योगसूत्र

अध्याय 4: कैवल्य पाद: द्रष्टा की स्वरूप स्थिति

34 श्लोक · 4 में से 4

इस अध्याय में क्या होता है

कैवल्य पाद: द्रष्टा की स्वरूप स्थिति

सिद्धियाँ जन्म, औषधि, मन्त्र, तप या समाधि से मिल सकती हैं, पर केवल ध्यान से उत्पन्न चित्त ही कर्म के संस्कार से मुक्त होता है। वासनाएँ अनादि हैं, और वे तब तक छिपी रहती हैं जब तक अनुकूल जन्म उन्हें न जगाए। पतंजलि इस मत का उत्तर देते हैं कि केवल चित्त ही है: वस्तु एक है और उसे देखने वाले चित्त अनेक, इसलिए वस्तु किसी एक चित्त पर आश्रित नहीं। चित्त पुरुष से जाना जाता है, स्वयं प्रकाशित नहीं। जो सत्त्व और आत्मा का भेद देख लेता है, उसकी आत्मभाव की जिज्ञासा शान्त हो जाती है। धर्ममेघ समाधि से क्लेश और कर्म निवृत्त होते हैं। गुण अपने कारण में लौट जाते हैं और चितिशक्ति अपने स्वरूप में स्थित होती है; यही कैवल्य है।

4.1

जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः

janmauṣadhimantratapaḥsamādhijāḥ siddhayaḥ

सिद्धियाँ जन्म से, औषधि से, मन्त्र से, तप से अथवा समाधि से उत्पन्न होती हैं।

4.2

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्

jātyantarapariṇāmaḥ prakṛtyāpūrāt

एक जाति से दूसरी जाति में परिवर्तन प्रकृति के भर आने से होता है, प्रकृति ही नये रूप को पूर्ण करती है।

4.3

निमित्तं अप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्

nimittaṃ aprayojakaṃ prakṛtīnāṃ varaṇabhedastu tataḥ kṣetrikavat

धर्म-अधर्म आदि निमित्त प्रकृति को सीधे नहीं चलाते, केवल बाधा हटाते हैं, जैसे किसान मेड़ तोड़कर पानी को खेत में बहने देता है।

4.4

निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्

nirmāṇacittānyasmitāmātrāt

योगी अनेक शरीरों के लिए जो निर्माण चित्त बनाता है, वे केवल अस्मिता से उत्पन्न होते हैं।

4.5

प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तं एकं अनेकेषां

pravṛttibhede prayojakaṃ cittaṃ ekaṃ anekeṣāṃ

उनकी प्रवृत्तियाँ भिन्न होने पर भी अनेक निर्माण चित्तों को चलाने वाला एक ही मूल चित्त है।

4.6

तत्र ध्यानजं अनाशयं

tatra dhyānajaṃ anāśayaṃ

इनमें ध्यान से उत्पन्न चित्त वासनाओं के आशय से रहित होता है।

4.7

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस् त्रिविधं इतरेषां

karmāśuklākṛṣṇaṃ yoginas trividhaṃ itareṣāṃ

योगी का कर्म न शुक्ल होता है, न कृष्ण; अन्य लोगों का कर्म तीन प्रकार का होता है, शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित।

4.8

ततस्तद्विपाकानुगुणानां एवाभिव्यक्तिर्वासनानां

tatastadvipākānuguṇānāṃ evābhivyaktirvāsanānāṃ

उन कर्मों से केवल वही वासनाएँ प्रकट होती हैं जो उनके फल के अनुकूल हों।

4.9

जातिदेशकालव्यवहितानां अप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्

jātideśakālavyavahitānāṃ apyānantaryaṃ smṛtisaṃskārayorekarūpatvāt

जाति, देश और काल से दूर होने पर भी वासनाओं में क्रम बना रहता है, क्योंकि स्मृति और संस्कार एक रूप हैं।

4.10

तासां अनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्

tāsāṃ anāditvaṃ cāśiṣo nityatvāt

इन वासनाओं का कोई आदि नहीं है, क्योंकि जीने की कामना नित्य है।

4.11

हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषां अभावे तदभावः

hetuphalāśrayālambanaiḥ saṃgṛhītatvādeṣāṃ abhāve tadabhāvaḥ

हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन से बँधी होने के कारण, इनके न रहने पर वासनाएँ भी नहीं रहतीं।

4.12

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणां

atītānāgataṃ svarūpato'styadhvabhedāddharmāṇāṃ

भूत और भविष्य अपने स्वरूप से विद्यमान रहते हैं; भेद केवल धर्मों के अध्व, अर्थात् काल-मार्ग का है।

4.13

ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः

te vyaktasūkṣmā guṇātmānaḥ

ये धर्म, चाहे व्यक्त हों या सूक्ष्म, तीनों गुणों से बने हैं।

4.14

परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वं

pariṇāmaikatvādvastutattvaṃ

परिणाम की एकता से ही वस्तु का तत्त्व सिद्ध होता है, गुण मिलकर एक रूप में बदलते हैं।

4.15

वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः

vastusāmye cittabhedāttayorvibhaktaḥ panthāḥ

वस्तु एक होने पर भी चित्त भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिए वस्तु और चित्त के मार्ग अलग हैं।

4.16

न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्

na caikacittatantraṃ vastu tadapramāṇakaṃ tadā kiṃ syāt

वस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं है; यदि होती, तो उस चित्त के न देखने पर उसका क्या होता?

4.17

तदुपरागापेक्षत्वात् चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातं

taduparāgāpekṣatvāt cittasya vastu jñātājñātaṃ

चित्त वस्तु के रंग में रँगे जाने की अपेक्षा रखता है, इसलिए वस्तु कभी ज्ञात होती है, कभी अज्ञात।

4.18

सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस् तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्

sadā jñātāścittavṛttayas tatprabhoḥ puruṣasyāpariṇāmitvāt

चित्त की वृत्तियाँ अपने स्वामी पुरुष को सदा ज्ञात रहती हैं, क्योंकि पुरुष अपरिणामी है।

4.19

न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्

na tatsvābhāsaṃ dṛśyatvāt

चित्त स्वयं प्रकाशित नहीं है, क्योंकि वह स्वयं दृश्य है।

4.20

एकसमये चोभयानवधारणं

ekasamaye cobhayānavadhāraṇaṃ

और एक ही समय में चित्त अपने को और विषय को, दोनों को नहीं जान सकता।

4.21

चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च

cittāntaradṛśye buddhibuddheratiprasaṅgaḥ smṛtisaṃkaraśca

यदि एक चित्त को दूसरा चित्त देखे, तो बुद्धि की बुद्धि का अनन्त क्रम चलेगा और स्मृतियों में भी संकर होगा।

4.22

चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनं

citerapratisaṃkramāyāstadākārāpattau svabuddhisaṃvedanaṃ

चिति शक्ति कहीं संचार नहीं करती; जब चित्त उसका आकार ले लेता है, तब अपनी बुद्धि का ज्ञान होता है।

4.23

द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थं

draṣṭṛdṛśyoparaktaṃ cittaṃ sarvārthaṃ

द्रष्टा और दृश्य दोनों से रँगा हुआ चित्त सब अर्थों को ग्रहण करने वाला होता है।

4.24

तदसंख्येयवासनाचित्रं अपि परार्थं संहत्यकारित्वात्

tadasaṃkhyeyavāsanācitraṃ api parārthaṃ saṃhatyakāritvāt

असंख्य वासनाओं से चित्रित होने पर भी चित्त दूसरे, अर्थात् पुरुष, के लिए है, क्योंकि वह संघात से काम करता है।

4.25

विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः

viśeṣadarśina ātmabhāvabhāvanāvinivṛttiḥ

जिसने यह भेद देख लिया, उसकी आत्मभाव की भावना, अर्थात् मैं कौन हूँ की जिज्ञासा, निवृत्त हो जाती है।

4.26

तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तं

tadā vivekanimnaṃ kaivalyaprāgbhāraṃ cittaṃ

तब चित्त विवेक की ओर झुक जाता है और कैवल्य की ओर बढ़ता है।

4.27

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः

tacchidreṣu pratyayāntarāṇi saṃskārebhyaḥ

उसके बीच के अन्तरालों में पुराने संस्कारों से दूसरे प्रत्यय उठ आते हैं।

4.28

हानं एषां क्लेशवदुक्तं

hānaṃ eṣāṃ kleśavaduktaṃ

इनका नाश उसी प्रकार है जैसा क्लेशों के लिए कहा गया है।

4.29

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथाविवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः

prasaṃkhyāne'pyakusīdasya sarvathāvivekakhyāterdharmameghaḥ samādhiḥ

जो प्रसंख्यान में भी कोई लाभ नहीं चाहता और जिसे सब प्रकार से विवेकख्याति हो जाती है, उसे धर्ममेघ समाधि प्राप्त होती है।

4.30

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः

tataḥ kleśakarmanivṛttiḥ

उससे क्लेश और कर्म निवृत्त हो जाते हैं।

4.31

तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयं अल्पं

tadā sarvāvaraṇamalāpetasya jñānasyānantyājjñeyaṃ alpaṃ

तब सब आवरणों और मलों से रहित ज्ञान के अनन्त होने से जानने योग्य थोड़ा ही रह जाता है।

4.32

ततः कृतार्थानां परिणामक्रमपरिसमाप्तिर् गुणानां

tataḥ kṛtārthānāṃ pariṇāmakramaparisamāptir guṇānāṃ

तब अपना प्रयोजन पूरा कर चुके गुणों के परिणाम का क्रम समाप्त हो जाता है।

4.33

क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः

kṣaṇapratiyogī pariṇāmāparāntanirgrāhyaḥ kramaḥ

क्रम क्षणों की श्रृंखला है, जो परिणाम के अन्त में ही पकड़ में आता है।

4.34

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिर् इति

puruṣārthaśūnyānāṃ guṇānāṃ pratiprasavaḥ kaivalyaṃ svarūpapratiṣṭhā vā citiśaktir iti

पुरुष के लिए प्रयोजन से रहित गुणों का अपने कारण में लौट जाना कैवल्य है; अथवा चिति शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना। यहाँ ग्रन्थ पूर्ण होता है।

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