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दन्तेश्वरी मन्दिर, दन्तेवाड़ा

बस्तर की देवी, शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर, जहाँ बस्तर की परम्परा के अनुसार सती का दाँत गिरा। हर वर्ष बस्तर दशहरे के 75 दिनों के लिए उनका छत्र और डोली जगदलपुर जाते हैं।

निर्माण: 14वीं शताब्दी, बस्तर के काकतीय राजाओं द्वारा (मन्दिर और राजवंश की परम्परा)स्थान: छत्तीसगढ़ (दन्तेवाड़ा ज़िला)देवता: काले पत्थर में दन्तेश्वरी माई, बस्तर राजवंश की कुलदेवी18.90° N, 81.34° E
चित्र: Ms Sarah Welch · CC0

01संगम पर दाँत

दन्त का अर्थ है दाँत, और नगर व देवी दोनों का नाम इसी से है: बस्तर की परम्परा कहती है कि जब सती के शरीर के भाग हुए, तो एक दाँत यहाँ उस तट पर गिरा जहाँ शंखिनी और डंकिनी मिलती हैं। पीठनिर्णय तन्त्र की 51 पीठों की सूची में दन्तेवाड़ा का नाम नहीं है; छत्तीसगढ़ की परम्परा और 52 पीठों की बहुत सी लोकप्रचलित सूचियाँ इसे गिनती हैं, इसलिए परम्पराएँ भिन्न हैं। मन्दिर एक परकोटे वाले आँगन में है, द्वार के आगे गरुड़ स्तम्भ है, और गर्भगृह व मण्डप पत्थर के हैं। दन्तेश्वरी माई की मूर्ति काले पत्थर में तराशी गई है। यात्री संगम पर स्नान करते हैं और उसका जल घर ले जाते हैं।

02बस्तर दशहरा

14वीं शताब्दी में वारंगल से बस्तर आए काकतीय शासकों ने दन्तेश्वरी को कुलदेवी बनाया, और बस्तर के राजा उन्हीं के नाम पर राज करते रहे। उनका दशहरा लगभग 75 दिन चलता है, श्रावण की हरियाली अमावस्या से विजयादशमी के बाद के दिनों तक, और उसका रावण से कोई सम्बन्ध नहीं। यह देवी का उत्सव है। उनका छत्र दन्तेवाड़ा से जगदलपुर लाया जाता है, जहाँ महल के मन्दिर में सफ़ेद पत्थर की दन्तेश्वरी विराजती हैं, और बस्तर के गाँव अपने-अपने देवता और मुखिया भेजते हैं। जनजातियों द्वारा हर वर्ष नया बनाया गया लकड़ी का विशाल रथ नगर में खींचा जाता है। अन्त में देवी को विदा कर दन्तेवाड़ा लौटाया जाता है।

दर्शन और यात्रा

दन्तेवाड़ा जगदलपुर से सड़क मार्ग से लगभग 80 किमी है और किरन्दुल रेल मार्ग पर उसका स्टेशन है। नवरात्र में मन्दिर में हज़ारों ज्योति कलश जलाए जाते हैं।