śrotram |
evamanyāni karmāṇi yathākarmam |
tāni mṛtyuḥ śramo bhūtvopayeme |
tānyāpnot |
tānyāptvā mṛtyuravārundha |
tasmācchrāmyatyeva vāk |
śrāmyati cakṣuḥ |
śrāmyati śrotram |
athemameva nāpnotyo'yaṃ madhyamaḥ prāṇaḥ |
tāni jñātuṃ dadhrire |
ayaṃ vai naḥ śreṣṭho yaḥ saṃcaraṃścāsaṃcaraṃśca na vyathate'tho na riṣyati |
hantāsyaiva sarve rūpaṃ bhavāmeti |
ta etasyaiva sarve rūpamabhavan |
tasmādeta etenākhyāyante prāṇā iti |
tena ha vāva tatkulamācakṣate yasmin kule bhavati ya evaṃ veda |
ya u haivaṃvidā spardhate'nuśuṣyati |
anuśuṣya haivāntato mriyata ityadhyātmam

अब व्रतों का विचार। प्रजापति ने इन्द्रियों के कर्मों को रचा। रचे जाने पर वे आपस में होड़ करने लगे। वाणी ने व्रत लिया, ‘मैं बोलूँगी’; नेत्र ने, ‘मैं देखूँगा’; श्रोत्र ने, ‘मैं सुनूँगा’; इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों ने अपने-अपने कर्म के अनुसार। मृत्यु ने थकान बनकर उन्हें पकड़ लिया, उन्हें व्याप लिया और रोक दिया। इसीलिए वाणी थकती है, नेत्र थकता है, श्रोत्र थकता है। पर इस मध्यम प्राण को मृत्यु नहीं पकड़ पाई। उन्होंने इसे जानने का निश्चय किया और कहा, ‘यही हममें श्रेष्ठ है, जो चलते हुए या स्थिर रहते हुए न व्यथित होता है, न नष्ट होता है। आओ, हम सब इसी का रूप बन जाएँ।’ वे सब इसी का रूप बन गए, इसीलिए वे इसी नाम से प्राण कहलाते हैं। जो यह जानता है, जिस कुल में वह होता है, वह कुल उसी के नाम से जाना जाता है। जो ऐसे ज्ञानी से होड़ करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्त में मर जाता है। यह अध्यात्म है।

1.5.22

अथाधिदेवतं
ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे ।
तप्स्याम्यहमित्यादित्यः ।
भास्याम्यहमिति चन्द्रमाः ।
एवमन्या देवता यथादेवतम् ।
स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुः ।
म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः ।
सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः

athādhidevataṃ
jvaliṣyāmyevāhamityagnirdadhre |
tapsyāmyahamityādityaḥ |
bhāsyāmyahamiti candramāḥ |
evamanyā devatā yathādevatam |
sa yathaiṣāṃ prāṇānāṃ madhyamaḥ prāṇa evametāsāṃ devatānāṃ vāyuḥ |
mlocanti hyanyā devatā na vāyuḥ |
saiṣānastamitā devatā yadvāyuḥ

अब अधिदैवत। अग्नि ने व्रत लिया, ‘मैं जलूँगा’; आदित्य ने, ‘मैं तपूँगा’; चन्द्रमा ने, ‘मैं प्रकाशित होऊँगा’; इसी प्रकार अन्य देवताओं ने अपने-अपने स्वभाव के अनुसार। जैसे इन्द्रियों में मध्यम प्राण है, वैसे ही इन देवताओं में वायु है। अन्य देवता अस्त होते हैं, वायु नहीं। वायु वह देवता है जो कभी अस्त नहीं होता।

1.5.23

अथैष श्लोको भवति
यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति ।
प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति ।
तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्व इति ।
यद्वा एतेऽमुर्ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति ।
तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापान्याच्च ।
नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नवदिति ।
यद्यु चरेत्समापिपयिषेत्तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यं सलोकतां जयति

athaiṣa śloko bhavati
yataścodeti sūryo'staṃ yatra ca gacchatīti |
prāṇādvā eṣa udeti prāṇe'stameti |
taṃ devāścakrire dharmaṃ sa evādya sa u śva iti |
yadvā ete'murhyadhriyanta tadevāpyadya kurvanti |
tasmādekameva vrataṃ caretprāṇyāccaivāpānyācca |
nenmā pāpmā mṛtyurāpnavaditi |
yadyu caretsamāpipayiṣetteno etasyai devatāyai sāyujyaṃ salokatāṃ jayati

इस विषय में यह श्लोक है: ‘जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ अस्त होता है।’ यह प्राण से ही उदय होता है और प्राण में ही अस्त होता है। ‘देवताओं ने उसे अपना धर्म बनाया, वही आज है और वही कल।’ जो व्रत उन्होंने तब धारण किया, वही आज भी करते हैं। इसलिए एक ही व्रत का पालन करे, प्राण लेना और अपान करना, कि पाप रूपी मृत्यु मुझे न पकड़े। यदि इसका पालन करे तो इसे पूर्ण करने की इच्छा रखे। इससे वह इस देवता का सायुज्य और सालोक्य पाता है।

1.6.1

(त्र्यन्नब्राह्मणं वा अविद्याविषयसंसारतत्त्वप्रदर्शकं ब्राह्मणं वा उपसंहारब्राह्मणम्)
त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म ।
तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थम् ।
अतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति ।
एतदेषां साम ।
एतद्धि सर्वैर्नामभिः समम् ।
एतदेषां ब्रह्म ।
एतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति

(tryannabrāhmaṇaṃ vā avidyāviṣayasaṃsāratattvapradarśakaṃ brāhmaṇaṃ vā upasaṃhārabrāhmaṇam)
trayaṃ vā idaṃ nāma rūpaṃ karma |
teṣāṃ nāmnāṃ vāgityetadeṣāmuktham |
ato hi sarvāṇi nāmānyuttiṣṭhanti |
etadeṣāṃ sāma |
etaddhi sarvairnāmabhiḥ samam |
etadeṣāṃ brahma |
etaddhi sarvāṇi nāmāni bibharti

यह जगत् तीन ही है: नाम, रूप और कर्म। नामों का उक्थ अर्थात् उद्गम वाणी है, क्योंकि इसी से सब नाम उठते हैं। यही उनका साम है, क्योंकि यह सब नामों में समान है। यही उनका ब्रह्म है, क्योंकि यह सब नामों को धारण करती है।

1.6.2

अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थम् ।
अतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्ति ।
एतदेषां साम ।
एतद्धि सर्वै रूपैः समम् ।
एतदेषां ब्रह्म ।
एतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति

atha rūpāṇāṃ cakṣurityetadeṣāmuktham |
ato hi sarvāṇi rūpāṇyuttiṣṭhanti |
etadeṣāṃ sāma |
etaddhi sarvai rūpaiḥ samam |
etadeṣāṃ brahma |
etaddhi sarvāṇi rūpāṇi bibharti

रूपों का उक्थ नेत्र है, क्योंकि इसी से सब रूप उठते हैं। यही उनका साम है, क्योंकि यह सब रूपों में समान है। यही उनका ब्रह्म है, क्योंकि यह सब रूपों को धारण करता है।

1.6.3

अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थम् ।
अतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्ति ।
एतदेषां साम ।
एतद्धि सर्वैः कर्मभिः समम् ।
एतदेषां ब्रह्म ।
एतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति ।
तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्मा ।
आत्मो एकः सन्नेतत्त्रयम् ।
तदेतदमृतं सत्येन छन्नम् ।
प्राणो वा अमृतम् ।
नामरूपे सत्यम् ।
ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः

atha karmaṇāmātmetyetadeṣāmuktham |
ato hi sarvāṇi karmāṇyuttiṣṭhanti |
etadeṣāṃ sāma |
etaddhi sarvaiḥ karmabhiḥ samam |
etadeṣāṃ brahma |
etaddhi sarvāṇi karmāṇi bibharti |
tadetattrayaṃ sadekamayamātmā |
ātmo ekaḥ sannetattrayam |
tadetadamṛtaṃ satyena channam |
prāṇo vā amṛtam |
nāmarūpe satyam |
tābhyāmayaṃ prāṇaśchannaḥ

कर्मों का उक्थ शरीर है, क्योंकि इसी से सब कर्म उठते हैं। यही उनका साम है, क्योंकि यह सब कर्मों में समान है। यही उनका ब्रह्म है, क्योंकि यह सब कर्मों को धारण करता है। ये तीनों मिलकर एक हैं, यह आत्मा; और आत्मा एक होकर ये तीन है। यह अमृत सत्य से ढका है। प्राण अमृत है, नाम और रूप सत्य हैं। इन दोनों से यह प्राण ढका हुआ है।

1.81

इति बृहदारण्यकोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः ॥

iti bṛhadāraṇyakopaniṣadi prathamo'dhyāyaḥ ||

इस प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ।

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