नवम मण्डल

सूक्त 43: मेध्यातिथि की वाणियों से सजे सोम

ऋषि: मेध्यातिथिः काण्वः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 43 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

मेध्यातिथि की वाणियों से सजे सोम

मेध्यातिथि काण्व के दूसरे गायत्री सूक्त में तीसरे मन्त्र में ऋषि का अपना नाम आता है। अश्व की भाँति मार्जित और आनन्द के लिए दूध से सजे सोम को गायक अपनी वाणियों से ढँकते हैं। सहायता चाहने वाली सब स्तुतियाँ पुरानी रीति से इन्दु को इन्द्र के पान हेतु सँवारती हैं। पवित्र होकर सुन्दर सोम विप्र मेध्यातिथि के स्तोत्रों से सजकर आगे बढ़ते हैं। उनसे सहस्र तेजों वाला सुशोभित धन माँगा जाता है। दौड़ के अश्व की भाँति इन्दु देवों की ओर बहते हुए पवित्र पर हिनहिनाते हैं। ऋषि स्तुति करने वाले गायक के लिए उत्तम वीर्य और वृद्धि माँगते हैं।

43.1

यो अत्य॑ इव मृ॒ज्यते॒ गोभि॒र्मदा॑य हर्य॒तः ।
तं गी॒र्भिर्वा॑सयामसि

yo atya iva mṛjyate gobhirmadāya haryataḥ |
taṃ gīrbhirvāsayāmasi

43.2

तं नो॒ विश्वा॑ अव॒स्युवो॒ गिर॑ः शुम्भन्ति पू॒र्वथा॑ ।
इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑

taṃ no viśvā avasyuvo giraḥ śumbhanti pūrvathā |
indumindrāya pītaye

43.3

पु॒ना॒नो या॑ति हर्य॒तः सोमो॑ गी॒र्भिः परि॑ष्कृतः ।
विप्र॑स्य॒ मेध्या॑तिथेः

punāno yāti haryataḥ somo gīrbhiḥ pariṣkṛtaḥ |
viprasya medhyātitheḥ

43.4

पव॑मान वि॒दा र॒यिम॒स्मभ्यं॑ सोम सु॒श्रिय॑म् ।
इन्दो॑ स॒हस्र॑वर्चसम्

pavamāna vidā rayimasmabhyaṃ soma suśriyam |
indo sahasravarcasam

43.5

इन्दु॒रत्यो॒ न वा॑ज॒सृत्कनि॑क्रन्ति प॒वित्र॒ आ ।
यदक्षा॒रति॑ देव॒युः

induratyo na vājasṛtkanikranti pavitra ā |
yadakṣārati devayuḥ

43.6

पव॑स्व॒ वाज॑सातये॒ विप्र॑स्य गृण॒तो वृ॒धे ।
सोम॒ रास्व॑ सु॒वीर्य॑म्

pavasva vājasātaye viprasya gṛṇato vṛdhe |
soma rāsva suvīryam

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)