पुनर्निर्मित

जल्पेश मन्दिर, जलपाईगुड़ी

मयनागुड़ी के पास उत्तर बंगाल का बड़ा शिव मन्दिर, जिसका गुम्बददार कोच-कालीन भवन फ़र्श से नीचे जल में स्थित लिंग पर उठता है। सावन और शिवरात्रि पर बंगाल, असम, भूटान और नेपाल से यात्री आते हैं।

निर्माण: उत्तर बंगाल का पुराना शिव स्थान; 17वीं शताब्दी में कोच राजाओं ने फिर बनवायास्थान: पश्चिम बंगाल (जलपाईगुड़ी ज़िला)देवता: भगवान शिव, जल्पेश्वर, जल भरे गर्त में स्थित लिंग26.53° N, 88.87° E
  1. 17वीं शताब्दी
चित्र: Hulksr51 · CC BY-SA 4.0

01कालिका पुराण अंचल के जल्पेश

जल्पेश का लिंग जल से भरे रहने वाले एक गर्त में है, और यात्री गर्भगृह के फ़र्श से नीचे झुककर दर्शन करते हैं। कामरूप के पवित्र ग्रन्थों में इस क्षेत्र का उल्लेख है, और इस अंचल पर राज करने वाले कूचबिहार के कोच राजाओं ने मन्दिर को अपना माना। वर्तमान भवन, चौकोर मण्डप पर चपटे गुम्बद के साथ, 17वीं शताब्दी में कोच राजा प्राणनारायण का बनवाया माना जाता है, और तब से मन्दिर की कई बार मरम्मत हुई है।

02श्रावणी मेला

सावन में कांवड़िए तीस्ता से जल लेकर जल्पेश पैदल आते हैं, और श्रावणी मेला पूरे महीने चलता है। महाशिवरात्रि पर जरदा नदी के किनारे बड़ा मेला लगता है, और भूटान की पहाड़ियों से व्यापारी और यात्री पीढ़ियों से आते रहे हैं। यह मेला कभी पहाड़ी लोगों का बाज़ार था, जो संतरे, कम्बल और टट्टू लेकर कपड़े और नमक के बदले में व्यापार करने उतरते थे, और नदी किनारे ऐसी दुकानें आज भी लगती हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 17वीं शताब्दीकोच राजा प्राणनारायण मन्दिर का पुनर्निर्माण कराते हैं।
दर्शन और यात्रा

मयनागुड़ी से लगभग 8 किमी और जलपाईगुड़ी नगर से 40 किमी।