लम्बी गोलाबारी के बाद 1761 में यूसुफ़ ख़ान ने पूली तेवर के किले ले लिए; सरदार बच निकले और कुछ वर्ष और लड़ते रहे।
01पश्चिमी संघ
1750 के दशक से अर्काट का नवाब कंपनी सैनिकों के बल पर तिरुनेलवेली के पालैयक्कारों से कर वसूलने का प्रयास कर रहा था। नेरकट्टुमसेवल के पूली तेवर ने इनकार किया और पश्चिम की काली मिट्टी वाले प्रदेश के सरदारों के साथ एक संघ बनाया; 1755 में कर्नल हेरॉन और महफ़ूज़ ख़ान का अभियान उन्हें झुका नहीं सका। ताड़ और कँटीली झाड़ियों के बीच मिट्टी और पत्थर से बने नेरकट्टुमसेवल, वासुदेवनल्लूर और पनैयूर के उनके किले दक्षिण में प्रतिरोध का केंद्र बन गए।
02यूसुफ़ ख़ान की तोपें
मदुरै और तिरुनेलवेली में कंपनी के सेनानायक मुहम्मद यूसुफ़ ख़ान ने 1760 की शरद में किलों के सामने भारी तोपें लगाईं और महीनों गोलाबारी की। मई 1761 में नेरकट्टुमसेवल और अन्य किले गिर गए। पूली तेवर बच निकले। जब यूसुफ़ ख़ान ने स्वयं नवाब से विद्रोह किया और 1764 में फाँसी पाई, तब वे अपने प्रदेश लौटे, और 1767 तक डटे रहे, जिसके बाद अभिलेखों में उनका उल्लेख नहीं मिलता। तमिल परम्परा और लोकगीत उन्हें दक्षिण में कंपनी के विरुद्ध सबसे पहले शस्त्र उठाने वाला मानकर सम्मान देते हैं।

नेरकट्टुमसेवल उस पालैयक्कार प्रतिरोध का पहला अध्याय था जो कट्टबोम्मन और मरुदु बंधुओं से होता हुआ 1801 तक चला।
