01इकतालीस दिन, अठारह सीढ़ियाँ
व्रत तब आरंभ होता है जब गुरु भक्त के गले में तुलसी या रुद्राक्ष की माला डालते हैं। इकतालीस दिनों तक वह ब्रह्मचर्य रखता है, सादा भोजन करता है, काले या नीले वस्त्र पहनता है, भूमि पर सोता है और नंगे पाँव चलता है। यात्रा के दिन वह सिर पर इरुमुडि रखता है, दो खानों वाली कपड़े की गठरी, जिसमें भगवान के लिए घी भरा नारियल और रास्ते का सामान होता है। केवल इरुमुडि वाले ही पतिनेट्टाम्पडि, गर्भगृह तक की अठारह सीढ़ियाँ, चढ़ सकते हैं। घी से अय्यप्पा का अभिषेक होता है और खाली नारियल नीचे की बड़ी अग्नि में डाल दिया जाता है।
02पन्दलम, अग्निकाण्ड और न्यायालय
कथा के अनुसार अय्यप्पा पन्दलम के राजा के पालित पुत्र थे, जिन्हें राजा ने पम्पा नदी के किनारे शिशु रूप में पाया था। पन्दलम का राजमहल आज भी उनके आभूषण, तिरुवाभरणम, सँभाले है। जनवरी के मध्य मकरविळक्कु के लिए उन्हें शोभायात्रा में पहाड़ी तक ले जाया जाता है, जब पोन्नम्बलमेडु पर ज्योति दिखती है। 1950 में मंदिर में आग लगाई गई और पुरानी मूर्ति क्षतिग्रस्त हुई; 1951 में पंचलोह की नई मूर्ति प्रतिष्ठित हुई। 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने यह परंपरा बनाए रखी कि 10 से 50 वर्ष की महिलाएँ यात्रा नहीं करतीं। सर्वोच्च न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को इसे रद्द किया; नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाएँ बड़ी पीठ को भेज दी गईं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1950मंदिर जलाया गया और मूर्ति क्षतिग्रस्त हुई।
- 1951पंचलोह की नई मूर्ति की प्रतिष्ठा हुई।
- 1991केरल उच्च न्यायालय ने महिला तीर्थयात्रियों की आयु-परंपरा बनाए रखी।
- 28 सितंबर 2018सर्वोच्च न्यायालय ने आयु-नियम रद्द किया; पुनर्विचार 2019 में बड़ी पीठ को भेजा गया।
मण्डल–मकरविळक्कु (नवंबर के मध्य से जनवरी के मध्य) और हर मलयालम मास के आरंभिक दिनों में खुलता है। पम्पा से सन्निधानम तक लगभग 5 किमी की चढ़ाई है।




