राजाधिराज चोल द्वारा कल्याणी की लूट

विजेताचोलराजाधिराज प्रथम
1045 ई.बनाम
पक्षकल्याणी के पश्चिमी चालुक्यसोमेश्वर प्रथम

राजेन्द्र चोल के ज्येष्ठ पुत्र ने दक्कन युद्ध को स्वयं चालुक्य राजधानी तक पहुँचाया, वहाँ विजेता का अभिषेक कराया और उसके पत्थर के द्वारपाल अपने देश ले आया।

तिथि: लगभग 1044–1046 ई.स्थान: कल्याणी (बसवकल्याण), बीदर ज़िला, कर्नाटकप्रकार: अभियान
चित्र: Manjunath Doddamani Gajendragad at en.wikipedia · Public domain
परिणाम

चोल सेना चालुक्य राजधानी तक पहुँची और उसे जलाया; राजाधिराज ने ‘विजयराजेन्द्र’ उपाधि ली और शत्रु-नगर में अभिषेक कराया, पर कल्याणी पर अधिकार बना नहीं रहा।

01चालुक्य हृदयभूमि में

1044 में अकेले राजा बनने से पहले राजाधिराज प्रथम वर्षों तक अपने पिता के साथ लड़ चुका था। उसके अभिलेख रायचूर दोआब और उससे आगे सोमेश्वर प्रथम पर विजयों की एक लम्बी सूची देते हैं, और फिर चरम: चोल सेना चालुक्य राजधानी कल्याणपुर में घुसी और उसे आग लगा दी। वहीं, शत्रु के नगर में, राजाधिराज ने वीराभिषेक, अर्थात विजेता का अभिषेक, कराया और ‘विजयराजेन्द्र’ नाम लिया। कोई चोल राजा दक्कन में इतनी गहराई तक नहीं गया था।

02विजय-चिह्न और हिसाब

लूट में मूर्तियाँ भी थीं। पत्थर का एक द्वारपाल आज भी एक छोटा तमिल लेख धारण करता है कि उसे विजयराजेन्द्र कल्याणपुर जलाने के बाद लाया था। चोल सेना वहाँ रुकी नहीं; चालुक्यों ने अपनी राजधानी फिर बसाई, और सोमेश्वर प्रथम ने चोल देश पर पलटवार किया। 1054 में दोनों राजा कृष्णा तट पर कोप्पम में फिर मिले, जहाँ राजाधिराज अपने हाथी पर मारा गया और उसके भाई राजेन्द्र द्वितीय ने रणभूमि में ही मुकुट धारण कर युद्ध जीता। कल्याणी, जो आज बसवकल्याण है, आगे चलकर बसवण्णा की नगरी बनी।

महत्त्व

कल्याणी की लूट दक्कन में चोलों का सबसे गहरा प्रहार थी और इसी ने कोप्पम के घातक युद्ध की भूमिका बनाई।