01हम्मीर का स्वप्न
दुर्ग की परम्परा इसे ऐसे सुनाती है। 1299 में अलाउद्दीन ख़िलजी की सेनाएँ रणथम्भौर को घेरे थीं, और भीतर अनाज के भण्डार घट रहे थे। गणेश-भक्त राव हम्मीर देव ने स्वप्न में उन्हें देखा, जिन्होंने कहा कि संकट टल जाएगा; अगली सुबह दुर्ग की एक दीवार पर तीन नेत्रों वाले गणेश की प्रतिमा मिली, और जल्द ही घेरा उठ गया। हम्मीर ने यह मन्दिर बनवाया। वह राहत टिकी नहीं, 1301 में रणथम्भौर गिरा और हम्मीर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, पर उनके स्थापित गणेश तब से पूजे जा रहे हैं।
02गणेश जी की डाक
राजस्थान और बाहर के परिवार विवाह का पहला निमन्त्रण त्रिनेत्र गणेश को भेजते हैं, पता बस इतना, श्री गणेश जी, रणथम्भौर दुर्ग, सवाई माधोपुर, और डाकिया थैले लेकर दुर्ग की सड़क चढ़ता है। पुजारी कार्ड विग्रह के सामने पढ़ते हैं। भाद्रपद की गणेश चतुर्थी पर लाखों लोग मेले के लिए पुराने द्वारों से चढ़ते हैं। रास्ता दुर्ग के कुण्डों, महलों और खण्डहर मन्दिरों से गुज़रता है, उस क्षेत्र के भीतर जो अब बाघ अभयारण्य है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1299 (दुर्ग की परम्परा)अलाउद्दीन ख़िलजी के घेरे के समय हम्मीर देव त्रिनेत्र गणेश का स्थान स्थापित करते हैं।
- 1301रणथम्भौर गिरता है और हम्मीर देव लड़ते हुए वीरगति पाते हैं।
मन्दिर रणथम्भौर दुर्ग के भीतर चढ़ाई पर है, सवाई माधोपुर स्टेशन से लगभग 13 किमी; उद्यान से होकर जाने वाली सड़क भोर में खुलती है।




