01नागमलै पर अक्षर
नागमलै, अर्थात सर्प-पहाड़ी, की एक चट्टानी ओट के नीचे तमिल-ब्राह्मी अक्षरों की एक पंक्ति देवन चात्तन नामक जौहरी को लेख उकेरने वाला बताती है। उसके पास पाँच-पाँच पंक्तियों के तीन समूह हैं, जिनमें वही कुछ अक्षर वर्गाकार जाल में ऐसे रखे हैं कि आड़े और खड़े एक-से पढ़े जाते हैं। अक्षरों की बनावट से अभिलेख को लगभग चौथी शताब्दी ई. का मानने वाले इरावतम महादेवन ने इन जालों में संगीत या नृत्य का क्रम देखा; अन्य इन्हें शब्द-क्रीड़ा मानते हैं। जो भी हो, यह गुहा दिखाती है कि पल्लव काल से पहले कोंगु प्रदेश में अक्षर कारीगरों के हाथों में थे।
02चिन्नमलै का प्रदेश
अरच्चलूर ईरोड और कांगेयम के बीच कोंगु के खुले मैदान में है, धीरन चिन्नमलै का अपना प्रदेश, वह पालैयक्कारर जिसने 1799 में टीपू सुल्तान के पतन के बाद कम्पनी का शासन स्वीकार नहीं किया। उनका दुर्ग थोड़ी दूर ओडानिलै में था। तमिल परम्परा 1801 में कावेरी पर, 1802 में ओडानिलै में और 1804 में अरच्चलूर में कम्पनी की टुकड़ियों से उनकी भिड़न्तों को उनकी विजयों में गिनती है, जिसके बाद 1805 में वे पकड़े गए और संकगिरि में फाँसी पर चढ़ाए गए। ओडानिलै में उनका स्मारक है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग चौथी शताब्दी ई.नागमलै पर तमिल-ब्राह्मी अभिलेख और अक्षर-जाल उकेरे जाते हैं।
- 1804अरच्चलूर में धीरन चिन्नमलै के योद्धा कम्पनी की सेना से भिड़ते हैं।





