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केडिलियप्पर (अक्षयलिंगेश्वरर) मन्दिर, कीऴ्वेळूर

दक्षिण का बदरी-वन, जहाँ सूरपद्मन के वध के बाद युद्ध-दोष से मुक्ति के लिए मुरुगन ने पूजा की, और नटराज दाहिना पैर उठाकर नाचते हैं। अप्पर और सम्बन्दर ने इसे गाया।

निर्माण: टीले पर कोच्चेंगट चोल का माडक्कोयिल; राजराज प्रथम और मराठा तुळजाजी के अभिलेख; सात तल का राजगोपुरमस्थान: तमिलनाडु (नागपट्टिनम ज़िला)देवता: भगवान शिव केडिलियप्पर (अक्षयलिंगेश्वरर) रूप में; देवी सुन्दरकुचाम्बिका (वनमुलै अम्मन)10.77° N, 79.74° E
चित्र: பா.ஜம்புலிங்கம் · CC BY-SA 4.0

01मुरुगन का तप

केडु इलि, क्षय-रहित, अक्षय का तमिल रूप है। मन्दिर की कथा कहती है कि तिरुच्चेन्दूर में सूरपद्मन के वध के बाद शिव ने मुरुगन को इलन्दै, यानी बेर, के इस वन, दक्षिण बदरिकारण्य, में पूजा करके शुद्ध होने भेजा; उन्होंने वेल से धरती भेदकर द्वार के सामने सरवण तीर्थम बनाया। उनके तप के समय उनकी रक्षा करने वाली अंजु वट्टत्तु अम्मन का देवालय उनके सामने है। यहाँ नटराज दाहिना पैर उठाकर नाचते हैं, जैसे उन्होंने अगस्त्य को दर्शन दिए। मुरुगन बालसुब्रह्मण्य रूप में हैं, जिन्हें तिरुच्चेन्दूर की प्रतिमा वाले शिल्पी का ही बनाया माना जाता है। सम्बन्दर ने मन्दिर को पेरुन्दिरुक्कोयिल कहा। कुबेर का अपना देवालय है।

दर्शन और यात्रा

राष्ट्रीय राजमार्ग 67 पर, नागपट्टिनम से तिरुवारूर की ओर सिक्कल के आगे लगभग 14 किमी। यहाँ के मुरुगन तिरुप्पुगऴ में गाए गए हैं।