चित्र: எஸ். பி. கிருஷ்ணமூர்த்தி · CC BY-SA 3.0
ऋषि

महर्षि याज्ञवल्क्य

शुक्ल यजुर्वेद के द्रष्टा

वैदिक काल, विदेहराज जनक की सभा

याज्ञवल्क्य ने शुक्ल यजुर्वेद सूर्यदेव से प्राप्त किया और वे बृहदारण्यक उपनिषद् के महान आचार्य हैं। जनक की सभा में उन्होंने हर प्रश्नकर्ता को उत्तर दिया, और मैत्रेयी को आत्मा का स्वरूप समझाया।

“स एष नेति नेत्यात्मा। अगृह्यो न हि गृह्यते।”Brihadaranyaka Upanishad 3.9.26

01शुक्ल यजुः

वे वैशम्पायन के शिष्य थे, जिन्हें व्यास से यजुर्वेद मिला था। विष्णु पुराण कहता है कि एक विवाद के बाद गुरु ने सीखी हुई विद्या लौटाने को कहा; याज्ञवल्क्य ने उसे उगल दिया, और दूसरे शिष्यों ने तित्तिर पक्षी बनकर उसे चुग लिया, इसीलिए वह शाखा तैत्तिरीय कहलाई। फिर याज्ञवल्क्य ने सूर्यदेव की उपासना की, जिन्होंने उन्हें नया यजुः दिया। यही शुक्ल यजुर्वेद है, जिसकी वाजसनेयी संहिता और शतपथ ब्राह्मण हैं।

02जनक की सभा का शास्त्रार्थ

विदेह के राजा जनक ने अपने यज्ञ में सबसे विद्वान ब्राह्मण के लिए एक हज़ार गौएँ अलग रखीं, जिनके सींगों पर दस-दस स्वर्ण मुद्राएँ बँधी थीं। याज्ञवल्क्य ने शिष्य से कहा कि उन्हें हाँक ले चलो। बृहदारण्यक का तीसरा अध्याय आगे का वर्णन करता है: अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, उषस्त, कहोल, उद्दालक आरुणि, दो बार गार्गी, और अन्त में विदग्ध शाकल्य ने उनसे प्रश्न किए। शाकल्य को उन्होंने आत्मा ‘नेति नेति’ बताया। बाद में अपनी दोनों पत्नियों कात्यायनी और मैत्रेयी में सम्पत्ति बाँटकर उन्होंने संन्यास लिया। धर्म और व्यवहार पर याज्ञवल्क्य स्मृति उन्हीं के नाम से है।

“स एष नेति नेत्यात्मा। अगृह्यो न हि गृह्यते।”

Brihadaranyaka Upanishad 3.9.26