श्रीराम

मनाचे श्लोक 1–10 (मना सज्जना)

समर्थ रामदाससमर्थ रामदास1608–1682 ई.

गणाधीश जो ईश सर्वां गुणांचा। मुळारंभ आरंभ तो निर्गुणाचा॥
नमूं शारदा मूळ चत्वार वाचा। गमूं पंथ आनंत या राघवाचा॥१॥

मना सज्जना भक्तिपंथेचि जावें। तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावें॥
जनीं निंद्य तें सर्व सोडूनि द्यावें। जनीं वंद्य तें सर्व भावें करावें॥२॥

प्रभातें मनीं राम चिंतीत जावा। पुढें वैखरी राम आधीं वदावा॥
सदाचार हा थोर सांडूं नये तो। जनीं तोचि तो मानवी धन्य होतो॥३॥

मना वासना दुष्ट कामा न ये रे। मना सर्वथा पापबुद्धी नको रे॥
मना धर्मता नीति सोडूं नको हो। मना अंतरीं सार वीचार राहो॥४॥

मना पापसंकल्प सोडूनि द्यावा। मना सत्यसंकल्प जीवीं धरावा॥
मना कल्पना ते नको वीषयांची। विकारें घडे हो जनीं सर्व ची ची॥५॥

नको रे मना क्रोध हा खेदकारी। नको रे मना काम नाना विकारी॥
नको रे मना लोभ हा अंगिकारूं। नको रे मना मत्सरु दंभ भारू॥६॥

मना श्रेष्ठ धारिष्ट जीवीं धरावें। मना बोलणें नीच सोशीत जावें॥
स्वयें सर्वदा नम्र वाचे वदावें। मना सर्व लोकांसि रे नीववावें॥७॥

देहे त्यागितां कीर्ति मागें उरावी। मना सज्जना हेचि क्रीया धरावी॥
मना चंदनाचे परी त्वां झिजावें। परी अंतरीं सज्जना नीववावें॥८॥

नको रे मना द्रव्य तें पूढिलांचें। अति स्वार्थबुद्धी नुरे पाप सांचें॥
घडे भोगणें पाप तें कर्म खोटें। न होतां मनासारिखें दुःख मोठें॥९॥

सदा सर्वदा प्रीति रामीं धरावी। दुःखाची स्वयें सांडि जीवीं करावी॥
देहेदुःख तें सूख मानीत जावें। विवेकें सदा स्वस्वरूपीं भरावें॥१०॥

अर्थ

सब गुणों के स्वामी गणाधीश को, जो निर्गुण के भी मूल आरंभ हैं, नमस्कार; चारों प्रकार की वाणी के मूल शारदा को नमस्कार; अब हम राघव के अनंत पंथ पर चलें।

हे सज्जन मन, भक्ति के मार्ग पर चलो, तो श्रीहरि सहज ही मिल जाते हैं। लोग जिसकी निंदा करते हैं वह सब छोड़ दो; लोग जिसकी वंदना करते हैं वह सब मन से करो।

सुबह मन में राम का चिंतन करो, फिर वाणी से सबसे पहले राम का नाम बोलो। यह श्रेष्ठ सदाचार कभी मत छोड़ो; जो इसे निभाता है, वही मनुष्य संसार में धन्य होता है।

हे मन, दुष्ट वासना किसी काम की नहीं; हे मन, पाप-बुद्धि बिल्कुल मत रखो। हे मन, धर्म और नीति मत छोड़ो; हे मन, भीतर सार-विचार बना रहे।

हे मन, पाप का संकल्प छोड़ दो; हे मन, सत्य का संकल्प हृदय में धारण करो। हे मन, विषयों की कल्पना मत करो; उन्हीं विकारों से वह सब होता है जिससे संसार घृणा करता है।

हे मन, दुख देने वाला क्रोध मत रखो; हे मन, अनेक विकारों वाला काम मत रखो; हे मन, लोभ को मत अपनाओ; हे मन, ईर्ष्या और दंभ का बोझ मत उठाओ।

हे मन, हृदय में श्रेष्ठ धैर्य रखो; हे मन, दूसरों के ओछे वचन सहते जाओ। स्वयं सदा नम्र वाणी बोलो; हे मन, सब लोगों को शीतलता दो।

शरीर छूटने के बाद पीछे कीर्ति बची रहनी चाहिए; हे सज्जन मन, ऐसे ही कर्म करो। हे मन, चंदन की तरह स्वयं घिस जाओ, पर भीतर से सज्जनों को शीतल करते रहो।

हे मन, दूसरों का धन मत चाहो; अधिक स्वार्थ-बुद्धि से न समाप्त होने वाला पाप जमा होता है। बुरे कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, और मन के अनुसार न होने पर बड़ा दुख होता है।

सदा-सर्वदा राम में प्रीति रखो; दुख को स्वयं हृदय से छोड़ दो। शरीर के दुख को भी सुख मानते चलो, और विवेक से सदा अपने आत्म-स्वरूप में स्थित रहो।

इस भजन के बारे में

समर्थ रामदास ने 205 मनाचे श्लोक लिखे, अपने ही मन को संबोधित पद्य, “मना सज्जना”, हे सज्जन मन। ये साधारण गृहस्थों के लिए थे, और तीन सौ वर्षों से मराठी बच्चे दीया जलने के बाद संध्या को इनका पाठ करते आए हैं। पहले दस श्लोक पूरा मार्ग संक्षेप में देते हैं: दिन राम-नाम से शुरू करो, क्रोध और ईर्ष्या छोड़ो, कठोर वचन सहो, और चंदन की तरह स्वयं घिसो ताकि दूसरों को शीतलता मिले। भुजंगप्रयात छंद इन्हें एक दृढ़ कदमताल देता है।

Samarth Ramdas, Manache Shlok, shlokas 1–10 (Marathi Wikisource)