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अग्नीश्वरर मन्दिर, तिरुक्कोल्लिक्काडु

अग्नि ने यहाँ शिव की पूजा की, और यह स्थान अंगारे का वन है। शनि से पीड़ित परिवार पोंगु शनीश्वर के अलग देवालय में आते हैं।

निर्माण: द्रविड़ शैली का चोल देश का मन्दिरस्थान: तमिलनाडु (तिरुवारूर ज़िला, तिरुत्तुरैप्पूण्डि क्षेत्र)देवता: भगवान शिव अग्नीश्वरर रूप में; देवी पञ्जिन मेल्लडि अम्मै (मृदुपाद नायकी); पोंगु शनीश्वर10.64° N, 79.60° E
चित्र: Harizen20 · CC BY-SA 4.0

01अग्नि और शनि

कोल्लि का अर्थ जलता अंगारा है, और तिरुक्कोल्लिक्काडु की कथा अग्नि के शुद्धि हेतु शिव-पूजन की है। देवी का नाम पञ्जिन मेल्लडि अम्मै है, वह माँ जिनके चरण रुई से भी कोमल हैं। यहाँ शनि पोंगु शनीश्वर हैं, बढ़ोतरी देने वाले शनि, अपने अलग देवालय में। सम्बन्दर ने इस धाम पर एक पदिगम गाया, कावेरी के दक्षिण का 115वाँ। शमी और बेल दोनों यहाँ के स्थल-वृक्ष हैं।

दर्शन और यात्रा

तिरुवारूर से लगभग 25 किमी और तिरुत्तुरैप्पूण्डि से 18 किमी; तिरुत्तेंगूर और तिरुनेल्लिक्का पास ही हैं।