आज भी खड़ा

अग्निपुरीश्वरर मन्दिर, तिरुप्पुगलूर

जहाँ तेवारम के महान गायक अप्पर ने अपने इक्यासीवें वर्ष में स्वामी के चरण पाए, और जहाँ मुरुग नायनार अपना पुष्प-उद्यान रखते थे। तेवारम के तीनों गायकों ने इसे गाया।

निर्माण: दसवीं–ग्यारहवीं शताब्दी का चोल मन्दिर; पाँच तल का राजगोपुरम; खाई-से सरोवर से घिरास्थान: तमिलनाडु (नागपट्टिनम ज़िला)देवता: भगवान शिव अग्निपुरीश्वरर रूप में; देवी करुन्दार कुऴली10.88° N, 79.70° E
चित्र: Ssriram mt · CC BY-SA 4.0

01अप्पर के अन्तिम दिन

अप्पर ने अपने अन्तिम दिन तिरुप्पुगलूर में बिताए, अपनी छोटी कुदाल, उऴवारप्पडै, से मन्दिर के आँगन की घास निकालते हुए, जैसे जीवन भर मन्दिरों में करते रहे। पेरिय पुराणम कहता है कि स्वामी ने यहाँ उनकी परीक्षा ली: मिट्टी खुरचते समय पत्थरों के बीच सोना और रत्न निकले, और उन्होंने उन्हें कंकड़ की तरह सरोवर में फेंक दिया; अप्सराएँ उनके सामने नाचने आईं, और उन्होंने आँख न उठाई। चित्तिरै के सदयम को उन्होंने अपना अन्तिम पद गाया और स्वामी में लीन हुए। हर वर्ष वह दिन अप्पर सदय उत्सव से मनाया जाता है। सम्बन्दर भी यहाँ आए, अप्पर और मुरुग नायनार से मिले, और सुन्दरर ने यह धाम गाया।

02अग्नि के स्वामी

मन्दिर कहता है कि अग्नि देव ने यहाँ शिव की पूजा की, इसलिए स्वामी अग्निपुरीश्वरर हैं और सरोवर अग्नि तीर्थम, जो मन्दिर को तीन ओर से खाई की तरह घेरे है। तिरसठ में एक मुरुग नायनार इसी गाँव में रहते थे और हर भोर स्वामी के लिए फूल चुनते थे; बाद में नल्लूर पेरुमणम में सम्बन्दर के विवाह में उन्होंने स्वामी को पाया। मन्दिर की कथा कहती है कि सुन्दरर ने यहाँ ईंटों का तकिया बनाकर रात बिताई, और जागे तो ईंटें सोना बन चुकी थीं।

दर्शन और यात्रा

नन्निलम से लगभग 7 किमी और नागपट्टिनम से 25 किमी पश्चिम। अप्पर का दिन चित्तिरै (अप्रैल–मई) के सदयम को पड़ता है।