रात होने पर दोनों पक्ष मैदान के एक-एक भाग पर बने रहे; पंजाब युद्धों के किसी भी युद्ध से अधिक सैनिक कंपनी ने यहाँ खोए, और गफ़ को हटाने का आदेश हुआ।
01दिन ढलते का हमला
दूसरे आंग्ल–सिख युद्ध में शेर सिंह अटारीवाला ने चिलियाँवाला के पास घनी कँटीली झाड़ियों में ख़ालसा सेना सजाई, पीछे झेलम थी। गफ़ अगले दिन तक रुकना चाहता था, पर जब दोपहर में सिख तोपें उसकी छावनी पर गरजीं तो उसने तुरंत हमला कर दिया। कंपनी की ब्रिगेडें काँटों में अंधी होकर आगे बढ़ीं। बाईं ओर 24वीं फ़ुट सिख तोपों तक पहुँची और छलनी हो गई, आधे से अधिक सैनिक खो बैठी; दाहिनी ओर एक घुड़सवार ब्रिगेड घबराकर टूटी और अपनी ही तोपों के बीच से पीछे भागी। अंग्रेज़ों के कुछ झंडे और तोपें छिन गईं।
02अनिर्णीत मैदान, फिर गुजरात
अँधेरा होने तक सिख अपनी मोर्चाबंद पंक्तियों में लौट गए और कंपनी सामने की भूमि पर टिकी रही, उसके दो हज़ार से अधिक सैनिक मारे गए, घायल हुए या लापता थे। दोनों पक्षों ने विजय की सलामी दागी। लंदन में समाचार से हंगामा मचा, और गफ़ के स्थान पर सर चार्ल्स नेपियर को भेजा गया। उसके पहुँचने से पहले 21 फ़रवरी 1849 को गफ़ ने अपने तोपख़ाने के बल पर गुजरात का निर्णायक युद्ध जीत लिया, और 29 मार्च को पंजाब कंपनी राज्य में मिला लिया गया।
चिलियाँवाला आंग्ल–सिख युद्धों में ख़ालसा का सबसे गौरवपूर्ण मोर्चा था, और इसने दिखाया कि पंजाब के पतन से पहले अंतिम स्वतंत्र भारतीय सेना कितनी जमकर लड़ी।
