आज भी खड़ा

सिंधुदुर्ग समुद्री किला

मालवण के पास कुरटे चट्टानी द्वीप पर शिवाजी का समुद्री किला, सिद्दियों, पुर्तगालियों और अंग्रेज़ों पर अंकुश के लिए बना। भीतर वह अकेला मंदिर है जहाँ स्वयं शिवाजी की पूजा होती है।

निर्माण: 1664–1667, छत्रपति शिवाजीस्थान: महाराष्ट्रदेवता: शिवराजेश्वर (शिवाजी का मंदिर)16.04° N, 73.46° E
  1. 25 नवंबर 1664
  2. 1667
  3. लगभग 1695
चित्र: Sanjaybhagwat · CC BY-SA 4.0

01स्वराज्य की नौसेना

शिवाजी ने देखा कि जिसके पास समुद्र है, उसी के पास कोंकण का व्यापार है, और जंजीरा के सिद्दी ज़मीन से नहीं हराए जा सकते। उन्होंने नौसेना और समुद्री किलों की शृंखला आरंभ की। सिंधुदुर्ग की नींव 25 नवंबर 1664 को रखी गई, और लगभग तीन वर्ष के काम में, नींव में पिघला सीसा डालकर, लगभग 3 किमी की दीवार और चालीस से अधिक बुर्ज खड़े हुए; द्वार बुर्जों के बीच छिपा है, ताकि समुद्र से न दिखे। भीतर एक पत्थर पर चूने में उनके हाथ और पैर की छाप है।

02शिवराजेश्वर

छत्रपति राजाराम ने किले के भीतर शिवाजी की मूर्ति वाला मंदिर बनवाया, जिसे शिवराजेश्वर कहते हैं, और उसमें आज भी नित्य पूजा होती है। कुछ परिवार आज भी दीवारों के भीतर रहते हैं। इन किलों से बढ़ी मराठा नौसेना ने 18वीं शताब्दी में कान्होजी आंग्रे के नेतृत्व में अंग्रेज़ों और पुर्तगालियों से युद्ध किए। इसी तट पर शिवाजी ने पुराने समुद्री किले विजयदुर्ग को मज़बूत किया और सुवर्णदुर्ग की मरम्मत कराई, और सिंधुदुर्ग इस शृंखला के दक्षिणी छोर पर खड़ा था।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 25 नवंबर 1664शिवाजी ने समुद्री किले की नींव रखी।
  2. 1667किला पूरा हुआ।
  3. लगभग 1695राजाराम ने भीतर शिवराजेश्वर मंदिर बनवाया।
दर्शन और यात्रा

अच्छे मौसम (लगभग अक्टूबर से मई) में मालवण जेटी से नावें चलती हैं; वर्षा ऋतु में बंद रहती हैं।