01हारीत राशि और बाप्पा
मेवाड़ की परम्परा कहती है कि बालक बाप्पा इन पहाड़ियों में गायें चराते थे और पाशुपत ऋषि हारीत राशि की सेवा करते थे, जो यहाँ एकलिंग की पूजा करते थे। प्रसन्न होकर ऋषि ने उन्हें राज्य का आशीर्वाद दिया और बाप्पा ने चित्तौड़ लिया। उनके बाद हर गुहिल और सिसोदिया शासक ने राजकीय आदेश एकलिंगजी के नाम से जारी किए। स्थल का सबसे पुराना तिथियुक्त अभिलेख पास के लकुलीश मन्दिर में है: नरवाहन के शासनकाल का 971 ई. का शिलालेख, जो मन्दिर की सेवा करने वाले पाशुपत तपस्वियों के नाम बताता है।
02फिर बना मन्दिर
दिल्ली और मालवा के सुल्तानों के मेवाड़ से युद्धों में मन्दिर क्षतिग्रस्त हुआ, और आज जो मन्दिर खड़ा है वह 15वीं शताब्दी के अन्त में राणा रायमल का बनवाया है: दो तलों का मण्डप और ऊँचा शिखर, 108 छोटे देवालयों वाले परकोटे के भीतर। लिंग काले पत्थर का है, चारों दिशाओं में शिव के चार मुख। सामने चाँदी के नन्दी विराजते हैं। बड़े पर्वों पर महाराणा आज भी दर्शन को आते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 8वीं शताब्दीमेवाड़ परम्परा के अनुसार यहाँ हारीत राशि ने बाप्पा रावल को आशीर्वाद दिया।
- 971 ई.लकुलीश मन्दिर में नरवाहन के शासनकाल का शिलालेख।
- 15वीं शताब्दी का अन्तराणा रायमल ने मुख्य मन्दिर फिर बनवाया।
दर्शन तय समय पर होते हैं, सुबह, दोपहर और शाम; फ़ोन और कैमरे बाहर रखवाए जाते हैं।





