01नरनारायण और चिलाराय
विश्वसिंह ने 16वीं शताब्दी के आरम्भ में कोच सरदारों को एक किया और तीस्ता तथा ब्रह्मपुत्र के बीच एक हिन्दू राज्य खड़ा किया। उनके पुत्र नरनारायण और नरनारायण के भाई शुक्लध्वज, जिन्हें कूच की तेज़ी के कारण चिलाराय, अर्थात चील, कहा गया, ने इसे एक पीढ़ी तक पूर्वोत्तर की सबसे बड़ी शक्ति बनाए रखा। 1560 के दशक में चिलाराय के अभियान अहोम देश से मणिपुर और सिलहट तक गए। नरनारायण ने 1565 में कामाख्या का पुनर्निर्माण कराया, श्रीमन्त शंकरदेव को अपने दरबार में आश्रय दिया, और महाभारत तथा पुराणों का असमिया और कामरूपी पद्य में अनुवाद कराया। बाद में राज्य बँटा, और पश्चिमी आधा, कोच बिहार, पुरानी वंश-परम्परा में रहा।
02मीर जुमला, कम्पनी और विलय
दिसम्बर 1661 में औरंगज़ेब का बंगाल सूबेदार मीर जुमला असम पर चढ़ाई के मार्ग में यहाँ घुसा, राजधानी पर अधिकार कर उसका नाम आलमगीरनगर रखा; राजा प्राणनारायण पहाड़ियों में चले गए और मुग़ल सेना के आगे बढ़ते ही अपना प्रदेश लौटा लिया। 1772 में भूटानी सेना राज्य पर छा गई, और कोच दरबार ने 5 अप्रैल 1773 की सन्धि से अंग्रेज़ों की सहायता ली, जिससे कूचबिहार संरक्षित राज्य बना। महाराजा नृपेन्द्रनारायण ने 1887 में राजमहल और मदनमोहन मन्दिर बनवाया, जहाँ हर कार्तिक रास मेला लगता है। अगस्त 1949 के समझौते से कूचबिहार भारत में मिला और 1 जनवरी 1950 को पश्चिम बंगाल का भाग बना।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 1515विश्वसिंह कोच राज्य की स्थापना करते हैं।
- 1565नरनारायण और चिलाराय कामाख्या का पुनर्निर्माण कराते हैं।
- दिसम्बर 1661मीर जुमला राजधानी पर अधिकार कर उसे आलमगीरनगर नाम देता है; उसके आगे बढ़ने पर कोच उसे लौटा लेते हैं।
- 5 अप्रैल 1773भूटानी आक्रमण के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सन्धि।
- 1887महाराजा नृपेन्द्रनारायण राजमहल बनवाते हैं।
- 1949–50कूचबिहार भारत में मिलता है और 1 जनवरी 1950 को पश्चिम बंगाल में विलीन होता है।
राजमहल अब संग्रहालय है। मदनमोहन मन्दिर का रास मेला कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ होकर कई सप्ताह चलता है।






