चित्र: Shashi Kant Rajbhar · CC BY-SA 4.0
योद्धा

सुहेलदेव

अवध परम्परा में श्रावस्ती के राजा

1033 ई. के लिए स्मरणीय (मिरात-ए-मसूदी)

अवध श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव को उन स्थानीय राजाओं का नायक मानता है जिन्होंने 1033 में बहराइच में सालार मसूद की सेना का नाश किया। उनका नाम हम तक सत्रहवीं सदी की फ़ारसी रचना मिरात-ए-मसूदी और क्षेत्र की परम्परा से पहुँचता है; कोई समकालीन अभिलेख उनका नाम नहीं लेता।

01मिरात-ए-मसूदी क्या कहती है

मिरात-ए-मसूदी जहाँगीर के समय अब्दुर्रहमान चिश्ती ने सालार मसूद की जीवनी के रूप में लिखी, जिसे वह महमूद ग़ज़नवी का भांजा बताती है और सन्त मानकर आदर देती है। वह कहती है कि मसूद सतरिख से पूर्व की ओर अवध में बढ़ा, और बहराइच तथा आसपास के राजा उसके विरुद्ध एक हो गए। उनके प्रमुख का नाम वह सुहल देव या सोहर देव लिखती है। पुस्तक में 1033 में दर्ज बहराइच के युद्ध में मसूद अपनी सेना सहित मारा गया।

उस समय के ग़ज़नवी इतिहासकार, अल-उत्बी और बैहक़ी, इस अभियान का उल्लेख ही नहीं करते, इसलिए यह घटना बाद की पुस्तक और स्थानीय स्मृति पर टिकी है।

02अवध की स्मृति में

1340 के दशक में यात्रा करते इब्न बतूता ने बहराइच में सालार मसूद की कब्र को बड़ी दरगाह के रूप में पाया, जहाँ सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ भी गया था। उसे रोकने वाले राजाओं की स्मृति पूर्वी उत्तर प्रदेश के गीतों और गाँवों की परम्परा में जीवित रही। पासी और राजभर सहित कई समुदाय सुहेलदेव को अपना मानते हैं। 2018 में डाक विभाग ने महाराजा सुहेलदेव पर डाक-टिकट जारी किया, और 2021 में बहराइच की चित्तौरा झील के किनारे, युद्ध के परम्परागत स्थल पर, उनके स्मारक की आधारशिला रखी गई।

श्रावस्ती (सहेट-महेट)
स्थान · बुद्ध के युग में कोसल की राजधानी, छठी–पाँचवीं शताब्दी ई.पू.श्रावस्ती (सहेट-महेट)राप्ती तट पर कोसल की राजधानी, जिसे रामायण श्री राम के पुत्र लव को देती है, जहाँ बुद्ध ने सबसे अधिक वर्षावास बिताए, और जिसे जैन सम्भवनाथ की जन्मभूमि मानते हैं। इसके खण्डहर सहेट और महेट के दो टीले हैं।पढ़ें →