01मिरात-ए-मसूदी क्या कहती है
मिरात-ए-मसूदी जहाँगीर के समय अब्दुर्रहमान चिश्ती ने सालार मसूद की जीवनी के रूप में लिखी, जिसे वह महमूद ग़ज़नवी का भांजा बताती है और सन्त मानकर आदर देती है। वह कहती है कि मसूद सतरिख से पूर्व की ओर अवध में बढ़ा, और बहराइच तथा आसपास के राजा उसके विरुद्ध एक हो गए। उनके प्रमुख का नाम वह सुहल देव या सोहर देव लिखती है। पुस्तक में 1033 में दर्ज बहराइच के युद्ध में मसूद अपनी सेना सहित मारा गया।
उस समय के ग़ज़नवी इतिहासकार, अल-उत्बी और बैहक़ी, इस अभियान का उल्लेख ही नहीं करते, इसलिए यह घटना बाद की पुस्तक और स्थानीय स्मृति पर टिकी है।
02अवध की स्मृति में
1340 के दशक में यात्रा करते इब्न बतूता ने बहराइच में सालार मसूद की कब्र को बड़ी दरगाह के रूप में पाया, जहाँ सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ भी गया था। उसे रोकने वाले राजाओं की स्मृति पूर्वी उत्तर प्रदेश के गीतों और गाँवों की परम्परा में जीवित रही। पासी और राजभर सहित कई समुदाय सुहेलदेव को अपना मानते हैं। 2018 में डाक विभाग ने महाराजा सुहेलदेव पर डाक-टिकट जारी किया, और 2021 में बहराइच की चित्तौरा झील के किनारे, युद्ध के परम्परागत स्थल पर, उनके स्मारक की आधारशिला रखी गई।



