01चरवाहा और बबूल
मलबार हिल की ढलान कभी चरागाह थी, और मंदिर का विवरण बाबुल नाम के एक ग्वाले को याद करता है जिसकी गाय बबूल के एक पेड़ के नीचे एक ही जगह दूध गिरा देती थी। 1780 में वहाँ खुदाई हुई तो शिवलिंग मिला, साथ में गणेश, हनुमान और पार्वती की मूर्तियाँ, जिन्हें बहुत पहले दबे किसी पुराने मंदिर का अवशेष माना जाता है। लिंग वहीं स्थापित हुआ जहाँ मिला, और शिव ने यहाँ पेड़ का नाम पाया। सीढ़ियों की खड़ी चढ़ाई और ऊँचे शिखर वाला वर्तमान मंदिर 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध का है, जो नगर के गुजराती और मारवाड़ी व्यापारियों के दान से बना।
02श्रावण के सोमवार
श्रावण के सोमवारों और महाशिवरात्रि पर भोर से ही सीढ़ियाँ दूध, जल और बेलपत्र लिए लोगों से भर जाती हैं। अब बुज़ुर्गों के लिए लिफ़्ट है, पर अधिकतर लोग चढ़कर ही जाते हैं। ऊपर से चौपाटी की खाड़ी का पुराना दृश्य, जहाँ गणेशोत्सव के अंत में गणपति विसर्जित होते हैं, आज भी ऊँची इमारतों के बीच दिखता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1780बबूल के नीचे लिंग और अन्य मूर्तियाँ मिलती हैं।
- 19वीं शताब्दी का उत्तरार्धऊँचे शिखर वाला वर्तमान मंदिर बनता है।
गिरगाँव चौपाटी के उत्तरी छोर पर; ग्रांट रोड और चर्नी रोड स्टेशन पास हैं।




