01बिस्मिल का नगर
राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म यहीं 11 जून 1897 को हुआ। शाहजहाँपुर में बालपन में ही वे आर्य समाज से जुड़े, संस्कृत और ब्रह्मचर्य का अनुशासन सीखा, और हिंदी-उर्दू की वह कविता लिखने लगे जिससे उनका उपनाम ‘बिस्मिल’ पड़ा। 1924 में उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की। इसी नगर के पठान अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ उनके सबसे निकट साथी बने; एक ही मोहल्ले के हिंदू और मुसलमान, जो एक ही दिन फाँसी पर चढ़े। ठाकुर रोशन सिंह इसी ज़िले के एक गाँव से थे।
02काकोरी और उसके बाद
9 अगस्त 1925 को दल ने लखनऊ के पास काकोरी में रेलगाड़ी रोककर उसमें जा रहा सरकारी ख़ज़ाना ले लिया। मुक़दमा एक वर्ष से अधिक चला। 19 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल को गोरखपुर में, अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद में और रोशन सिंह को इलाहाबाद में फाँसी दी गई; राजेन्द्र लाहिड़ी को दो दिन पहले गोंडा में फाँसी हो चुकी थी। बिस्मिल ने फाँसी की कोठरी में अपनी आत्मकथा लिखी। नगर अपने तीनों बेटों को साथ याद करता है, और 19 दिसम्बर यहाँ शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1647 ई.नगर बसाया गया और बादशाह शाहजहाँ के नाम पर इसका नाम पड़ा।
- 11 जून 1897यहाँ राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ।
- 9 अगस्त 1925बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला और साथियों ने काकोरी रेल कांड किया।
- 19 दिसम्बर 1927बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला और रोशन सिंह को तीन अलग-अलग जेलों में फाँसी दी गई।





