इस अध्याय में क्या होता है गौ, रथ, स्वर्ण और स्वर जीतने वाला कवि भार्गव पाँच जगती मन्त्र पवमान सोम को अर्पित करते हैं। राजा सोम वाणी को जन्म देता, जल को वस्त्र बनाकर बहता है; भेड़ का ऊन अशुद्धि को रोक लेता है और शुद्ध होकर वह देवों के स्थान को जाता है। उसके अनेक मार्ग हैं, चमुओं में सहस्र हरित अश्व। जल की अप्सराएँ मनीषी सोम की ओर बहतीं और उससे कृपा माँगती हैं। वह गौ, रथ, स्वर्ण, स्वर, जल और सहस्रों को जीतने वाला है। उससे निकट और दूर के शत्रु को मारने तथा विस्तृत, निर्भय गोचर देने की याचना है।
78.1 प्र राजा॒ वाचं॑ ज॒नय॑न्नसिष्यदद॒पो वसा॑नो अ॒भि गा इ॑यक्षति । गृ॒भ्णाति॑ रि॒प्रमवि॑रस्य॒ तान्वा॑ शु॒द्धो दे॒वाना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम्
pra rājā vācaṃ janayannasiṣyadadapo vasāno abhi gā iyakṣati | gṛbhṇāti ripramavirasya tānvā śuddho devānāmupa yāti niṣkṛtam
78.2 इन्द्रा॑य सोम॒ परि॑ षिच्यसे॒ नृभि॑र्नृ॒चक्षा॑ ऊ॒र्मिः क॒विर॑ज्यसे॒ वने॑ । पू॒र्वीर्हि ते॑ स्रु॒तय॒ः सन्ति॒ यात॑वे स॒हस्र॒मश्वा॒ हर॑यश्चमू॒षद॑ः
indrāya soma pari ṣicyase nṛbhirnṛcakṣā ūrmiḥ kavirajyase vane | pūrvīrhi te srutayaḥ santi yātave sahasramaśvā harayaścamūṣadaḥ
78.3 स॒मु॒द्रिया॑ अप्स॒रसो॑ मनी॒षिण॒मासी॑ना अ॒न्तर॒भि सोम॑मक्षरन् । ता ईं॑ हिन्वन्ति ह॒र्म्यस्य॑ स॒क्षणिं॒ याच॑न्ते सु॒म्नं पव॑मान॒मक्षि॑तम्
samudriyā apsaraso manīṣiṇamāsīnā antarabhi somamakṣaran | tā īṃ hinvanti harmyasya sakṣaṇiṃ yācante sumnaṃ pavamānamakṣitam
78.4 गो॒जिन्न॒ः सोमो॑ रथ॒जिद्धि॑रण्य॒जित्स्व॒र्जिद॒ब्जित्प॑वते सहस्र॒जित् । यं दे॒वास॑श्चक्रि॒रे पी॒तये॒ मदं॒ स्वादि॑ष्ठं द्र॒प्सम॑रु॒णं म॑यो॒भुव॑म्
gojinnaḥ somo rathajiddhiraṇyajitsvarjidabjitpavate sahasrajit | yaṃ devāsaścakrire pītaye madaṃ svādiṣṭhaṃ drapsamaruṇaṃ mayobhuvam
78.5 ए॒तानि॑ सोम॒ पव॑मानो अस्म॒युः स॒त्यानि॑ कृ॒ण्वन्द्रवि॑णान्यर्षसि । ज॒हि शत्रु॑मन्ति॒के दू॑र॒के च॒ य उ॒र्वीं गव्यू॑ति॒मभ॑यं च नस्कृधि
etāni soma pavamāno asmayuḥ satyāni kṛṇvandraviṇānyarṣasi | jahi śatrumantike dūrake ca ya urvīṃ gavyūtimabhayaṃ ca naskṛdhi
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