कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ।

दुखहि जनम भेल दुखहि गमाओल
सुख सपनहु नहि भेल हे भोला।

एहि भव सागर थाह कतहु नहि
भैरव धरु करुआर हे भोलानाथ।

भन विद्यापति मोर भोलानाथ गति
देहु अभय बर मोहि हे भोलानाथ।

अर्थ

हे भोलानाथ, मेरा दुख कब हरोगे?

दुख में ही जन्म हुआ और दुख में ही जीवन बीता; सपने में भी सुख नहीं मिला, हे भोला।

इस भवसागर की कहीं थाह नहीं है: हे भैरव, पतवार थाम लो, हे भोलानाथ।

विद्यापति कहते हैं: भोलानाथ ही मेरी गति हैं। हे भोलानाथ, मुझे अभय का वर दो।

इस भजन के बारे में

विद्यापति के शिव-गीत नचारी कहलाते हैं, और यह सबसे प्रिय नचारी है। मिथिला में उनकी एक कथा प्रचलित है: उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव उगना नाम के सेवक के रूप में उनकी सेवा करने आए, और कवि को यह संयोग से ही पता चला। यह नचारी सरल और सीधी है, एक थका हुआ मनुष्य आशुतोष भोलानाथ से पतवार थामने की विनती करता है। पूरे श्रावण और महाशिवरात्रि पर मधुबनी के भवानीपुर में उगना महादेव मंदिर में यह गाई जाती है।

Vidyapati Padavali, nachari; text as on Kavita Kosh