01वन में लिंग
मन्दिर की परम्परा बताती है कि एक ग्वाले की गाय रोज़ वन के एक काले पत्थर पर अपना दूध बहा देती थी, और शिव ने स्थानीय राजा के परिवार को स्वप्न में दर्शन देकर वहीं पूजे जाने की इच्छा प्रकट की। लिंग स्वयम्भू है और बंगाल की आटचाला शैली के गर्भगृह में फ़र्श से नीचे विराजता है, सामने नाटमन्दिर है। पास में दूधपुकुर है, दूध का तालाब, जहाँ यात्री दर्शन से पहले स्नान करते हैं। स्थापना से ही मन्दिर दशनामी महन्तों की परम्परा की देख-रेख में है।
02शेवड़ाफुली से पदयात्रा
सावन के सोमवारों को शेवड़ाफुली में गंगा से तारकेश्वर तक, लगभग चालीस किलोमीटर, की सड़क भगवाधारी भक्तों से भर जाती है, जो बाँस के डण्डों पर लटके गंगाजल के घड़े, भार, उठाए होते हैं। वे ‘भोले बाबा पार करेगा’ पुकारते रात भर चलते हैं और भोर में जल चढ़ाते हैं। चैत्र संक्रान्ति, बंगाली वर्ष के अन्त का गाजन और नील पूजा, दूसरा बड़ा पर्व-काल है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1729वर्तमान मन्दिर बनता है।
तारकेश्वर हावड़ा से एक शाखा रेल मार्ग का अन्तिम स्टेशन है, लगभग पौने दो घण्टे; सावन के सोमवार को बहुत भीड़।




