ऐतरेयोपनिषद्

अध्याय 3: प्रज्ञानं ब्रह्म: चेतना ही ब्रह्म है

4 श्लोक · 3 में से 3

इस अध्याय में क्या होता है

प्रज्ञानं ब्रह्म: चेतना ही ब्रह्म है

यह आत्मा कौन है, जिसकी हम उपासना करते हैं? कौन-सा आत्मा है? क्या वह, जिससे मनुष्य देखता, सुनता, सूँघता, बोलता और मीठे-कड़वे का भेद करता है? अध्याय हृदय और मन की सब वृत्तियाँ गिनाता है: संज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञा, दृष्टि, स्मृति, संकल्प, क्रतु, काम आदि। ये सब प्रज्ञान के ही नाम हैं। यही प्रज्ञान ब्रह्मा है, इन्द्र है, प्रजापति है, सब देवता हैं, पाँच महाभूत हैं, अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज सब प्राणी हैं, घोड़े, गाय, मनुष्य, हाथी, और जो कुछ साँस लेता, चलता, उड़ता या स्थिर है। सब प्रज्ञा से चलता है और प्रज्ञा में टिका है। लोक प्रज्ञा-नेत्र है; प्रज्ञानं ब्रह्म। इसी प्रज्ञ आत्मा के साथ ज्ञानी इस लोक से उठकर, स्वर्ग में सब कामनाएँ पाकर अमृत हुआ।

3.1

कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति

ko'yamātmeti vayamupāsmahe kataraḥ sa ātmā | yena vā paśyati yena vā śṛṇoti yena vā gandhānājighrati yena vā vācaṃ vyākaroti yena vā svādu cāsvādu ca vijānāti

यह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं? वह आत्मा कौन सा है? क्या वह, जिससे मनुष्य देखता है, सुनता है, गन्ध सूँघता है, वाणी बोलता है, या जिससे स्वादु और अस्वादु को जानता है?

3.2

यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । सञ्ज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिधृर्तिमतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति । सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति

yadetaddhṛdayaṃ manaścaitat | sañjñānamājñānaṃ vijñānaṃ prajñānaṃ medhā dṛṣṭidhṛrtimatirmanīṣā jūtiḥ smṛtiḥ saṅkalpaḥ kraturasuḥ kāmo vaśa iti | sarvāṇyevaitāni prajñānasya nāmadheyāni bhavanti

जो यह हृदय है और यह मन है। संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति (प्रेरणा), स्मृति, संकल्प, क्रतु, असु (प्राण), काम और वश: ये सब प्रज्ञान, अर्थात् चेतना, के ही नाम हैं।

3.3

एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव । बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म

eṣa brahmaiṣa indra eṣa prajāpatirete sarve devā imāni ca pañcamahābhūtāni pṛthivī vāyurākāśa āpo jyotīṃṣītyetānīmāni ca kṣudramiśrāṇīva | bījānītarāṇi cetarāṇi cāṇḍajāni ca jārujāni ca svedajāni codbhijjāni cāśvā gāvaḥ puruṣā hastino yatkiñcedaṃ prāṇi jaṅgamaṃ ca patatri ca yacca sthāvaraṃ sarvaṃ tatprajñānetraṃ prajñāne pratiṣṭhitaṃ prajñānetro lokaḥ prajñā pratiṣṭhā prajñānaṃ brahma

यही ब्रह्मा है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है, यही सब देवता हैं; ये पाँच महाभूत, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज; छोटे-छोटे मिले हुए जीव और अन्य बीज; अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज; घोड़े, गौएँ, मनुष्य, हाथी; जो कुछ भी प्राणवान है, चलने वाला, उड़ने वाला और स्थावर। यह सब प्रज्ञा से ही चलता है, प्रज्ञा में ही प्रतिष्ठित है। लोक का नेत्र प्रज्ञा है, प्रज्ञा ही उसका आधार है। प्रज्ञानं ब्रह्म: प्रज्ञान ही ब्रह्म है।

3.4

स एतेन प्राज्ञेनाऽऽत्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्

sa etena prājñenā''tmanā'smāllokādutkramyāmuṣminsvarge loke sarvān kāmānāptvā'mṛtaḥ samabhavat samabhavat

इसी प्रज्ञामय आत्मा के द्वारा वामदेव इस लोक से ऊपर उठे, और उस स्वर्गलोक में सब कामनाओं को प्राप्त कर अमर हो गए, अमर हो गए।

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