खड़की का युद्ध

पक्षपेशवा बाजीराव द्वितीय की सेनाबापू गोखले; मोरोपंत दीक्षित
1817 ई.बनाम
विजेताईस्ट इंडिया कंपनीमाउंटस्टुअर्ट एल्फ़िंस्टन, रेज़िडेंट; लेफ़्टिनेंट-कर्नल चार्ल्स बर

पुणे के बाहर खड़की में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने कंपनी से नाता तोड़ा। उनकी सेना कई गुना बड़ी थी, पर घुड़सवारों का धावा रुक गया, और दो सप्ताह में शनिवारवाड़े पर अंग्रेज़ी झंडा फहरा रहा था।

तिथि: 5 नवंबर 1817 ई.स्थान: खड़की, पुणे, महाराष्ट्रप्रकार: युद्ध
चित्र: AnonymousUnknown author · Public domain
परिणाम

मराठा घुड़सवारों का बड़ा धावा एक छिपे नाले और कंपनी की पंक्ति पर टूट गया; पेशवा पीछे हटे, और बारह दिन बाद पुणे पर अधिकार हो गया।

01पेशवा का नाता टूटना

1802 की बसई संधि के बाद से बाजीराव द्वितीय कंपनी के संरक्षण में राज करते थे, और जून 1817 की पूना संधि ने उनकी शक्ति और छीन ली। उन्होंने अपने सेनापति बापू गोखले के अधीन चुपचाप सेना जुटाई। 5 नवंबर 1817 को उनकी सेना कंपनी की छोटी टुकड़ी के विरुद्ध निकली। एल्फ़िंस्टन रेज़िडेंसी छोड़कर खड़की में कर्नल बर की ब्रिगेड से जा मिले; पेशवा के सैनिकों ने रेज़िडेंसी को उनके काग़ज़ों समेत जला दिया। वहाँ उपस्थित ग्रांट डफ़ पेशवा की सेना लगभग अठारह हज़ार घुड़सवार और आठ हज़ार पैदल बताते हैं, जबकि कंपनी के पास तीन हज़ार से कम सैनिक थे।

02टूटा हुआ धावा

बापू गोखले ने घुड़सवारों का बड़ा समूह सीधे कंपनी की रेजिमेंटों पर झोंका। अंग्रेज़ी पंक्ति के सामने एक गहरा नाला था जो ऊँची घास में मराठा सवारों को दिखाई न दिया; आगे की टुकड़ियाँ उसमें जा गिरीं और निकट से चलती गोलियों में फँस गईं। पेशवा के प्रमुख सेनापतियों में से एक मोरोपंत दीक्षित मारे गए। पर्वती पहाड़ी से देख रहे बाजीराव ने सेना को वापस बुला लिया। मराठों ने लगभग पाँच सौ सैनिक खोए, कंपनी ने सौ से कम। येरवडा में एक और लड़ाई के बाद बाजीराव ने अपनी राजधानी छोड़ दी, और 17 नवंबर 1817 को कंपनी ने पुणे पर अधिकार कर लिया।

महत्त्व

खड़की से तीसरा आंग्ल–मराठा युद्ध खुला और पेशवाओं की राजधानी हाथ से गई; सात मास के भीतर पेशवा पद ही समाप्त हो गया।