01धान के चारों ओर बाड़
स्थल पुराण बताता है कि रामकोण नाम का भक्त धान सुखाने फैलाकर स्नान करने गया। हर ओर वर्षा हुई, पर उस एक टुकड़े पर नहीं; शिव ने धान को बाड़ से घेर लिया था। नेल यानी धान और वेलि यानी बाड़, इसीलिए नगर तिरुनेलवेली कहलाया और शिव नेल्लैयप्पर, धान के रक्षक। प्राचीन काल में यहाँ बाँस का वन था, इसलिए वेणुवननाथ भी। तिरुज्ञानसम्बन्दर ने इसे गाया, और यह पाण्ड्य देश के पाडल पेट्र स्थलों में है।
02गाते हुए खम्भे
मणि मण्डपम में एक-एक शिलाखण्ड से कटे पतले खम्भों के गुच्छे हैं; थपथपाओ तो हर खम्भा अलग स्वर देता है। मन्दिर की परम्परा इन्हें 7वीं शताब्दी के पाण्ड्य राजा निन्द्रसीर नेडुमारन का बनवाया बताती है। सदियों तक शिव मन्दिर और देवी मन्दिर बीच में सड़क लिए अलग-अलग खड़े रहे। 1647 में वडमलैयप्प पिल्लै ने संगिली मण्डपम, यानी शृंखला मण्डप, बनाकर दोनों को जोड़ दिया। ताम्र सभा में ताँबे की छत वाले मन्दिर में नटराज विराजते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 7वीं शताब्दीतिरुज्ञानसम्बन्दर तेवारम में नेल्लैयप्पर को गाते हैं।
- 1647संगिली मण्डपम शिव और देवी के मन्दिरों को जोड़ता है।
तिरुनेलवेली नगर में, रेलवे जंक्शन से लगभग 2 किमी। आनि रथोत्सव (जून–जुलाई) में तमिलनाडु के सबसे बड़े रथों में से एक खींचा जाता है।




