आज भी खड़ा

निन्र नारायण पेरुमाळ् मन्दिर, तिरुत्तण्काल्

श्रीरंगम् के रंगनाथ श्रीविल्लिपुत्तूर में आण्डाळ् से विवाह करने जाते हुए यहाँ रात भर ठहरे: तङ्गल्, अर्थात् पड़ाव। मन्दिर एक नीची ग्रेनाइट पहाड़ी पर एक शिव मन्दिर के पास है।

निर्माण: पाण्ड्यों का पहाड़ी मन्दिर; 8वीं शताब्दी के शिलालेखों वाली शैलकृत गुफाएँ; बाद के पाण्ड्य, विजयनगर और नायक विस्तारस्थान: तमिलनाडु (विरुधुनगर ज़िला, शिवकाशी)देवता: निन्र नारायण, खड़ी मुद्रा; तायार् सेंकमला (अरुणकमल महादेवी)9.48° N, 77.81° E
  1. 8वीं शताब्दी
  2. आळ्वार काल
चित्र: Ssriram mt · CC BY-SA 4.0

01श्रीदेवी का तप

मन्दिर की कथा कहती है कि एक बार श्रीदेवी, भूदेवी और नीलादेवी ने पूछा कि किसकी भक्ति सबसे बड़ी है। श्रीदेवी धान के खेतों के बीच इस पहाड़ी पर उतरीं और तब तक तप किया जब तक ऋषि उनकी पूजा करने न आने लगे, और विष्णु प्रकट होकर यहाँ खड़े हुए, निन्र नारायण। बाकी दोनों पीछे आईं और उन्हें सबसे बड़ा माना। एक और कथा श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह यहीं बताती है। पहाड़ी का नाम तालगिरि है, और उस पर शिव का करुनेल्लिनाथर् मन्दिर भी है, इसलिए दोनों के दर्शन साथ होते हैं।

02गुफाएँ और शिलालेख

पहाड़ी की दो शैलकृत गुफाओं में तीन शिलालेख हैं, जिनमें दो 8वीं शताब्दी के हैं, और वर्तमान मन्दिर देवेन्द्र वल्लभ नामक पाण्ड्य राजा का बनवाया माना जाता है। यहाँ राजगोपुर नहीं है। भूतत्ताळ्वार ने एक पाशुर में और तिरुमंगै आळ्वार ने चार में तिरुत्तण्काल् को गाया, कुल पाँच। वैकासि वसन्तोत्सव और पिळ्ळै लोकाचार्य व कूरत्ताळ्वान् के दस-दस दिन के उत्सव मुख्य पर्व हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 8वीं शताब्दीपहाड़ी की शैलकृत गुफाओं में शिलालेख खुदते हैं।
  2. आळ्वार कालभूतत्ताळ्वार और तिरुमंगै आळ्वार तिरुत्तण्काल् को गाते हैं।
दर्शन और यात्रा

शिवकाशी के तिरुत्तण्काल् में, श्रीविल्लिपुत्तूर से लगभग 25 किमी; दोनों के दर्शन एक दिन में करें।