आज भी खड़ा

सूक्ष्मपुरीश्वरर (मंगलेश्वरर) मन्दिर, सिरुकुडि

मुट्ठी भर रेत से बड़ा नहीं, स्वयं पार्वती का बनाया लिंग; अभिषेक उसकी जगह देवी का होता है। सम्बन्दर ने इसे गाया।

निर्माण: चोल मन्दिर, सम्भवतः आरम्भिक चोल काल का, तीन तल के गोपुरम सहितस्थान: तमिलनाडु (तिरुवारूर ज़िला)देवता: भगवान शिव सूक्ष्मपुरीश्वरर (मंगलेश्वरर) रूप में; देवी मंगल नायकी10.97° N, 79.59° E
चित्र: பா.ஜம்புலிங்கம் · CC BY-SA 4.0

01मुट्ठी भर रेत

मन्दिर की कथा कहती है कि एक बार शिव सूक्ष्म होकर कैलास से अदृश्य हो गए, और पार्वती ने यहाँ आकर मंगल तीर्थम खोदा और मुट्ठी भर रेत दबाकर लिंग बनाया, उनके लौटने तक पूजा के लिए। सिरुपिडि, छोटी मुट्ठी, ही सिरुकुडि बना। लिंग बहुत छोटा है, कवच के नीचे रखा जाता है, और रेत का होने से उसका अभिषेक नहीं होता; स्नान मंगल नायकी का होता है। मंगल ग्रह ने यहाँ पूजा की, इसलिए लोग मंगल-दोष के लिए आते हैं। काँस्य मूर्तियों में सन्तोष आलिंगन मूर्ति है, देवी के कन्धे पर हाथ रखे शिव। यहाँ ध्वजस्तम्भ नहीं है। सम्बन्दर का पद उनके अपने नाम ज्ञानसम्बन्दन पर समाप्त होता है।

दर्शन और यात्रा

तिरुप्पाम्पुरम से लगभग 3 किमी पश्चिम, मयिलाडुतुरै–तिरुवारूर मार्ग पर कोल्लुमांगुडि से।