रक्तरंजित पर अनिर्णीत दिन; अपनी सेना के मुग़ल सैनिकों के पाला बदलने पर महादजी 1 अगस्त को पीछे हटे, और राजपूतों ने विजय का दावा किया।
01पाला बदलना
महादजी मुग़ल साम्राज्य के संरक्षक बन चुके थे और अपनी सेना को अंशतः राजपूत करों से वेतन देते थे। जयपुर के इनकार पर वे उस पर चढ़ आए। युद्ध से पहले बड़ी सेना वाला मुग़ल सरदार मुहम्मद बेग हमदानी राजपूतों से जा मिला। 28 जुलाई को जोधपुर के राठौड़ घुड़सवारों ने बार-बार भीषण धावे बोले; जदुनाथ सरकार ने लिखा कि युद्ध रक्तरंजित होते हुए भी अनिर्णीत रहा। एक भटके गोले ने हमदानी को मार दिया, पर अपनी ही पंक्तियों के मुग़ल और राजपूत सैनिकों पर संदेह के कारण महादजी आगे नहीं बढ़े।
02सीखा गया पाठ
महादजी ग्वालियर की ओर हटे, और कुछ समय के लिए दिल्ली पर उनकी पकड़ ढीली पड़ी; 1788 में ग़ुलाम क़ादिर ने नगर पर अधिकार कर बादशाह शाह आलम को अंधा कर दिया। महादजी ने लालसोट से यह सीखा कि उन्हें केवल अपने प्रति निष्ठावान सेना चाहिए। उन्होंने सवॉय के सैनिक बेनुआ द बोईन को अपनी तोपों वाली नियमित पैदल ब्रिगेडें खड़ी करने को धन दिया। तीन वर्ष बाद इन्हीं ब्रिगेडों ने पाटन और मेड़ता जीते।

लालसोट ने राजपूताने में मराठा शक्ति को तीन वर्ष के लिए रोका और महादजी को वे प्रशिक्षित ब्रिगेडें बनाने की ओर ले गया जिन्होंने उन्हें उत्तर भारत का स्वामी बनाया।
