आज भी खड़ा

मण्णडी

अडूर के पास का वह गाँव जहाँ त्रावणकोर के दळवा वेलु तंपी ने मार्च 1809 में भगवती मंदिर में शरण ली और कंपनी के सैनिकों के हाथ आने के बजाय अपने ही हाथों देह त्यागी।

निर्माण: पुराने भगवती मंदिर वाला गाँव; वेलु तंपी स्मारक और संग्रहालयस्थान: केरल (पत्तनंतिट्टा ज़िला, अडूर के पास)9.10° N, 76.74° E
  1. 11 जनवरी 1809
  2. मार्च 1809
चित्र: Vis M · CC BY-SA 4.0

01अंतिम शरण

जनवरी 1809 की कुंडरा घोषणा के बाद वेलु तंपी के दल मैदान में हारे, और रेज़िडेंट के दबाव में महाराजा के दरबार ने संधि करके उनके सिर पर इनाम रखा। वे उत्तर की पहाड़ियों और गाँवों में छिपते रहे, और अपने भाई पद्मनाभन तंपी के साथ मण्णडी के भगवती मंदिर पहुँचे। मार्च 1809 में जब सैनिक घेरा कसने लगे, तो जीवित पकड़े न जाने के लिए उन्होंने अपने प्राण ले लिए। कंपनी ने उनकी देह तिरुवनंतपुरम ले जाकर कण्णम्मूला में फाँसी के खंभे पर लटकाई, और उनके भाई को फाँसी दी गई।

02मण्णडी में स्मृति

वेलु तंपी का जन्म 1765 में त्रावणकोर के दक्षिण में तलकुलम में हुआ और 1801 में वे दळवा, मुख्यमंत्री, बने। केरल उन्हें कंपनी के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले पहले लोगों में याद करता है। केरल सरकार ने मण्णडी में उनकी प्रतिमा के साथ स्मारक और संग्रहालय बनाया है, और जिस मंदिर में उन्होंने देह त्यागी वह आज भी गाँव का पूजा-स्थल है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 11 जनवरी 1809कुंडरा घोषणा।
  2. मार्च 1809वेलु तंपी मण्णडी मंदिर में देह त्यागते हैं।