पाइक विद्रोह

पक्षखुर्दा के पाइकबख़्शी जगबंधु विद्याधर महापात्र भ्रमरबर राय
1817 ई.बनाम
विजेताईस्ट इंडिया कंपनीकटक मंडल के कंपनी अधिकारी और सेना

खुर्दा राजाओं की वंशानुगत सैनिक-जाति पाइक, जिनसे कंपनी ने भूमि छीन ली थी, अपने पुराने बख़्शी जगबंधु के नेतृत्व में उठे; यह कंपनी शासन के विरुद्ध सबसे आरम्भिक सशस्त्र विद्रोहों में था।

तिथि: 1817–1818 ई.स्थान: खुर्दा और पुरी, ओडिशाप्रकार: विद्रोह
चित्र: Krupasindhu Muduli · CC BY-SA 3.0
परिणाम

पाइकों ने खुर्दा पर अधिकार किया और पुरी में प्रवेश किया, फिर सैनिक शासन और सेना ने विद्रोह कुचला; जगबंधु 1825 तक जंगलों में डटे रहे।

01भूमि, नमक और खुर्दा के राजा

पाइक खुर्दा के गजपति राजाओं के योद्धा थे, जो सेवा के बदले कर-मुक्त भूमि रखते थे। 1803 में ओडिशा लेने पर कंपनी ने राजा मुकुंद देव द्वितीय को हटा दिया, पाइकों की भूमि वापस ले ली और भू-राजस्व बढ़ा दिया। उसके नमक एकाधिकार ने तट को बर्बाद कर दिया, और राजस्व कौड़ियों के स्थान पर चाँदी में लेने से किसान कर्ज़ में डूबे। खुर्दा सेना के वंशानुगत बख़्शी अर्थात् सेनापति जगबंधु ने भी अपनी रोरंग जागीर एक अधिकारी के षड्यंत्र से खो दी।

02विद्रोह

मार्च 1817 में घुमसर से कंध जनजाति का एक दल खुर्दा आया, और पाइक उनसे जा मिले। उन्होंने बानपुर में थाना और सरकारी भवन जलाए, ख़ज़ाना लूटा और कंपनी के लोगों को खुर्दा से खदेड़ दिया। अप्रैल में उन्होंने पुरी में प्रवेश किया और राजा को अपना शासक घोषित किया। कंपनी ने सैनिक शासन लागू कर सेना भेजी; राजा पकड़े गए, और 1818 तक विद्रोह टूट गया। जगबंधु जंगलों में रहे, 1825 में शर्तों पर आत्मसमर्पण किया, और 1829 में कटक में उनका देहांत हुआ।

महत्त्व

पाइक विद्रोह ने कंपनी को राजस्व घटाने और ओडिशा का प्रशासन सुधारने पर विवश किया, और ओडिशा इसे स्वतंत्रता के आरम्भिक युद्ध के रूप में याद करता है; 2017 में इसकी द्विशताब्दी राष्ट्रीय स्तर पर मनाई गई।