01जहाँ से आरम्भ हुआ
शंकरदेव का जन्म 1449 में बरदोवा के पास अलिपुखुरी में भुइयाँ भूस्वामियों के परिवार में हुआ। यहीं, अपनी आरम्भिक शिक्षा और पहले नाटक चिह्न यात्रा के बाद, उन्होंने एक प्रार्थना-भवन बनाया जहाँ गाँव के लोग भागवत का पाठ सुनने और मिलकर हरिनाम गाने एकत्र होते। वही भवन, कीर्तनघर, असम के हर नामघर का आदर्श बना। थान की अपनी परम्परा और नगाँव ज़िले के अभिलेख इसकी स्थापना 1494 में बताते हैं; कुछ वृत्तान्त इसे शंकरदेव की युवावस्था में, और पहले, रखते हैं। बाद में बाढ़ और आहोम दरबार के दबाव के कारण उन्होंने बरदोवा छोड़ा, पर यह स्थान कभी भुलाया नहीं गया।
02आज का थान
18वीं शताब्दी में शंकरदेव के वंशजों ने थान को फिर जगाया, और बाद में लम्बे विवाद के बाद यह नरोवा और सालागुरि नाम के दो सत्रों में बँट गया; 1958 में दोनों फिर बरदोवा थान के रूप में एक हुए, जब वर्तमान कीर्तनघर बना। भीतर गुरु आसन पर ग्रन्थ और दीप हैं, कोई मूर्ति नहीं। परिसर में मणिकूट, एक पवित्र सरोवर, और एक सांस्कृतिक केन्द्र है जहाँ सत्रिया नृत्य और शंकरदेव के लिखे भाओना नाटक सिखाए जाते हैं। आश्विन में उनकी जयन्ती और उनकी तिथि पर पूरे असम से यात्री थान में भर जाते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1449बरदोवा के पास अलिपुखुरी में शंकरदेव का जन्म।
- 1494 (थान की परम्परा)शंकरदेव बरदोवा में पहला थान और कीर्तनघर स्थापित करते हैं।
- 1958बँटे हुए सत्र बरदोवा थान के रूप में फिर एक होते हैं और वर्तमान कीर्तनघर बनता है।
बरदोवा नगाँव नगर से लगभग 18 किमी है। पूरा समागम देखने के लिए आश्विन में शंकरदेव की जयन्ती पर जाएँ।





