1301 में दुर्ग गिरा; हम्मीरदेव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया।
01निभाया गया वचन
1299 के गुजरात अभियान के बाद मुहम्मद शाह और उसके भाई ने सुल्तान की सेना में मंगोल विद्रोह किया था और भागकर रणथम्भौर आ गए थे। हम्मीर ने उन्हें नहीं सौंपा। उलुग ख़ाँ और नुसरत ख़ाँ ने घेरा डाला; दीवारों से फेंके गए पत्थर से नुसरत ख़ाँ घायल होकर मर गया। पहला आक्रमण पीछे धकेल दिया गया। तब अलाउद्दीन स्वयं पहुँचा और महीनों घेरा चला। दीवारों के सामने मिट्टी के टीले उठाए गए और भीतर अन्न घटता गया।
02रणथम्भौर के चौहानों का अन्त
सुल्तान के साथ उपस्थित अमीर ख़ुसरो ने 1301 में दुर्ग के पतन और भीतर हुए जौहर का उल्लेख किया है। हम्मीरदेव अपने योद्धाओं के साथ बाहर निकले और मारे गए। लगभग सौ वर्ष बाद नयचन्द्र सूरि ने ‘हम्मीर महाकाव्य’ लिखा, जो उन्हें ऐसे राजा के रूप में याद करता है जिसने शरणागत को दिया वचन नहीं तोड़ा। राजस्थान आज भी ‘हम्मीर हठ’ की बात करता है।

अलाउद्दीन के हाथ गिरने वाला यह पहला बड़ा राजपूत दुर्ग था; दो वर्ष बाद चित्तौड़ की बारी आई।
