पेशावर का युद्ध

पक्षहिन्दू शाहीजयपाल
1001 ई.बनाम
विजेताग़ज़नवीग़ज़नी का महमूद

भारत पर महमूद के आक्रमणों में पहला। दशकों तक ग़ज़नी और पंजाब के बीच दीवार बनकर खड़े हिन्दू शाही राजा जयपाल पेशावर के पास हारे और बन्दी बने।

तिथि: 27 नवम्बर 1001 ई.स्थान: पेशावर (पुरुषपुर) के पास, ख़ैबर पख़्तूनख़्वाप्रकार: युद्ध
चित्र: CNG Coins · CC BY-SA 3.0
परिणाम

जयपाल हारे और परिवार के सदस्यों के साथ बन्दी बनाए गए।

01युद्ध

जयपाल महमूद के पिता सुबुक्तगीन से दो बार लड़ चुके थे और काबुल तथा ख़ैबर के पश्चिम की भूमि खो चुके थे। 1001 में महमूद, अल-उत्बी की गिनती से पन्द्रह हज़ार घुड़सवारों के साथ उतरा और पेशावर के सामने जयपाल से भिड़ा। महमूद का दरबारी इतिहासकार अल-उत्बी युद्ध की तिथि 8 मुहर्रम 392, शनिवार 27 नवम्बर 1001 बताता है। हाथियों वाली शाही सेना दोपहर तक टूट गई। जयपाल अपने पन्द्रह पुत्रों और पौत्रों के साथ पकड़े गए, और उनसे छीने गए बहुमूल्य हारों का वर्णन बड़े चाव से किया गया है।

02जयपाल का अन्त

फिरौती लेकर जयपाल को छोड़ दिया गया। अल-उत्बी लिखता है कि पराजय और बन्दी होने को अपना अपमान मानकर उन्होंने राज्य अपने पुत्र आनन्दपाल को सौंपा, चिता सजवाई और स्वयं को अग्नि को अर्पित कर दिया। शाही राजधानी वैहिन्द से पूर्व की ओर नमक पर्वत और पंजाब की ओर खिसकी। यह वंश पच्चीस वर्ष और लड़ता रहा। शाहियों का इतिहास जानने वाले अल-बिरूनी ने उनके बारे में लिखा कि अपने पूरे वैभव में भी वे भले और उचित कार्य की इच्छा में कभी ढीले नहीं पड़े।

जयपाल
व्यक्तित्व · शासन लगभग 964–1001 ई.जयपालजयपाल का हिन्दू शाही राज्य काबुल से पंजाब तक था, और तीस वर्ष तक वे ग़ज़नी की नई तुर्क शक्ति के सामने पहली दीवार बने रहे। 1001 में पेशावर के पास महमूद से हारकर बन्दी हुए, फिर उन्होंने पुत्र को सिंहासन सौंपा और चिता पर अपना जीवन समाप्त किया।पढ़ें →
महत्त्व

इस पराजय ने ख़ैबर का रास्ता खोल दिया, और अगले पच्चीस वर्षों में महमूद ने भारत पर लगभग सोलह बार और धावे मारे।