पुनर्निर्मित

कालकाजी मन्दिर, दिल्ली

दक्षिण दिल्ली में अरावली की एक टेकरी पर कालका देवी का मन्दिर, जिसके नाम पर पूरा इलाक़ा कालकाजी कहलाता है। यहाँ देवी स्वयम्भू मानी जाती हैं, और यह स्थान नगर के सबसे पुराने पूजा-स्थलों में है।

निर्माण: प्राचीन देवी-स्थान; वर्तमान मन्दिर का सबसे पुराना भाग लगभग 1764 (मराठा काल), 1816 में राजा केदारनाथ ने विस्तार करायास्थान: दिल्ली (दक्षिण-पूर्व दिल्ली)देवता: माँ कालका (काली)28.55° N, 77.26° E
  1. लगभग 1764
  2. 1816
चित्र: Pragya Sharan · CC BY-SA 4.0

01स्वयम्भू देवी

मन्दिर की परम्परा कहती है कि जब असुरों ने देवताओं को सताया तो उन्होंने इसी पहाड़ी पर पार्वती से प्रार्थना की; उनसे कौशिकी प्रकट हुईं, और कौशिकी के ललाट से काली, जिन्होंने रक्तबीज का वध किया, जिसके रक्त की हर बूँद से नया असुर उठता था; देवी ने रक्त को धरती छूने से पहले ही पी लिया। तब से देवी यहाँ पिण्डी रूप में विराजती हैं, और दिल्ली के लोग यह भी कहते हैं कि इन्द्रप्रस्थ बसाते समय पाण्डवों ने उनकी पूजा की। पिण्डी रूप की पूजा छत्र के नीचे होती है, और यह स्थान मनोकामना सिद्धपीठ कहलाता है।

02मराठे और एक पेशकार

वर्तमान भवन का सबसे पुराना भाग, संगमरमर और ईंट का बारह कोनों वाला गर्भगृह, लगभग 1764 का माना जाता है, जब दिल्ली पर मराठों का प्रभाव था। 1816 में मुग़ल बादशाह अकबर द्वितीय के पेशकार राजा केदारनाथ ने इसका विस्तार कराया, और 20वीं शताब्दी में श्रद्धालुओं ने चारों ओर धर्मशालाएँ और भवन बनवाए। मन्दिर का प्रबन्ध वंशानुगत पुजारी परिवार करते हैं। वर्ष में दो बार, नवरात्रों में, बड़ा मेला लगता है, और अष्टमी की रातें सबसे भीड़ वाली होती हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. लगभग 1764मराठा काल में वर्तमान मन्दिर का सबसे पुराना भाग बनता है।
  2. 1816अकबर द्वितीय के पेशकार राजा केदारनाथ मन्दिर का विस्तार कराते हैं।
दर्शन और यात्रा

कालकाजी मन्दिर मेट्रो स्टेशन (वायलेट और मैजेंटा लाइन) के पास, नेहरू प्लेस के सामने; लोटस टेम्पल थोड़ी ही दूर है।