01राजादित्य के दीप
शिव के द्वारपाल तिण्डि और मुण्डि ने यहाँ पूजा की, इसलिए धाम तिरुमुण्डीश्वरम है। अप्पर के समय स्वामी अरुट्टलि महादेवर कहलाते थे। परान्तक प्रथम के समय उनके पुत्र राजादित्य के अधीन इस क्षेत्र में चोलों का सैन्य शिविर था, और शिलालेख दर्ज करते हैं कि मन्दिर पत्थर में फिर बना और राजादित्य ने दीप दिए। 949 में तक्कोलम के युद्ध में राष्ट्रकूट कृष्ण तृतीय के विरुद्ध राजादित्य हाथी पर ही मारे गए, और तमिल अभिलेखों में कन्नरदेव कहे जाने वाले कृष्ण तृतीय के शिलालेख भी इन्हीं दीवारों पर हैं। बाद के दान चोल, पाण्ड्य और विजयनगर शासकों के हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 949 ई.इस मन्दिर को दीप देने वाले चोल राजकुमार राजादित्य तक्कोलम के युद्ध में वीरगति पाते हैं।
विलुप्पुरम ज़िले के ग्रामम गाँव में, तिरुवेण्णैनल्लूर के पास। चित्रा पूर्णिमा और आनि तिरुमञ्जनम मुख्य उत्सव हैं।




