डभोई का युद्ध

विजेतापेशवा बाजीराव की सेनाबाजीराव प्रथम
1731 ई.बनाम
पक्षसेनापति की सेना, गुजरात के सरदारों के साथत्र्यंबकराव दाभाडे, सेनापति; पिलाजी गायकवाड

डभोई मराठों के बीच का दुखद युद्ध था। गुजरात को अपना क्षेत्र मानने वाले सेनापति त्र्यंबकराव दाभाडे ने पेशवा के विरुद्ध शस्त्र उठाए, और बाजीराव ने एक ही दिन में उन्हें हरा दिया।

तिथि: 1 अप्रैल 1731 ई.स्थान: डभोई के पास भीलापुर, वडोदरा ज़िला, गुजरातप्रकार: युद्ध
चित्र: Ms Sarah Welch · CC0
परिणाम

त्र्यंबकराव दाभाडे मारे गए और उनकी सेना बिखर गई; मराठा सरदारों पर बाजीराव का अधिकार स्थिर हुआ।

01पेशवा और सेनापति

दाभाडे परिवार के पास सेनापति का पद था, और उसने गुजरात में चौथ वसूलने का अधिकार पाया था। जब बाजीराव अपनी सेनाएँ गुजरात और मालवा भेजने लगे, तो त्र्यंबकराव दाभाडे ने इसे अपने अधिकारों पर आघात माना। उन्होंने पिलाजी गायकवाड, कदम बांडे और गुजरात के अन्य सरदारों को साथ लिया, और निज़ाम की सहायता की बात भी चली, जो मराठों को बँटा देखकर प्रसन्न था। छत्रपति शाहू ने मेल कराने का प्रयास किया। बातचीत विफल हुई तो 1731 के वसंत में बाजीराव उत्तर की ओर बढ़े।

02भीलापुर का दिन

1 अप्रैल 1731 को डभोई के पास भीलापुर में सेनाएँ भिड़ीं। बाजीराव के सैनिकों ने सेनापति की पंक्ति तोड़ दी, और हाथी पर लड़ते त्र्यंबकराव गोली लगने से मारे गए। पिलाजी गायकवाड घायल होकर निकल गए। एक बड़े मराठा घराने के उत्तराधिकारी की मृत्यु से शाहू दुखी हुए। बाजीराव ने त्र्यंबकराव की माता उमाबाई से मेल किया और सेनापति पद उनके छोटे पुत्र यशवंतराव को दिया, जिनकी ओर से पिलाजी गायकवाड गुजरात का प्रबंध देखने लगे। लाभ की आशा रखने वाले निज़ाम को कुछ न मिला।

पेशवा बाजीराव प्रथम
व्यक्तित्व · 18 अगस्त 1700 – 28 अप्रैल 1740; पेशवा 1720 सेपेशवा बाजीराव प्रथमउन्नीस वर्ष की आयु में छत्रपति शाहू ने बाजीराव को पेशवा बनाया, और उन्होंने बीस वर्ष घोड़े की पीठ पर बिताए। पालखेड और भोपाल में निज़ाम को हराया, बुंदेलखंड में छत्रसाल को बचाया, 1737 में दिल्ली के द्वार तक धावा मारा, और मालवा व उत्तर के बड़े भाग से पुणे को चौथ दिलवाई।पढ़ें →
महत्त्व

डभोई के बाद बाजीराव के जीवनकाल में किसी मराठा सरदार ने पेशवा के नेतृत्व को चुनौती नहीं दी, और पिलाजी के वंश से गायकवाड उठकर बड़ौदा के शासक बने।