इस अध्याय में क्या होता है पर्जन्य सोम के पिता वसु भारद्वाज पाँच मन्त्र, जगती और अन्तिम त्रिष्टुप्, पवमान सोम को अर्पित करते हैं। अरुण और हरित सोम निचोड़ा जाकर राजा की भाँति गौओं की ओर गर्जता है; ऊन पार कर वह श्येन सा घृतमय आसन पर बैठता है। घी का वस्त्र पहने वह दुरितों को दूर करता है। पर्जन्य उस महान पंखधारी के पिता हैं, जो पृथ्वी की नाभि पर पर्वतों में निवास करता है। ऋषि उससे पति से पत्नी की भाँति बोलते और सभा में जागरूक रहने की विनती करते हैं। जैसे उसने पूर्वजों के लिए सैकड़ों सहस्रों जीते, वैसे नवीन कल्याण हेतु बहे।
82.1 असा॑वि॒ सोमो॑ अरु॒षो वृषा॒ हरी॒ राजे॑व द॒स्मो अ॒भि गा अ॑चिक्रदत् । पु॒ना॒नो वारं॒ पर्ये॑त्य॒व्ययं॑ श्ये॒नो न योनिं॑ घृ॒तव॑न्तमा॒सद॑म्
asāvi somo aruṣo vṛṣā harī rājeva dasmo abhi gā acikradat | punāno vāraṃ paryetyavyayaṃ śyeno na yoniṃ ghṛtavantamāsadam
82.2 क॒विर्वे॑ध॒स्या पर्ये॑षि॒ माहि॑न॒मत्यो॒ न मृ॒ष्टो अ॒भि वाज॑मर्षसि । अ॒प॒सेध॑न्दुरि॒ता सो॑म मृळय घृ॒तं वसा॑न॒ः परि॑ यासि नि॒र्णिज॑म्
kavirvedhasyā paryeṣi māhinamatyo na mṛṣṭo abhi vājamarṣasi | apasedhanduritā soma mṛḻaya ghṛtaṃ vasānaḥ pari yāsi nirṇijam
82.3 प॒र्जन्य॑ः पि॒ता म॑हि॒षस्य॑ प॒र्णिनो॒ नाभा॑ पृथि॒व्या गि॒रिषु॒ क्षयं॑ दधे । स्वसा॑र॒ आपो॑ अ॒भि गा उ॒तास॑र॒न्सं ग्राव॑भिर्नसते वी॒ते अ॑ध्व॒रे
parjanyaḥ pitā mahiṣasya parṇino nābhā pṛthivyā giriṣu kṣayaṃ dadhe | svasāra āpo abhi gā utāsaransaṃ grāvabhirnasate vīte adhvare
82.4 जा॒येव॒ पत्या॒वधि॒ शेव॑ मंहसे॒ पज्रा॑या गर्भ शृणु॒हि ब्रवी॑मि ते । अ॒न्तर्वाणी॑षु॒ प्र च॑रा॒ सु जी॒वसे॑ऽनि॒न्द्यो वृ॒जने॑ सोम जागृहि
jāyeva patyāvadhi śeva maṃhase pajrāyā garbha śṛṇuhi bravīmi te | antarvāṇīṣu pra carā su jīvase'nindyo vṛjane soma jāgṛhi
82.5 यथा॒ पूर्वे॑भ्यः शत॒सा अमृ॑ध्रः सहस्र॒साः प॒र्यया॒ वाज॑मिन्दो । ए॒वा प॑वस्व सुवि॒ताय॒ नव्य॑से॒ तव॑ व्र॒तमन्वाप॑ः सचन्ते
yathā pūrvebhyaḥ śatasā amṛdhraḥ sahasrasāḥ paryayā vājamindo | evā pavasva suvitāya navyase tava vratamanvāpaḥ sacante
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