हार की कगार पर एक रात बिताने के बाद कंपनी ने मोर्चाबंद शिविर ले लिया; तेज सिंह की ताज़ा सेना आई और बिना डटे लौट गई।
01तोपों के मुँह में
लाल सिंह की सेना ने लगभग सौ तोपों के साथ फ़िरोज़शाह में मोर्चा बाँधा था। 21 दिसंबर 1845 की दोपहर, जब सर्दी का छोटा दिन ढलने को था, फ़िरोज़पुर डिवीज़न से मिले गफ़ ने आक्रमण किया। सिख तोपों ने हमलावर पंक्तियों को छलनी कर दिया; रेजिमेंटें खाइयों तक पहुँचीं और फिर खदेड़ी गईं; शिविर के भीतर एक बारूदख़ाना फट गया। रात होने तक मोर्चे का कुछ भाग कंपनी के हाथ था, पर उसकी सेना बिखरी और थकी हुई कड़ाके की ठंड में मृतकों के बीच पड़ी थी, और सिख तोपें उस पर गोले बरसा रही थीं। गफ़ के अधीन लड़ रहे गवर्नर-जनरल हार्डिंग ने अपने काग़ज़ पीछे भेज दिए और सबसे बुरे के लिए तैयार हो गए।
02तेज सिंह का लौट जाना
22 दिसंबर की भोर में कंपनी के सैनिकों ने फिर आक्रमण किया तो पाया कि लाल सिंह जा चुके थे; शिविर और तोपें ले ली गईं। तभी तेज सिंह फ़िरोज़पुर से ताज़ा सेना और बहुत सी तोपें लेकर आ पहुँचे, सामने ऐसे अंग्रेज़ सैनिक थे जिनका गोला-बारूद लगभग समाप्त था। गोलाबारी के बाद उन्होंने अपनी सेना पीछे हटा ली और सतलुज की ओर लौट गए। अभियान में शामिल रहे कनिंघम ने लिखा कि दोनों सिख सेनापति अंग्रेज़ों के संपर्क में थे और ख़ालसा की हार चाहते थे। फ़िरोज़शाह में कंपनी के लगभग 2,400 सैनिक मारे गए या घायल हुए, भारत में किसी एक युद्ध में उसकी सबसे भारी हानियों में से एक।
फ़िरोज़शाह उस युद्ध के रूप में याद किया जाता है जिसे ख़ालसा ने मैदान में जीता और विश्वासघात से हारा; अलीवाल और सोबराँव के बाद लाहौर राज्य कंपनी का संरक्षित राज्य बन गया।
